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पितृ अमावस्‍या को महालया क्‍यों कहते हैं? इस दिन 'चक्षु दान' से कैसे 'जीवित' होती हैं मां दुर्गा की प्रतिमाएं?

पितृ अमावस्‍या को सर्वपितृ अमावस्या, पितृ विसर्जन अमावस्या, पितृ मोक्ष अमावस्या के अलावा महालया भी कहते हैं. यह पितरों की विदाई और मां दुर्गा के आगमन का विशेष दिन है. महालया पर ही मां दुर्गा की प्रतिमाओं में 'प्राण' आते हैं.

पितृ अमावस्‍या को महालया क्‍यों कहते हैं? इस दिन 'चक्षु दान' से कैसे 'जीवित' होती हैं मां दुर्गा की प्रतिमाएं?
Image Credit: महालया पर मां दुर्गा प्रतिमा में चक्षुदान की रस्‍म निभाता मूर्तिकार. इस रस्‍म का बड़ा आध्‍यात्मिक महत्‍व है. (Photo:AI)

महालया आज 10 अक्‍टूबर 2026, शनिवार को है, यह वो विशेष दिन है जब 15 दिन के पितृ पक्ष का समापन होगा और पितरों को सम्‍मानपूर्वक विदाई दी जाएगी. साथ ही नवरात्र से एक दिन पहले महालया को ही मां दुर्गा के आगमन की तैयारी होती है. इस दिन 'चक्षु दान' की महत्‍वपूर्ण रस्‍म निभाई जाती है. पश्चिम बंगाल समेत कुछ राज्‍यों में महालया का दिन बेहद अहम होता है. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे क्षेत्रों में इस दिन को पेद्दला अमावस्या भी कहते हैं.

मां दुर्गा का पृथ्‍वी पर आगमन

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महालया के दिन से ही देवी पक्ष की शुरुआत होती है और मां दुर्गा पृथ्वी पर आने की अपनी यात्रा शुरू करती हैं. इस दिन से ही दुर्गा पूजा की उल्‍टी गिनती शुरू हो जाती है.

महालया पर चक्षु दान

महालया के दिन तड़के सुबह चक्षु दान की रस्‍म निभाई जाती है. इसमें मंत्रोच्‍चार के बीच मां की जाती है. यह रस्‍म बहुत ज्‍यादा लोगों के बीच नहीं की जाती है बल्कि केवल पंडित या पुजारी ही वहां मौजूद रहते हैं. चक्षुदान के लिए तड़के सुबह का समय चुना जाता है ताकि उस समय शांति और एकांत रहे. मूर्तिकार पूरी तरह शुद्ध होकर मां दुर्गा की प्रतिमा के नेत्र बनाते हैं. इसे ही चक्षुदान कहते हैं. मान्‍यता है कि इसके बाद ही मां दुर्गा की प्रतिमा पूर्ण होती है और उसमें प्राण आते हैं.

मृण्‍मयी से चिन्‍मयी स्‍वरूप

पारंपरिक रूप से मां दुर्गा की प्रतिमा के नेत्र बनाने के लिए घी लगे हुए बेल के पत्‍ते को जलाकर विशेष काजल तैयार करते हैं फिर कुश या बेल के डंठल से मां की आखों में काजल लगाया जाता है. इस प्रकिया में सामान्‍य ब्रश या रासायनिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता है लेकिन आजकल चलन बदल गया है.  

इसके साथ ही मां दुर्गा का मृण्मयी स्वरूप चिन्मयी स्वरूप में बदल जाता है. यानी कि मां की मिट्टी की मूरत में साक्षात देवी के प्राण और चेतना का वास हो जाता है. इसलिए चक्षुदान की रस्‍म को बेहद महत्‍वपूर्ण माना गया है.

सबसे पहले बनाते हैं तीसरी आंख

चक्षुदान के समय मूर्तिकार सबसे पहले मां दुर्गा की प्रतिमा में तीसरी आंख बनाते हैं. इसके बाद बाईं आंख और फिर अंत में दाईं आंख बनाकर मूर्ति को पूर्ण किया जाता है. मां दुर्गा की त्रिनेत्र (तीनों नेत्र) बनाते समय इस निश्चित क्रम का पालन करने की परंपरा है, जिसका उल्‍लेख धर्म-पुराणों में है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है. महालया और ‘चक्षु दान’ से जुड़ी परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और पूजा-पद्धतियों के अनुसार भिन्न हो सकती हैं. इस स्‍टोरी का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी जानकारी देना है.)

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About the Author

Shraddha Jain

Shraddha Jain

पत्रकारिता में 15 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली श्रद्धा जैन वर्तमान में Zee News की नेशनल डिजिटल टीम में बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर सक्रिय हैं. जहाँ वे धर्म, ज्योतिष, ग्रह गोचर, अंक शास्‍त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन और सिम्बॉयसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई की है. बतौर फोटो जर्नलिस्ट करियर शुरू करने वाली श्रद्धा ने दूरदर्शन, दैनिक भास्कर और चौथी दुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.12 वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ बनाने के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया और देश 24*7 जैसे पोर्टल्स में नेतृत्व की भूमिका निभाई. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और हस्तरेखा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन और लेखन करते हुए जटिल विषयों को सरल और रोचक भाषा में पाठकों के सामने पेश कर रही हैं.
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