नवरात्र के सातवे दिन की देवी मां कालरात्रि हैं. काल यानी कि मृत्यु और रात्रि यानी कि घने अंधकार को खत्म कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली मां कालरात्रि की पूजा आज 17 अक्टूबर 2026 को करें. आज सुबह स्नान करके ग्रे कलर के कपड़े पहनकर मां कालरात्रि की पूजा करें. उन्हें चीकू और गुड़ का भोग लगाएं. साथ ही मां कालरात्रि के मंत्रों का जाप करें, आरती-चालीसा और कथा पढ़ें.
मां कालरात्रि के मंत्र : ''ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः।''
मां कालरात्रि की स्तुति: चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कालरात्रि शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
कालरात्रि जय जय महाकाली
काल के मुंह से बचाने वाली
दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा
महा चंडी तेरा अवतारा
पृथ्वी और आकाश पर सारा
महाकाली है तेरा पसारा
खंडा खप्पर रखने वाली
दुष्टों का लहू चखने वाली
कलकत्ता स्थान तुम्हारा
सब जगह देखूं तेरा नजारा
सभी देवता सब नर नारी
गावे स्तुति सभी तुम्हारी
रक्तदंता और अन्नपूर्णा
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी
ना कोई गम ना संकट भारी
उस पर कभी कष्ट ना आवे
महाकाली मां जिसे बचावे
तू भी 'भक्त' प्रेम से कह
कालरात्रि मां तेरी जय।
॥ दोहा ॥
जय काली, कलिमलहरण, महिमा अगम अपार।
महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार॥
॥ चौपाई ॥
अरि मद मान मिटावन हारी, मुण्डमाल गल सोहत प्यारी॥
अष्टभुजी सुखदायक माता, दुष्टदलन जग में विख्याता॥
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै, कर में शीश शत्रु का साजै॥
दूजे हाथ लिए मधु प्याला, हाथ तीसरे सोहत भाला॥
चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे, छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे॥
सप्तम करदमकत असि प्यारी, शोभा अद्भुत मात तुम्हारी॥
अष्टम कर भक्तन वर दाता, जग मनहरण रूप ये माता॥
भक्तन में अनुरक्त भवानी, निशदिन रटें ऋषि-मुनि ज्ञानी॥
महाशक्ति अति प्रबल पुनीता, तू ही काली तू ही सीता॥
पतित तारिणी हे जग पालक, कल्याणी पापी कुल घालक॥
शेष सुरेश न पावत पारा, गौरी रूप धर्यो इक बारा॥
तुम समान दाता नहिं दूजा, विधिवत करें भक्तजन पूजा॥
रूप भयंकर जब तुम धारा, दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा॥
नाम अनेकन मात तुम्हारे, भक्तजनों के संकट टारे॥
कलि के कष्ट कलेशन हरनी, भव भय मोचन मंगल करनी॥
महिमा अगम वेद यश गावैं, नारद शारद पार न पावैं॥
भू पर भार बढ़्यो जब भारी, तब तब तुम प्रकटीं महतारी॥
आदि अनादि अभय वरदाता, विश्वविदित भव संकट त्राता॥
कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा, उसको सदा अभय वर दीन्हा॥
ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा, काल रूप लखि तुमरो भेषा॥
कलुआ भैंरों संग तुम्हारे, अरि हित रूप भयानक धारे॥
सेवक लांगुर रहत अगारी, चौसठ जोगन आज्ञाकारी॥
त्रेता में रघुवर हित आई, दशकंधर की सैन नसाई॥
खेला रण का खेल निराला, भरा मांस-मज्जा से प्याला॥
रौद्र रूप लखि दानव भागे, कियौ गवन भवन निज त्यागे॥
तब ऐसौ तामस चढ़ आयो, स्वजन विजन को भेद भुलायो॥
ये बालक लखि शंकर आए, राह रोक चरनन में धाए॥
तब मुख जीभ निकर जो आई, यही रूप प्रचलित है माई॥
बाढ़्यो महिषासुर मद भारी, पीड़ित किए सकल नर-नारी॥
करूण पुकार सुनी भक्तन की, पीर मिटावन हित जन-जन की॥
तब प्रगटी निज सैन समेता, नाम पड़ा मां महिष विजेता॥
शुंभ निशुंभ हने छन माहीं, तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं॥
मान मथनहारी खल दल के, सदा सहायक भक्त विकल के॥
दीन विहीन करैं नित सेवा, पावैं मनवांछित फल मेवा॥
संकट में जो सुमिरन करहीं, उनके कष्ट मातु तुम हरहीं॥
प्रेम सहित जो कीरति गावैं, भव बंधन सों मुक्ती पावैं॥
काली चालीसा जो पढ़हीं, स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं॥
दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा, केहि कारण मां कियौ विलम्बा॥
करहु मातु भक्तन रखवाली, जयति जयति काली कंकाली॥
सेवक दीन अनाथ अनारी, भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी॥
॥ दोहा ॥
प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ।
तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ॥
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में रक्तबीज नाम का एक दैत्य था. जिसके आतंक से मनुष्य और देवता दोनों ही त्रस्त थे. रक्तबीज को वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की जितनी बूंदें धरती पर गिरेंगी, उतने ही उसकी तरह शक्तिशाली राक्षस उत्पन्न हो जाएंगे. इस कारण उसे मारना देवताओं के लिए असंभव हो रहा था.
रक्तबीज का वध करके उसके अत्याचार को खत्म करने प्रार्थना लेकर देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे. महादेव जानते थे कि इस असुर का संहार केवल देवी पार्वती ही कर सकती हैं. तब शिवजी के अनुरोध पर मां पार्वती ने अपने तेज से मां कालरात्रि को प्रकट किया. जिन्होंने भयंकर रौद्र रूप धारण किया.
रक्तबीज को मारने के लिए और उसके खून को भूमि पर गिरने से रोकने के लिए मां कालरात्रि ने अपनी जिव्हा (जीभ) बेहद लंबी कर ली. इसके बाद उन्होंने उसका वध किया और सारा रक्त अपनी जिव्हा पर ले लिया. इस प्रकार मां ने रक्तबीज का संपूर्ण अंत कर देवताओं को भयमुक्त किया.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और परंपराओं पर आधारित है. इसका उद्देश्य केवल धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी प्रदान करना है. पूजा-विधि, मंत्र और रीति-रिवाजों में क्षेत्र एवं परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है.)