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नासा का मशहूर स्पेस टेलीस्कोप 'नील गेह्रेल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी' खत्म होने की कगार पर है. अंतरिक्ष में 22 साल तक पड़ताल करने वाला यह टेलीस्कोप किसी भी वक्त वायुमंडल में एंट्री कर सकता है. हालांकि नासा ने अभी तक इसकी री-एंट्री की पुष्टि नहीं की है. वैज्ञानिकों का मानना है कि जब यह वायुमंडल में एंट्री लेगा तो इसका ज्यादातर हिस्सा जलकर भस्म हो जाएगा. फिर भी इसके कुछ बहुत मजबूत टुकड़े जमीन या समुद्र में गिर सकते हैं.
अमेरिकी स्पेस फोर्स के ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, 4 नवंबर यानी बुधवार को इसके करीब दोपहर 2 बजे वायुमंडल में लौटने का अनुमान था. हालांकि, इसमें करीब 11 घंटे आगे-पीछे का समय मार्जिन है. जानकारों के मुताबिक, इसके मलबे से जमीन पर किसी इंसान को नुकसान पहुंचने का खतरा न के बराबर (करीब 2,100 में से 1) है. नासा की टीम लगातार इसके डेटा को ट्रैक कर रही है.
NASA’s Swift space telescope spent nearly 22 years watching stars explode. Now it’s falling back to Earth. Reentry is expected Nov. 4, 2026. Here’s why it’s coming down—and what its extraordinary mission leaves behind. #NASA #SatelliteReentry #Swift https://t.co/1cPdFh59JQ
— jonfredric (@thejonfredric) November 4, 2026
यह वही टेलीस्कोप है, जिसे महज 2 साल की सेवा के लिए अंतरिक्ष में भेजा गया था, लेकिन वह पूरे 22 साल तक काम में जुटा रहा. इस दौरान उसने अंतरिक्ष में होने वाले सबसे शक्तिशाली धमाकों और गामा-रे बर्स्ट्स (GRBs) की स्टडी की. इतना ही नहीं, उसने ब्लैक होल, सुपरनोवा (फटते तारे), धूमकेतु (कॉमेट) और कई अन्य रहस्यमयी कॉस्मिक घटनाओं पर लगातार नजर रखी और वैज्ञानिकों को जरूरी डिटेल भेजी.
दरअसल, हाल के दिनों में सूरज की गतिविधियों में भारी इजाफा हुआ, जिससे पृथ्वी का ऊपरी वायुमंडल गर्म होकर फैल गया है. इसकी वजह से लो-अर्थ ऑर्बिट में चक्कर काट रहे सैटेलाइट्स पर खिंचाव (एटमॉस्फेरिक ड्रैग) कई गुना तक बढ़ गया है. पर्याप्त ईंधन और थ्रस्ट न होने के चलते स्विफ्ट धीरे-धीरे नीचे गिरने लगा. 20 अक्टूबर तक यह जमीन से महज 275 किलोमीटर की ऊंचाई पर आ गया था, जहां से इसका वापस संभलना नामुमकिन हो गया. यही वजह है कि अब यह खत्म होने की कगार पर है और तेजी से धरती पर गिर सकता है.
नासा ने इस ऑब्जर्वेटरी को बचाने के लिए पूरी जान लगा दी. इसके लिए जुलाई 2026 में 'कैटालिस्ट स्पेस' कंपनी का 'लिंक' नाम का एक कमर्शियल स्पेसक्राफ्ट भेजा गया था, ताकि वह स्विफ्ट से डॉक होकर उसे वापस सुरक्षित ऊंची कक्षा (ऑर्बिट) में धकेल सके, लेकिन स्पेस में पहुंचते ही लिंक में तकनीकी खराबी आ गई और सिग्नल टूट गया, लिहाजा नासा को यह रेस्क्यू ऑपरेशन रद्द करना पड़ा. उस वक्त नासा के एस्ट्रोफिजिक्स डिवीजन के डायरेक्टर शॉन डोमागल-गोल्डमैन ने इसे बेहद चुनौतीपूर्ण मिशन करार दिया था.

जवाब: इसका मलबा सुरक्षित रूप से समुद्र में गिरने का अनुमान है. हालांकि इसके संभावित रास्ते (री-एंट्री ज़ोन) में भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्से आ सकते हैं.
जवाब: मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे दक्षिण-पश्चिम के शहर इसके गुजरने वाले रास्ते में पड़ रहे हैं. हालांकि, दिल्ली समेत पूरा उत्तर भारत इस खतरे के दायरे से बिल्कुल बाहर और सेफ है.
जवाब: नहीं, वैज्ञानिकों का कहना है कि री-एंट्री ज़ोन सिर्फ वह बड़ा दायरा है, जिसके ऊपर से स्पेसक्राफ्ट गुजरता है. इसका यह मतलब नहीं कि मलबा शहरों की जमीन पर गिरेगा ही. अधिकांश हिस्सा हवा में ही जल जाएगा.
जवाब: स्विफ्ट टेलीस्कोप के गिरने या भारत के संभावित दायरे में आने को लेकर इसरो की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है.
जवाब: नासा के अनुसार, इस 22 साल पुराने मिशन ने अंतरिक्ष के कई बड़े राज खोले हैं. इसके जुटाए डेटा पर 7,000 से अधिक साइंटिफिक रिसर्च पेपर पब्लिश हो चुके हैं, यानी औसतन हर हफ्ते करीब छह नए रिसर्च पेपर तैयार हुए.