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Swasti Vachan Significance: हिंदू धर्म में पूजा पाठ को लेकर कई नियम बताए गए हैं जिनका पालन करने से ही पूजा को संपन्न माना जाता है. इन्हीं नियमों में से एक है शुभ कार्य, पूजा-पाठ या यज्ञ के दौरान स्वस्ति वाचन करना. इसके बिना किसी भी तरह का धार्मिक अनुष्ठान अधूरा माना जाता है. स्वस्ति वाचन कोई साधारण मंत्र नहीं है बल्कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा पूजा की शुरुआत में देवताओं का आह्वान किया जाता है, सरल भाषा में समझें तो स्वस्ति वाचन से मांगलिक कार्यों को शुरू करने का नियम है. आइए इस लेख में विस्तार से जानें कि पूजा की शुरुआत और समापन से स्वस्ति वाचन का क्या संबंध है, इस मंत्र का अर्थ और इसका महत्व क्या है?
स्वस्ति वाचन वैदिक परंपरा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण मंत्र है जिसका उच्चारण कर पूजा या धार्मिक अनुष्ठान को शुरू किया जाता है. वहीं पूजा के अंत में इस मंत्र का उच्चारण कर भूलचूक के लिए क्षमा मांगा जाता है और कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है. स्वस्ति वाचन को लेकर मान्यता है कि इसका पूजा के समय उच्चारण करने से बाधाएं दूर होती हैं.
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इस मंत्र का उच्चारण कर पूजा में इंद्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति देव का आह्वान किया जाता है और उनसे कल्याण की प्रार्थना की जाती है. मंत्र के द्वारा कहा जाता है कि ये देव शक्तियां हमारी रक्षा करें और जीवन में मंगल बनाए रखें. पहली पंक्ति का अर्थ है महान कीर्ति और शक्ति वाले इंद्र देवता हमारा कल्याण करें. दूसरी पंक्ति का अर्थ है संपूर्ण संसार को जानने वाले, सबके पोषणकर्ता पूषा देव हमारा मंगल करें. परंपरा अनुसार तार्क्ष्य को गरुड़ से जोड़ा जाता है. तो तीसरी पंक्ति में उनसे रक्षा और कल्याण की प्रार्थना की जाती है. चौथी पंक्ति में देवताओं के गुरु बृहस्पति देव से प्रार्थना की जाती है कि वे हमारा कल्याण करें और हमें ज्ञान दे ताकि हम सही मार्ग पर चल सकें. अतं में ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः का उच्चारण कर मन की शांति की प्रार्थवा की जाती है.
पूजा-अनुष्ठान में स्वस्ति वाचन करते हुए शुरुआत में ही दशों दिशाओं में दर्भ या कुशा से जल का छिड़काव किया जाता है. ऐसा कर वातावरण और पूजा स्थल को शुद्ध किया जाता है और मंगल कामना की जाती है. ऐसा करते हुए भाव ये होता कि जो भी अनुष्ठान है वो पूरा हो और शांति व सकारात्मक वातावरण बना रहे. कार्य निर्विघ्न संपन्न हो.
(Disclaimer: ये जानकारी वैदिक ग्रंथों, धार्मिक मान्यताओं के साथ ही सामान्य जनश्रुतियों पर आधारित है. इसका उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना है. किसी भी पूजा-पाठ या मंत्र जाप को करने से पहले अपने स्थानीय पुरोहित, पंडित या धर्मगुरु से सलाह अवश्य लें.)