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जिस जेल में कैदी अपनी सजा काट रहे हैं, उसी जेल में अब अंग्रेजी के शब्द गूंज रहे हैं. कोई ABCD सीख रहा है, तो कोई अंग्रेजी के अखबार पढ़ने की कोशिश कर रहा है. मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम की सेंट्रल जेल से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो आपको हैरान कर देगी. यहां कभी स्कूल तक न जाने वाले कैदी अब फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे हैं. वे अंग्रेजी में अपना परिचय दे रहे हैं, अंग्रेजी अखबार पढ़ रहे हैं और हारमोनियम की धुन पर अंग्रेजी गीत गा रहे हैं. इतना ही नहीं, वे संविधान की प्रस्तावना को भी अंग्रेजी में दोहरा रहे हैं. बताया जा रहा है कि जेल प्रशासन ने करीब 130 बंदियों को शिक्षा से जोड़ने के लिए यह खास पहल शुरू की है.
नर्मदापुरम सेंट्रल जेल में खेल-खेल में अंग्रेजी सिखाई जा रही है. कैदियों के लिए एक विशेष ABCD पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें अंग्रेजी के अक्षरों को देशों की राजधानियों और सामान्य ज्ञान के विषयों से जोड़ा गया है. जेल की इस कक्षा में स्मार्ट बोर्ड के जरिए पढ़ाई कराई जाती है. खास बात यह है कि आजीवन कारावास की सजा काट रहे कुछ बंदी ही अपने साथी बंदियों के गुरु बने हैं. जो लोग कभी खुद पढ़ाई-लिखाई से दूर थे, वे अब दूसरों को अंग्रेजी पढ़ना, लिखना और बोलना सिखा रहे हैं.
इस स्कूल का विजन सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है. यहां कैदी हारमोनियम की धुन पर अंग्रेजी गाने गा रहे हैं. चाहे वह 3 इडियट्स फिल्म के गाने को अंग्रेजी में दोहराना हो या भारतीय संविधान की प्रस्तावना को अंग्रेजी में पढ़ना. यहां मनोरंजन और अभ्यास के जरिए सीखने की कोशिश की जा रही है. कैदियों को पार्ट्स ऑफ स्पीच और व्याकरण भी सिखाया जा रहा है. वे रोज अपनी नोटबुक में अंग्रेजी का एक पन्ना लिखते हैं, जिससे उनकी लिखावट और भाषा में सुधार हो रहा है. नर्मदापुरम सेंट्रल जेल में लगभग 130 कैदियों को शिक्षा से जोड़ने की पहल की गई है. अब कैदी अंग्रेजी में अपना परिचय देना, अखबार पढ़ना और पूरे आत्मविश्वास के साथ बातचीत करना सीख रहे हैं.
इस पहल का उद्देश्य कैदियों को शिक्षित करना और जेल से रिहा होने के बाद उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल होने में मदद करना है. जेल की सलाखों के पीछे अब समय सिर्फ अपनी सजा के दिन गिनने में नहीं बीतता, बल्कि किताबों के जरिए एक नई शुरुआत की तैयारी चल रही है. नर्मदापुरम सेंट्रल जेल के भीतर स्थित यह स्कूल एक सशक्त संदेश देता है कि शिक्षा और आत्मविश्वास के सहारे, जेल की चारदीवारी के भीतर से ही बदलाव की राह शुरू हो सकती है.
अभिषेक गौर की रिपोर्ट