)
गोवर्धन पूजा का हिंदू धर्म में बहुत खास महत्व होता है. इस साल ये त्योहार 9 नवंबर को है. इस दिन सब लोग अपने घरों में गोबर से पर्वत की आकृति बनाते हैं.
आकृति बनाने के बाद उसे फूलों और पत्तियों से सजाया जाता है. उसके बाद भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है.
लेकिन बहुत कम लोगो ने ही ये सोचा होगा कि गोवर्धन पूजा करने के लिए गोबर का ही इस्तेमाल क्यों करते हैं. इसके पीछे भगवान कृष्ण की लीला, प्राचीन परंपरा और ग्रामीण संस्कृति जुड़ी हुई है.
आज हम इस खबर में गोबर का इस्तेमाल पूजा में क्यों होता है, इसके बारे में डिटेल से बताएंगे.
पहले वृंदावन में लोग बारिश करवाने के लिए इंद्र देव की पूजा किया करते थे. लेकिन कान्हा का मानना अलग था. उन्होंने कहा कि असली पूजा तो गोवर्धन पर्वत और गायों की होनी चाहिए.
क्योंकि ये सब हमारे जीवन का आधार है. फिर क्या था देवता इंद्र को आ गया गुस्सा और उन्होंने बहुत तेज बारिश कर दी.
इसके बाद कृष्ण जी ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और पूरे गांव की रक्षा की थी. गोबर से पर्वत बनाना उसी महान लीला का प्रतीक माना जाता है.
हम सभी जानते हैं गांव में गोबर का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है. साथ ही गाय को पवित्र और पूजनीय माना जाता है.
पुराने समय में गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था पशुओं पर टिकी होती थी. गाय से दूध और गोबर दोनों मिलते थे, जो खेती और ईंधन के काम आते थे.
गोबर को शुद्ध मानकर कई शुभ कामों में इस्तेमाल किया जाता है. तो इसलिए इस तरह से पर्वत बनाया जाता है ताकि गाय के लिए आभार और प्रकृति से प्यार जताया जा सके.
भारत देश में हर जगह अपनी-अपनी अलग परंपरा होती है. कई जगह गोबर से पहाड़ बना के पूजा करते हैं, तो कई जगहों पर लोग गोबर से गाय, बछड़े और छोटे-छोटे घरों की आकृतियां भी बनाते हैं.
आकृतियों के आस-पास पेड़ पौधे भी बनाए जाते हैं. इन सभी आकृतियों को रोली, अक्षत, ताजे फूलों और पत्तियों से सजा दिया जाता है.
इसके बाद दीपक जलाकर विधि-विधान से भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है.
इस पूजा से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है. हमारे लिए प्रकृति, पेड़-पौधे और पशुधन बहुत जरूरी है. ये हमारे जीवन में भी बहुत काम आते है.
साथ ही ये त्योहार हमें याद दिलाता है कि जंगल, नदियां और पहाड़ हमारे जीवन की रक्षा करते हैं. गोबर से पर्वत बनाने की प्रथा इसी प्राचीन सोच को आज भी जिंदा रखे हुए है. ये हमें अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़े रखती है.
जीवन को जोड़ने वाला पर्व
गोवर्धन पर्वत की यह छोटी सी आकृति अपने अंदर एक बहुत बड़ा संदेश समेटे हुए है. ये इंसानों और प्रकृति के बीच के गहरे रिश्ते को मजबूत करती है.
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और पारंपरिक लोक-संस्कृति पर आधारित है.