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अंधा प्रेम और पक्षपात इंसान की सोचने की क्षमता खत्म कर देता है. अपनों के प्रति अंधा मोह परिवार और काम दोनों को बर्बाद कर देता है. महाभारत में धृतराष्ट्र का पुत्रमोह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
महात्मा विदुर ने उद्योग पर्व जिसे महाभारत महाकाव्य का पांचवां पर्व कहा जाता है, इसमें इस विषय पर बहुत साफ बातें लिखी हैं.
इस खबर में हम जानेंगे कि विदुर नीति के नियम आज के समय में हमारे परिवार और बिजनेस को तबाही से कैसे बचा सकते हैं.
महाभारत के उद्योग पर्व में महात्मा विदुर और राजा धृतराष्ट्र के बीच बातचीत को काफी अच्छे से लिखा गाया है. धृतराष्ट्र बहुत अच्छे से जानते थे कि दुर्योधन गलत रास्ते पर चल रहा है.
लेकिन पुत्रमोह के कारण उन्होंने दुर्योधन की हर गलती पर पर्दा डाल दिया. विदुर जी ने उन्हें बार-बार समझाया कि गलत का साथ देना विनाश को न्योता देना है.
इतने के बाद भी धृतराष्ट्र ने विदुर की सलाह नहीं मानी. फिर होना क्या था, पूरे कुरुवंश का नाश हो गया. विदुर नीति साफ कहती है कि जब इंसान का विवेक खत्म होता है, तब विनाश तय है.
इसको लेकर उद्योग पर्व के अध्याय 33, श्लोक 29 में विदुर जी ने कहा था कि:-
श्लोक: "अमित्रो कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च। कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्॥"
गीताप्रेस के मुताबिक इसका अर्थ: जो व्यक्ति अपने सच्चे सलाहकारों से द्वेष करता है, दुश्मनों को दोस्त बनाता है और गलत कामों में लगे अपने लोगों का साथ देता है, वो व्यक्ति अंधा कहलाता है.
बच्चों की गलतियां छुपाना: आज के समय में कई माता-पिता अपने बच्चों की गलत हरकतों को नजरअंदाज करते हैं. यही अनदेखी आगे चलकर बच्चों का भविष्य खराब कर देती है.
कंपनियों में नेपोटिज्म: ऑफिस या बिजनेस में काबिलियत छोड़कर केवल अपनों को आगे बढ़ाना नुकसानदेह है. इससे संस्थान तरक्की नहीं कर पाता है.
विवेक का नाश: अपनों के मोह में आकर सही और गलत का अंतर भूल जाना सबसे बड़ा दोष है.
भरोसे की कमी: पक्षपात करने वाले व्यक्ति पर समाज या टीम का भरोसा खत्म हो जाता है.

अपनों से प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन उनकी गलतियों का समर्थन करना पाप है. अगर बच्चा या कोई अपना गलत राह पर है, तो उसे तुरंत रोकें.
सही समय पर टोका-टोकी करने से बड़ा नुकसान टल जाता है. ऑफिस या व्यापार में फैसलों को भावुक होकर न लें. हमेशा योग्यता और सच्चाई को पहला स्थान दें.
विदुर जी कहते हैं कि न्याय करते समय आंख और कान दोनों खुले रखने चाहिए.
अक्सर लोग अपनों की गलती पर पर्दा डालकर सोचते हैं कि वे उनका भला कर रहे हैं. ये सोच सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है. बच्चों को बचपन से ही सही और गलत का फर्क सिखाएं.
अगर ऑफिस या जहां काम करते हैं वहां पर किसी अपने से गलती हो, तो नियम के मुताबिक ही फैसला लें.
भावुकता में आकर लिए गए फैसले हमेशा पछतावा देते हैं. रिश्तों में मिठास तभी बनी रहती है जब उसमें ईमानदारी हो.
महात्मा विदुर की नीतियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी महाभारत काल में थीं.
धृतराष्ट्र की गलतियों से सीख लेकर हम अपने परिवार, करियर और समाज को सही दिशा में आगे बढ़ा सकते हैं.
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी महाभारत, विदुर नीति और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. यह सामान्य पाठकों की जानकारी और जीवन प्रबंधन के उद्देश्य से लिखी गई है. किसी भी पारिवारिक या व्यावहारिक निर्णय के लिए पाठक अपनी समझ और विशेषज्ञों की सलाह का प्रयोग करें.