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मुंह में रखते ही घुल जाती है करौली की कुटेमा गजक: स्वाद ऐसा कि सात समंदर पार तक लोग हैं दीवाने

करौली की कुटेमा गजक अपने खास स्वाद और मुलायम बनावट के लिए देश-विदेश में मशहूर है. 100 साल से ज्यादा पुरानी इस पुश्तैनी कारीगरी से तैयार गजक की मांग पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, लंदन और अरब देशों तक है.

मुंह में रखते ही घुल जाती है करौली की कुटेमा गजक: स्वाद ऐसा कि सात समंदर पार तक लोग हैं दीवाने
Image Credit: ZEE Media

सर्दियों के अहसास के साथ ही बाजारों में गजक की मिठास घुलने लगी है, लेकिन राजस्थान के करौली की एक खास गजक ऐसी है, जिसका स्वाद सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है. खास बात यह है कि यह गजक मुंह में रखते ही घुल जाती है. 100 साल से ज्यादा पुरानी पुश्तैनी कारीगरी और स्वाद का ऐसा मेल है कि पाकिस्तान से लेकर ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और अरब देशों तक इसकी मांग है.

सात समंदर पार तक हैं इस मिठाई के दीवाने

सर्दियों का मौसम, ठंडी हवाएं और साथ में गुड़-तिल से बनी खस्ता गजक का स्वाद, आमतौर पर गजक का नाम आते ही कुछ जगहों की पहचान सामने आती है, लेकिन राजस्थान के करौली की कुटेमा गजक भी अपने खास स्वाद के दम पर अलग पहचान बना चुकी है. यहां की गजक की सबसे बड़ी खासियत है इसकी मुलायम और भुरभुरी बनावट मुंह में रखते ही यह घुलने लगती है. यही वजह है कि इस देसी मिठास के दीवाने सात समंदर पार तक मौजूद हैं.

100 साल से भी ज्यादा पुरानी है गजक बनाने की परंपरा

करौली के बड़े बाजार में स्थित मौला गजक भंडार इस पारंपरिक स्वाद की पहचान बना हुआ है. बताया जाता है कि यहां गजक बनाने की परंपरा 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही कारीगरी और खास तरीके से तैयार की जाने वाली कुटेमा गजक ने इसे आम गजक से अलग पहचान दी है. यहां इस्तेमाल होने वाले बेहतरीन तिल, गुड़ और पुश्तैनी नुस्खे का मेल ही इसके खास स्वाद की वजह माना जाता है.

करौली की इस गजक का स्वाद अब शहर की सीमाओं में कैद नहीं है. जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, लंदन, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान तक इसकी मांग बताई जाती है. विदेशों में रहने वाले लोग भी सर्दियों का मौसम शुरू होते ही अपने घरों से इस गजक की फरमाइश करने लगते हैं. इतना ही नहीं, यहां शुगर फ्री गजक भी तैयार की जाती है, ताकि स्वाद के शौकीनों को एक और विकल्प मिल सके.

गजक बनाने के काम में जुड़े हैं 35 से 40 परिवार

इस पारंपरिक कारोबार की खास बात यह भी है कि करौली में करीब 35 से 40 परिवार गजक बनाने के काम से जुड़े हुए हैं. हालांकि, इसका निर्माण मुख्य रूप से सर्दियों के मौसम में ही होता है. कारीगरों के हाथों की मेहनत, तिल और गुड़ का सही तालमेल और बनाने की विधि इस कारोबार को आज भी जिंदा रखे हुए है. यही वजह है कि बाजार में कई तरह की गजक होने के बावजूद करौली की कुटेमा गजक की अपनी अलग पहचान है.

एक तरफ बदलते दौर में मिठाइयों के स्वाद और बनाने के तरीके बदल रहे हैं, तो दूसरी तरफ करौली के कारीगर अपनी 100 साल पुरानी परंपरा को आज भी सहेजे हुए हैं. यहां गजक सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत, पुश्तैनी हुनर और करौली की पहचान बन चुकी है. तभी तो इस गजक का एक टुकड़ा मुंह में जाते ही स्वाद ऐसा छोड़ता है कि लोग अगली सर्दी का इंतजार करने लगते हैं.

Report- Ashish Chaturvedi

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About the Author

Aman Singh

Aman Singh

जून 2023 से ज़ी राजस्थान के साथ कार्यरत अमन लगातार अपनी क्रिएटिविटी और प्रोफेशनल स्किल्स के जरिए पाठकों तक तेज, सटीक और भरोसेमंद खबरें पहुंचा रहे हैं. वे उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के रहने वाले हैं, अमन ने जौनपुर से ही अपनी इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पूरी की. इसके बाद उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन किया. डिजिटल पत्रकारिता में गहरी समझ, तेज खबर पकड़ने की क्षमता के कारण अमन सिंह एक उभरते हुए और भरोसेमंद मीडिया प्रोफेशनल के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं.
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