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मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में सफलता और त्याग का एक अनूठा उदाहरण देखने को मिला, जहां ब्रह्मचारिणी प्रखरश्री दीदी ने जज बनने का अपना सपना पूरा करने के तुरंत बाद सांसारिक जीवन का त्याग करने का फैसला लिया. अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए प्रखरश्री दीदी ने जज की कठिन परीक्षा तो पास कर ली, लेकिन पद और प्रतिष्ठा को अपनाने के बजाय उन्होंने भगवान महावीर द्वारा दिखाए गए संयम, त्याग और आत्म-कल्याण के मार्ग को चुना.
परिवार ने अपनी बेटी को इतनी भव्य विदाई दी कि पूरा शहर इस अनोखी घटना का गवाह बन गया. दरअसल, जैन समाज की पांच दीक्षार्थी बहनों की जैनेश्वरी दीक्षा से पहले एक शानदार 'बिनौली' (शोभा यात्रा) का आयोजन किया गया. इनमें ब्रह्मचारिणी प्रखरश्री दीदी भी शामिल थीं. परिवार ने अपनी लाडली बेटी को विदा करने के लिए शाही अंदाज में बेहद भव्य इंतजाम किए थे. इस शोभा यात्रा में विंटेज कारों का काफिला, सजी-धजी शाही बग्घियां और उदयपुर से बुलाया गया बैंड शामिल था, जो त्याग के मार्ग पर आगे बढ़ रहीं इन पांच महिलाओं के साथ चल रहा था.
रास्तेभर समुदाय के लोगों ने फूलों की वर्षा करके और नारे लगाकर इन बहनों का स्वागत किया. इस कार्यक्रम में जैन समुदाय के बड़ी संख्या में लोगों के साथ-साथ दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने भी हिस्सा लिया. यह चल समारोह जैन दादावाड़ी पहुंचा, जहां पांचों दीक्षार्थी बहनों की गोदभराई की पारंपरिक रस्म निभाई गई.
प्रखरश्री दीदी बताती हैं कि उनके माता-पिता का सपना था कि वह जज की परीक्षा उत्तीर्ण करें. उन्होंने यह सपना पूरा किया, लेकिन बचपन से ही उनके मन में वैराग्य की भावना थी. उनका मानना है कि महावीर के मार्ग पर चलकर वह समाज की बेहतर सेवा कर सकेंगी.
रंगोली दीदी ने बताया कि यह एक भावुक पल है, जो हर बेटी के लिए दुनिया से अंतिम विदाई जैसा है. अभी भले ही उन्होंने रंग-बिरंगे कपड़े पहने हों, लेकिन दीक्षा लेने के बाद वे संयम का जीवन अपनाएंगी और सफेद वस्त्र धारण करेंगी. 22 नवंबर को दीक्षा लेने जा रही ये पांच बहनें जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करेंगी और अपने सांसारिक जीवन को अलविदा कह देंगी. बैतूल की सड़कों पर निकली यह बिनौली केवल एक शोभायात्रा नहीं, बल्कि यह त्याग, आस्था और वैराग्य का एक मार्मिक प्रमाण बन गई.
बैतूल सकल जैन समुदाय के सहयोग से आयोजित इस भव्य कार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि जीवन में सफलता की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती है. किसी के लिए ऊंचा पद और प्रतिष्ठा ही अंतिम लक्ष्य हो सकता है, तो किसी अन्य के लिए त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक कल्याण ही सर्वोच्च उद्देश्य हो सकता है.
रूपेश कुमार की रिपोर्ट