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रावण पापी और अधर्मी था, जिसके कारण प्रभु राम ने उसका वध किया. आज भी हर साल दशहरे पर रावण दहन किया जाता है. लेकिन त्रेतायुग में श्रीराम और रावण युद्ध के बाद जब लंकापति रावण का मारा गया तो उसके अंतिम संस्कार को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया. इस युद्ध में रावण के लगभग पूरे कुटुंब का सर्वनाश हो गया था. उसके सारे पुत्र मारे गए थे, विभीषण को छोड़कर सारे भाईयों का भी अंत हो गया था. ऐसे में रावण की चिता को अग्नि देने के लिए उसके परिवार का एकमात्र सदस्य विभीषण ही बचे थे.
वाल्मीकि रामायण में जो वर्णन मिलता है उसके अनुसार, जब भगवान राम ने रावण का वध कर दिया तो उसके विधिवत तरीके से अंतिम संस्कार की तैयारियां की जाने लगीं. लेकिन विभीषण ने भाई रावण की चिता को अग्नि देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि रावण अधर्मी और क्रूर था. उसने गलत आचरण किया था.
इसके बाद भगवान श्रीराम ने विभीषण को समझाया. उन्होंने कहा, "शत्रुता केवल जीवित रहने तक होती है, मृत्यु के साथ ही बैर समाप्त हो जाता है. रावण एक महान और पराक्रमी योद्धा था. अब वह तुम्हारा भी भाई है और मेरा भी. इसलिए उसका अंतिम संस्कार करो."
तब प्रभु राम के समझाने ने पर रावण के छोटे भाई विभीषण ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ लंकापति का अंतिम संस्कार किया था. वैदिक मंत्रों और ऋषियों की परंपरा के अनुसार रावण का दाह-संस्कार किया गया था.
हालांकि कुछ कहानियों में ऐसे भी दावे किए जाते हैं कि रावण के शव को नागुल जाति के लोग या स्थानीय लोग एक गुफा में ले गए थे. बल्कि यह भी कहा जाता है कि श्रीलंका के रेगला (Regala) के जंगलों में एक गुफा में रावण का शव आज भी ममी बनाकर रखा गया है, जिसकी रखवाली जंगली जानवर और सांप करते हैं.
बता दें कि इस साल 20 अक्टूबर 2026 को दशहरा पर्व मनाया जा रहा है और इसी रात को रावण दहन किया जाएगा. हालांकि मैसूर का मशहूर दशहरा पर्व 21 अक्टूबर को मनया जाएगा.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी पुराणों में वर्णित प्रसंगों और उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है. रामायण के विभिन्न संस्करणों और क्षेत्रीय परंपराओं में घटनाओं के वर्णन में अंतर हो सकता है. इस लेख का उद्देश्य धार्मिक कथा और उससे जुड़ी मान्यताओं की जानकारी देना है.)