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छोटी दिवाली को 'भूत चौदस' क्‍यों कहते हैं? 14 दीयों से आत्माओं को रास्ता दिखाने का कनेक्शन!

छोटी दिवाली या नरक चौदस के दिन से इतनी सारी घटनाएं जुड़ी हैं कि इस पर्व के एक नहीं कई नाम हैं. जिसमें इसे भूत चौदस कहना भी शामिल है. आइए जानते हैं कि नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली को भूत चौदस क्‍यों कहते हैं.

छोटी दिवाली को 'भूत चौदस' क्‍यों कहते हैं? 14 दीयों से आत्माओं को रास्ता दिखाने का कनेक्शन!
Image Credit: भूत चौदस का संबंध 14 पीढ़ी के पूर्वजों और नकारात्‍मक शक्तियों से जोड़ा गया है. (Photo:AI)

छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी पर्व 7 नवंबर 2026 यानी कि आज मनाया जा रहा है. कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, रूप चतुर्दशी, छोटी दिवाली, काली चौदस और भूत चौदस कहते हैं. इस पर्व के इतने सारे नाम होने के पीछे कई पौराणिक कथाएं और मान्‍यताएं हैं. जिसमें नरकासुर का वध और उसके बाद आतंक मुक्ति मिलने पर दीप जलाकर दिवाली मनाना, मां काली की पूजा आदि शामिल हैं. आइए जानते हैं 5 नाम वाले इस पर्व से जुड़ी अहम घटनाएं और भूतों से कनेक्‍शन.  

1 पर्व 5 नाम

कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी ऐसी तिथि है, जब 5 पर्व मनाए जाते हैं, जिनके अलग-अलग नाम और अपनी वजहें हैं.

नरक चौदस : मान्‍यता है कि द्वापर युग में भगवान कृष्‍ण ने इसी दिन नरकासुर का वध करके उसकी कैद से 16 हजार महिलाओं को छुड़ाया था और फिर उन सभी से विवाह किया था.

छोटी दिवाली : नरकासुर के आतंक से मुक्ति मिलने पर द्वारकावासियों ने दीप जलाकर खुशी मनाई थी, इसलिए इस दिन छोटी दिवाली मनाते हैं.

रूप चौदस : इस दिन सूर्योदय से पहले अभ्‍यंग स्‍नान करते हैं. इससे सुख, समृद्धि, अच्‍छी सेहत और सुंदरता मिलने की मान्‍यता है. इस दिन महिलाएं उबटन लगाकर, श्रृंगार करके खुद को संवारती हैं इसलिए इसे रूप चौदस कहते हैं.

भूत चौदस : मान्‍यता है कि इस रात अतृप्‍त आत्‍माओं को रास्‍ता दिखाने के लिए 14 दीपक जलाए जाते हैं. इसलिए इसे भूत चौदस कहते हैं.

काली चौदस : इस रात पश्चिम बंगाल में मां महाकाली की विशेष पूजा होती है और तांत्रिक विशेष सिद्धियां पाने के लिए तंत्र-मंत्र करते हैं. इसलिए इसे काली चौदस कहा जाता है.

जलाते हैं यम दीपक

नरक चौदस पर भगवान कृष्‍ण, मां काली की पूजा करने के साथ-साथ यमराज के लिए भी रात को दक्षिण दिशा में दीपक जलाया जाता है. इससे घर-परिवार का संकटों से बचाव होता है.

भूत चौदस क्‍यों मनाते हैं?

पश्चिम बंगाल समेत कुछ पूर्वी राज्‍यों में मान्‍यता है कि इस रात 14 पीढ़ियों के पूर्वज (आत्माएं) अपने परिवार को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आती हैं. लिहाजा उन्‍हें रास्‍ता दिखाने के लिए लोग इस रात 14 दीपक जलाते हैं. साथ ही यह भी माना जाता है कि इन दीयों की ताकत और प्रकाश से बुरी आत्‍माएं और नकारात्‍मक शक्तियां घर से दूर रहती हैं. पूर्वजों की आत्‍माओं से संबंध होने के कारण कई ज्‍योतिषाचार्य इस दिन पितृ दोष से मुक्ति के उपाय करने की सलाह भी देते हैं. 

इसके अलावा इस दिन आयुर्वेद और लोक-परंपरा के अनुसार 14 तरह की हरी पत्तियों का साग भी बनाकर खाया जाता है, इससे बदलते मौसम में शरीर की बीमारियों से रक्षा होती है.

कहां जलाए जाते हैं 14 दीपक?

इन 14 दीपकों में एक दीपक तो यम का होता है, इसके अलावा घर के मुख्‍य द्वार और अंधेरे कोनों में दीपक रखे जाते हैं. ताकि घर का हर कोना रोशनी से जगमगाए और पूर्वजों की आत्‍माओं को घर का रास्‍ता दिख सके.

(Disclaimer- यह जानकारी पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है. Zee News इसकी पुष्टि नहीं करता है. इसे किसी वैज्ञानिक प्रमाण या निश्चित परिणाम के दावे के रूप में न लें.)

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About the Author

Shraddha Jain

Shraddha Jain

पत्रकारिता में 15 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली श्रद्धा जैन वर्तमान में Zee News की नेशनल डिजिटल टीम में बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर सक्रिय हैं. जहाँ वे धर्म, ज्योतिष, ग्रह गोचर, अंक शास्‍त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन और सिम्बॉयसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई की है. बतौर फोटो जर्नलिस्ट करियर शुरू करने वाली श्रद्धा ने दूरदर्शन, दैनिक भास्कर और चौथी दुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.12 वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ बनाने के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया और देश 24*7 जैसे पोर्टल्स में नेतृत्व की भूमिका निभाई. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और हस्तरेखा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन और लेखन करते हुए जटिल विषयों को सरल और रोचक भाषा में पाठकों के सामने पेश कर रही हैं.
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