शैल मतलब पर्वत, शैलपुत्री यानी कि पर्वतराज हिमालय की पुत्री. नवरात्र की पहले दिन की देवी माता शैलपुत्री हैं, जो पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं. शैलपुत्री स्वरूप में बेहद सौम्य और शांत होता है. हमेशा सफेद वस्त्र धारण करती हैं, बाएं हाथ में कमल और दाएं हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं. वृषभ (बैल) उनका वाहन है. चूंकि वे 'मूलाधार चक्र' की अधिष्ठात्री देवी हैं. इसी से साधक के आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है. इसलिए नवरात्र के पहले दिन माता शैलपुत्री की साधना की जाती है. 11 अक्टूबर 2026, रविवार को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा यानी कि नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की विधि-विधान से पूजा करें. पूजा में उनके मंत्र पढ़ें, चालीसा का पाठ करें, कथा पढ़ें और अंत में आरती करें.
माता शैलपुत्री का मंत्र : ''ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥''
स्तुति : या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
॥दोहा॥
श्री गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल करण कृपाल।
विघ्न हरण मंगल मूरति,
जय जय गिरिजा लाल॥
॥चौपाई॥
जय गिरिराजकुमारि जगत जननी।
सकल सृष्टि पालक भवानी भवानी॥
जय शैलपुत्री माता महिमा अपार।
जो कोई तुमको ध्यावत भव भव पार॥
चंद्रार्ध मस्तक विराजत सुभ गंगा।
तुमहि देखि हरषत हिय शिव संगा॥
वाहन वृषभ राजत छवि निराली।
सोहत रूप मातु शिव की ललाली॥
कहत अष्टमां महिमा अमृत वाणी।
महिमा अपरम्पार विधि न जानी॥
कली कालक पाप हटावनि हरता।
संतन प्रभु प्रीति प्रभु भवानी करता॥
जो कोई तुहि ध्यावत रुधि रासि भवानी।
सकल सृष्टि पालक दुर्गा भवानी॥
गौरी शंकर संग विराजति सुहावनि।
मंगल कारण काली माई कहलावनि॥
ध्यान धरत जो कोई नर भवानी।
सकल सृष्टि में होत सुबानी॥
श्री शैलपुत्री चालीसा का पाठ।
करत ध्यान जस आपनि दास॥
विनय राम दास मनु प्रीतम भवानी।
तासु ध्यान से सकल सृष्टि भवानी॥
शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जयकार।।
शिव शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।
पार्वती तू उमा कहलावे।
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू।
दया करे धनवान करे तू।।
सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती तेरी जिसने उतारी।।
उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुख तकलीफ मिला दो।।
घी का सुंदर दीप जला के।
गोला गरी का भोग लगा के।।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।
प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।।
जय गिरिराज किशोरी अंबे।
शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।।
मनोकामना पूर्ण कर दो।
भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी सती के पिता राजा दक्ष ने बड़ा यज्ञ किया, उसमें सारे देवताओं को आमंत्रित किया. लेकिन अपने दामाद भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया. जब उनकी पत्नी सती ने अपने पिता के घर यज्ञ में जाने की जिद की तो शिवजी ने उन्हें बताया कि उन्हें निमंत्रण नहीं दिया गया है. हालांकि उन्होंने अपने पत्नी को यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी.
देवी सती अपने पिता प्रजापति दक्ष के घर पहुंचीं. वहां जाकर जब उन्होंने इसकी वजह पूछी तो राजा दक्ष ने शिवजी के प्रति अपमानजनक वचन कहे. इससे देवी सती व्यथित हो गईं. अपने पति महादेव का अपमान वे न सह सकीं और उन्होंने यज्ञ में कूदकर अपनी जान दे दी. बाद में यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और प्रचलित पूजा पद्धतियों पर आधारित है. पूजा विधि, मंत्र और आरती के पाठ में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है. पाठक अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार पूजा करें.)