रमा एकादशी व्रत कथा: कामधेनु की तरह है ये कहानी, जिसने सुनी उसकी पूरी होंगी सारी मनोकामनाएं
आज रमा एकादशी है और यह व्रत रखने व इसकी कथा सुनने से सारी मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है. लिहाजा 5 नवंबर 2026, गुरुवार को एकादशी व्रत में ये कहानी जरूर पढ़ें या सुनें.
रमा एकादशी व्रत गोवत्स द्वादशी या वसु बारस से एक दिन पहले रखा जाता है. लेकिन इस साल तिथियों का ऐसा संयोग बना कि ये दोनों व्रत 5 नवंबर 2026 यानी कि आज एकसाथ रखे जाएंगे. रमा एकादशी व्रत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है और वसु बारस में गौमाता यानी कि गाय व बछड़ों की पूजा होती है. वहीं रमा एकादशी की व्रत कथा में ऐसा वर्णन मिलता है कि यह कथा सुनने से कामधेनु गाय की तरह सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. धर्म शास्त्रों में कामधेनु गाय को मनोकामनाएं पूरी करने वाली गाय माना गया है. लिहाजा आज रमा एकादशी पर व्रत रखें और पूजा में यह कथा जरूर पढ़ें या सुनें.
रमा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा- 'हे भगवन आप मुझे कार्तिक मास की एकादशी के बारे में बताएं, कार्तिक के कृष्णपक्ष में कौन-सी एकादशी होती है, इसका महात्म्य क्या है?' तब भगवान् श्रीकृष्ण बोले- 'हे राजन कार्तिक के कृष्णपक्षमें जो परम कल्याणमयी एकादशी होती है, वह रमा एकादशी के नाम से जानी जाती है. 'रमा' परम उत्तम है ओर बड़े-बड़े पापों को हरने वाली है. इसका जो व्रत करता है, उसके सभी पाप दूर हो जाते हैं.'
इसकी कथा इस प्रकार है, पहले के समय में राजा मुचुकुन्द थे. वे भगवान् श्रीविष्णु के भक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे. कहा जाता है कि वे निष्कण्टक राज्य का शासन करते थे. उनके राज्य में नदियों में श्रेष्ठ चन्द्रभागा कन्या के रूप में उत्पन्न हुई. तभी राजा मुचुकुन्द ने अपनी बेटी का विवाह चन्द्रसेन कुमार के बेटे शोभन के साथ कर दिया. एक समय की बात है, शोभन अपने ससुर के घर आए. उस दिन दशमी तिथि और राजा मुचुकुन्द के यहां पूरी प्रजा एकादशी का व्रत करती थी. उनके राज्य में कोई उस दिन खाना नहीं खाता था और ना ही किसी के घर खाना बनता था. उनके यहां दशमी का दिन आने पर पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवाया जा रहा था. एकादशी के दिन कोई भी भोजन न करे, कोई भी भोजन न करे. यह घोषणा सुनकर शोभन परेशान हो गया. दरअसल शोभन बहुत कमजोर था. वो भूखा नहीं रह सकता था. इसलिए उसने अपनी पत्नी चन्द्रभागा से कहा कि अब मुझे इस समय क्या करना चाहिये, इसकी शिक्षा दो.
चन्द्रभागा ने बताया कि यहां सभी व्रत करते हैं
चन्द्रभागा बोली, हे स्वामी मैं आपको बता रही हूं कि मेरे पिता के राज्य में कोई एकादशी पर भोजन नहीं करता है. यहां तक कि हाथी, घोड़े, हाथियों के बच्चे और दूसरे पशु भी इस दिन अन्न, घास तथा जलतकका आहार नहीं ग्रहण कर पाते हैं, तब मैं आपको इस दिन भोजन कैसे दे सकती हूं, प्राणनाथ! अगर आप इस दिन भोजन करेंगे तो आपकी बड़ी निन्दा होगी. इस प्रकार मन में विचार करके अपने चित्त को मजबूत करें. लेकिन शोभन अपने शरीर को जानता था, वो बहत कमजोर था.
शोभन ने कहा कि प्रिये! तुम्हारा कहना सत्य है, मैं भी आज उपवास करूंगा. दैव का जैसा विधान है, वैसा ही होगा. भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार शोभन ने भी व्रत के नियमों का पालन किया और व्रत किया. लेकिन बहुत देर तक वो भूखा ना रह सका.
शोभन बहुत दुःखी हुए और भूख की चिंता में पड़कर समय काटने लगा. पड़े-पड़े सूर्यास्त हो कि गया. इसके बाद एकादशी की रात आई, तो उसने रात में जागरण किया. दरअसल राजा का कहना था कि जागरण आसक्त वैष्णव मनुष्यों का हर्ष बढ़ाने वाला होता है, लेकिन उस रात शोभन के लिए जागरण बहुत दुखदायी थी, वो भूख से पीड़ित हो गया. सूर्योदय होते-होते उनका प्राणान्त हो गया. राजा मुचुकुन्द ने राजोचित काष्ठों से शोभन का दाह-संस्कार कराया.
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चन्द्रभागा पति का पारलोकिक कर्म करके अपने पिता के ही घर पर रहने लगी. उसे बहुत दुख हुआ कि वो पति के शरीर को ना जान सकी और वो परलोक सुधार गए. मरने के बाद नृपश्रेष्ठ 'रमा' नामक एकादशी के ब्रत के प्रभावसे शोभन मन्दराचल के शिखर पर बसे हुए परम रमणीय देवपुर को प्राप्त हुआ. वहां शोभन द्वितीय कुबेर की तरह शोभा पाने लगा. सोमशर्मा ने बताया कि उन्होंने शोभन को देखा.
राजा मुचुकुन्दके नगर में सोमशर्मा नाम से विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे, वे तीर्थयात्रा के प्रसंग से घूमते हुए कभी मन्दराचल पर्वतप र गये. वहां उन्हें शोभन दिखायी दिये. राजा के दामाद को पहचानकर वे उनके समीप गए. शोभन भी उस समय द्विजश्रेष्ठ सोमशर्मा को आया जान शीघ्र ही आसन से उठकर खड़े हो गए ओर उन्हें प्रणाम किया. फिर क्रमशः अपने श्वशुर राजा मुचुकुन्दका, प्रिय पत्नी चन्द्रभागा का और समस्त नगर का कुशल-समाचार पूछा.
सोम ने कहा, राजन! वहां सबकी कुशल है. यहां तो अद्धुत आश्चर्य की बात है! ऐसा सुन्दर और विचित्र नगर तो कहीं किसी ने भी नहीं देखा होगा. बताओ तो सही, तुम्हें इस नगर की प्राप्ति कैसे हुई? शोभन बोले, द्विजेन्द्र ! कार्तिक कृष्णपक्ष में जो 'रमा' नाम की एकादशी होती है, उसी का व्रत करने से मुझे ऐसे नगर की प्राप्ति हुई है. ब्रह्मन्! मैंने श्रद्धाहीन होकर इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया था; इसलिये में ऐसा मानता हूं कि यह नगर सदा स्थिर रहने वाला नहीं है. आप मुचुकुन्दकी सुन्दरी कन्या चन्द्रभागा से यह सारा वृत्तांत कहिएगा.
शोभन की बात सुनकर सोमशर्मा ब्राह्मण मुचुकुन्दपुर में गए और वहां चन्द्रभागा के सामने उन्होंने सारा 'वृत्तांत कह सुनाया. सोमझार्मा बोले--शुभे! मैंने तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है तथा इन्द्रपुरीक समान उनके दुर्धर्ष नगर का भी अवलोकन किया है.
वे उसे अस्थिर बतलाते थे. तुम उसको स्थिर बनाओ. चन्द्रभागा ने कहा कि महर्षि मेरे मन में पति के दर्शन की लालसा है. आप मुझे वहां ले चलिए. मैं अपने व्रत के पुण्य से उस नगर को स्थिर बनाऊंगी. भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, राजन्! चन्द्रभागा की बात सुनकर सोमशर्मा उसे साथ ले गए. वे मन्दराचल पर्वत के निकट वामदेव मुनि के आश्रम पर गए. वहां ऋषि के मन्त्र की शक्ति और एकादशी सेवन के प्रभाव से चन्द्रभागा का शरीर दिव्य हो गया तथा उसने दिव्य गति प्राप्त कर ली.
इसके बाद वह पति के समीप गई. उस समय उसके नेत्र हर्षोल्लास से खिल रहे थे. अपनी प्रिय पत्नी को आया देख शोभन को बड़ी प्रसन्नता हुई. उन्होंने उसे बुलाकर अपने वामभाग में सिंहासन पर बिठाया. तदनन्तर चन्द्रभागा ने हर्ष में भरकर अपने प्रियतम से यह प्रिय वचन कहा, 'नाथ! मैं हित की बात कहती हूं, सुनिए. पिता के घरमें रहते समय जब मेरी अवस्था आठ वर्ष से अधिक हो गई, तभी से लेकर आज तक मैंने जो एकादशी के व्रत किए हैं और उनसे मेरे भीतर जो पुण्य संचित हुआ है, उसके प्रभाव से यह नगर कल्प के अन्त तक स्थिर रहेगा तथा सब प्रकार के मनोवांछित वैभव से समृद्धिशाली होगा.
हे राजन्! इस प्रकार रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा दिव्य भोग, दिव्य रूप ओर दिव्य आभूषणों से विभूषित हो गईं और अपने पति के साथ मन्दराचल के शिखर पर रहने लगीं. जिस प्रकार मैंने तुम्हें रमा एकादशी के व्रत का महत्व बताया है. आपको बता दूं कि यह चिन्तामणि और कामधेनु के समान सब मनोरथों को पूर्ण करने वाली है. मैंने दोनों पक्षों के एकादशी व्रतों का पापनाशक माहात्म्य बताया है. दोनों पक्षों की एकादशी समान फल देने वाली हैं. जो मनुष्य एकादशी व्रतों का माहात्म्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो श्री विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है.
कहा जाता है कि रमा एकादशी का व्रत और भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों का नाश तथा विशेष कृपा प्राप्त होती है. व्रत कथा सुनना और पढ़ना भी पुण्यदायी माना जाता है.
(Disclaimer- यह कथा धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक ग्रंथों पर आधारित है, इसे श्रद्धा और आस्था के रूप में देखें. Zee News इसकी पुष्टि नहीं करता है.)