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पितृ पक्ष में 'कुशा' के बिना अधूरा है तर्पण! गरुड़ पुराण के अनुसार जानें क्यों जरूरी है यह पवित्र घास

इस खबर में पितृ पक्ष के तर्पण और श्राद्ध में कुशा का धार्मिक महत्व के बारे में डिटेल से जानेंगे. समझिए क्यों गरुड़ पुराण के अनुसार कुशा धारण कर जल देना जरूरी है.

Written By Harsh Singh
Published: Sep 11, 2026, 05:20 PM IST | Updated: Sep 11, 2026, 05:54 PM IST
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हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का बहुत महत्व माना जाता है. इन सारे कामों में कई तरह की पूजा सामग्री लगती है, पर इनमें कुशा यानी पवित्र घास का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है.

शास्त्रों के मुताबिक कुशा के बिना पितरों का तर्पण कभी पूरा नहीं होता है. यही वजह है कि पितृ पक्ष शुरू होने से ठीक पहले, भाद्रपद महीने की अमावस्या को कुशा इकट्ठी की जाती है. इसी खास तिथि को शास्त्रों में कुशग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है.

विष्णु भगवान से जुड़ा है कुशा का जन्म

कुशा कोई मामूली घास नहीं है, बल्कि वैदिक ग्रंथों में इसे बहुत पवित्र और शुद्ध माना गया है. यज्ञ, हवन, संकल्प और श्राद्ध जैसे कामों में इसका इस्तेमाल जरूरी माना जाता है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार कुशा विष्णु भगवान के वराह अवतार से पैदा हुई मानी जाती है. इसी वजह से कुशा में साक्षात विष्णु का अंश माना जाता है.

पितरों के कर्म में पूरी शुद्धता और मन की एकाग्रता बहुत जरूरी होती है. मान्यता है कि कुशा की पवित्रता से ही पितर खुश होकर अपने वंशज का दिया हुआ जल और अन्न स्वीकार करते हैं.

तर्पण में उंगली में पहनी जाती है कुशा की अंगूठी

गरुड़ पुराण के मुताबिक पितरों को जल चढ़ाते वक्त हाथ में कुशा और फूल लेकर अर्घ्य देने का नियम बताया गया है. तर्पण के दौरान कुशा से एक खास तरह की अंगूठी बनाई जाती है, जिसे पवित्री कहा जाता है.

इसे दाहिने हाथ की रिंग फिंगर में पहना जाता है. पूजा के वक्त ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ मंत्र बोलते हुए जल चढ़ाया जाता है.

इसके बाद पिता, दादा और परदादा का नाम और गोत्र बोलकर स्वधा नमः कहा जाता है. तर्पण खत्म होने के बाद कुशा को इज्जत के साथ किसी पवित्र जगह पर रख देना चाहिए.

कुशग्रहणी अमावस्या का पितृ पक्ष से क्या नाता है?

भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या कहने की वजह यही है कि इसी दिन साल भर के धार्मिक कामों के लिए कुशा तोड़ी जाती है.

पितृ पक्ष शुरू होने से पहले किसी साफ-सुथरी जगह से नई कुशा इकट्ठा करके घर में रख ली जाती है, ताकि पूरे 16 दिनों के श्राद्ध पक्ष में पितरों के तर्पण के लिए ताजा और शुद्ध कुशा मौजूद रहे.

इस दिन सही विधि से तोड़ी गई कुशा पूरे एक साल तक धार्मिक कामों के लिए इस्तेमाल की जा सकती है, ऐसा माना जाता है.

कुशा तोड़ते वक्त इन बातों का रखें ध्यान

शास्त्रों में कुशा तोड़ने और संभालने के कुछ सख्त नियम बताए गए हैं. कुशा हमेशा किसी साफ-सुथरी जगह से ही तोड़नी चाहिए. इसे तोड़ते वक्त ध्यान रखें कि पत्तियां टूटें नहीं और जड़ बची रहे.

कुशा को कभी गंदे हाथों से न छुएं और न ही उस पर पैर पड़ने दें. तर्पण के बाद बची हुई कुशा को कभी कूड़े में नहीं फेंकना चाहिए. इसे किसी पवित्र नदी में बहा देना चाहिए या किसी पेड़ की जड़ में रख देना चाहिए.

नियम मानने से ही मिलता है पूर्वजों का आशीर्वाद

पितृ पक्ष में छोटी-छोटी धार्मिक बातों का ख्याल रखने से ही पूजा-पाठ का पूरा फल मिलता है, ऐसा माना जाता है. शास्त्रों के मुताबिक सही तरीके से किया गया तर्पण ही पूर्वजों तक पहुंचता है.

अगर तर्पण में कुशा का सही इस्तेमाल न हो, तो पूजा अधूरी रह जाती है. इसलिए कुशग्रहणी अमावस्या से ही पितृ कार्य की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.

पूरी श्रद्धा और शुद्धता से किया गया श्राद्ध कर्म परिवार को आगे बढ़ाता है और घर में सुख-शांति लाता है, ऐसी मान्यता है.

डिस्क्लेमर (Disclaimer):
यह लेख सनातन धर्म के शास्त्रों, गरुड़ पुराण, प्रामाणिक धार्मिक मान्यताओं और वैदिक परंपराओं पर आधारित एक सूचनात्मक विश्लेषण है. इसका मुख्य उद्देश्य पाठकों को पितृ तर्पण और कुशग्रहणी अमावस्या के शास्त्रीय महत्व की सही जानकारी प्रदान करना है.

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About the Author

हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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