पूर्वांचल से अरुणाचल का सफर: जानिए क्या हैं भगवान बुद्ध के 'पिपरहवा अवशेष' और क्यों है इनकी इतनी मान्यता?
भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपरहवा अवशेष अरुणाचल प्रदेश के तवांग पहुंच गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दलाई लामा ने इस अवसर पर अपने संदेश दिए हैं. श्रद्धालु 20 नवंबर तक तवांग, बोमडिला और नामसाई में इनके दर्शन कर सकेंगे.
बौद्ध धर्म में पिपरहवा अवशेष का बहुत महत्व है. इस पवित्र पिपरहवा अवशेष को 31 अक्टूबर 2026 अरुणाचल प्रदेश के तवांग पहुंचाया गया है. जिसे लेकर बौद्ध धर्म के लोग बहुत खुश हैं.
अवशेषों के तवांग पहुंचने पर पीएम नरेंद्र मोदी और दलाई लामा ने अपने संदेश भेजे हैं. दोनों का कहना है कि ये मौका भगवान बुद्ध के सोच को याद करने का समय है.
वहीं कुछ लोग ये जानना चाहते हैं कि आखिर ये पिपरहवा अवशेष क्या हैं और बौद्ध धर्म में इन्हें इतना पवित्र क्यों माना जाता है. आज इस खबर में इस बारे में डिटेल से बताएंगे.
क्या हैं पिपरहवा के अवशेष और इनका नाम कैसे पड़ा?
पिपरहवा के अवशेष की बात करें तो इसमें पिपरहवा यूपी के पूर्वांचल में सिद्धार्थनगर जिले का एक गांव है. ये भारत का वही इलाका है, जिसे प्राचीन काल में बुद्ध की नगरी कपिलवस्तु माना जाता है.
वहीं अवशेष की बात करें तो इंसान के मरने के बाद बची हुई पवित्र अस्थि या राख को अवशेष कहते हैं. जब इस गांव की खुदाई हुई थी.
उस समय भगवान बुद्ध के समय की अस्थियां और कुछ खास बर्तन मिले थे. यही वजह है कि यहां मिले अवशेषों को पिपरहवा के पवित्र अवशेष कहा जाता है.
1898 की पहली खोज और फिर ASI की खुदाई
पिपरहवा के अवशेष की खोज दो बार में हुई थी. पहली बार अंग्रेज अफसर विलियम पेपे ने साल 1898 में एक पुराने स्तूप की खुदाई करवाई थी.
खुदाई करवाने के बाद वहां एक बड़ा बक्सा मिला था, जब बक्से को खोला गया तो अंदर छोटे-छोटे बर्तन रखे गए थे.
साथ ही इन बर्तनों को जब चेक किया गया तो अंदर अस्थियों के टुकड़े, राख और कीमती पत्थर भरे मिले थे.
कब हुई थी दूसरी खोज?
पिपरहवा के अवशेष की दूसरी खोज 1971-77 के बीच हुई थी. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी के.एम. श्रीवास्तव की टीम ने इस जगह की फिर से खुदाई करवाई थी.
इस दौरान दो और छोटे बर्तन मिले, जिनमें 22 अस्थि के अवशेष थे. इनमें से 20 टुकड़े दिल्ली के नेशनल म्यूजियम और 2 टुकड़े कोलकाता के म्यूजियम में सुरक्षित रखे गए हैं.
बौद्ध धर्म में इन अवशेषों की पूजा क्यों होती है?
अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि इन अवशेषों की पूजा क्यों होती है. तो कहा जाता है कि जब भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण (यानी देहांत) हुआ था, तो बौद्ध परंपरा के अनुसार उनके शरीर के पवित्र अवशेषों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर स्तूप बनाए गए थे.
बौद्ध धर्म के लोगों के लिए ये ये अवशेष सिर्फ पुरानी चीजें नहीं हैं, बल्कि साक्षात बुद्ध की मौजूदगी का अहसास कराते हैं.
बौद्ध धर्म के लोग इन पवित्र अवशेषों के सामने अपना सिर झुकाते हैं और बुद्ध के बताए अहिंसा, दया और भाईचारे के रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं.
पीएम मोदी और दलाई लामा ने क्या कहा?
पीएम मोदी ने तवांग में आयोजित पावन कार्यक्रम में कहा कि बुद्ध की सोच आज की दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं.
उन्होंने भारत की बौद्ध विरासत को दुनिया से जोड़ने पर जोर दिया था. वहीं दलाई लामा ने अपने संदेश में एक सीधी और सुंदर बात कही कि "अगर आप दूसरों की मदद कर सकते हैं तो जरूर करें, और अगर मदद न कर पाएं, तो कम से कम किसी का नुकसान कभी न करें."
अरुणाचल में कब और कहां कर सकेंगे दर्शन?
इस अवशेष को राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली से तवांग लाया गया है. अब बात करें कि इन अवशेषों का दर्शन कैसे कर पाएंगे तो इसके लिए अरुणाचल प्रदेश में पूरा शेड्यूल तैयार किया गया है:
तवांग मठ: तवांग के मठ में आप 1 से 7 नवंबर तक इस पवित्र अवशेष के दर्शन कर पाएंगे.
बोमडिला (लोअर गोम्पा): ये अवशेष बोमडिला में 8 से 13 नवंबर तक रहने वाला है, तो इस दौरान वहां के लोग दर्शन कर सकते हैं.
नामसाई (गोल्डन पगोडा): 14 से 20 नवंबर तक ये अवशेष नामसाई में रहने वाला है, तो वहां के लोग दर्शन कर सकेंगे.
इतने दिन अरुणाचल प्रदेश में रहने के बाद इन पवित्र अवशेषों को पूरी सुरक्षा के साथ 21 नवंबर 2026 को वापस दिल्ली संग्रहालय पहुंचा दिया जाएगा.
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डिस्क्लेमर: यह लेख पुरातात्विक खोजों, बौद्ध मान्यताओं और आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य पाठकों तक आसान भाषा में सही जानकारी पहुंचाना है.