शापित हाथी के चमत्कार से जुड़ा है इस धाम का नाम: जानिए किसने और कब बनवाया था ऐरावतेश्वर मंदिर? हैरान कर देगा इसका इतिहास
तमिलनाडु के दारासुरम में स्थित 12वीं सदी का ऐरावतेश्वर मंदिर अपनी गजब के वास्तुकला और संगीतमय सीढ़ियों के लिए जाना जाता है. इस खबर में जानेंगे कि इस यूनेस्को धरोहर के इतिहास और इसके बनने की पूरी कहानी क्या है.
दुनिया भर में कुछ ऐसी पुरानी इमारतें हैं, जिन्हें देखते ही इंसान दंग रह जाता है. ऐसा ही एक अनोखा चमत्कार तमिलनाडु के दारासुरम में देखने को मिलता है.
इसे लोग ऐरावतेश्वर मंदिर के नाम से जानते हैं. कुंभकोणम के पास बसा ये मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं है, बल्कि ये अपने आप में पुराने इतिहास और बेजोड़ कारीगरी का जीता-जागता नमूना है.
यहां कदम रखते ही ऐसा लगता है मानो हम सैकड़ों साल पीछे चोल राजाओं के दौर में पहुंच गए हों. आज हम इस खबर में आपको इस मंदिर के बारे में डिटेल से पूरी जानकारी देंगे.
किसने और कब बनवाया था ये अनोखा मंदिर?
इस मंदिर को बनने की कहानी 12वीं सदी से शुरू होती है. इसे चोल राजवंश के मशहूर राजा राजराज चोल द्वितीय ने बनवाया था.
उन्होंने 1146 से 1173 के बीच इसका निर्माण कराया था. उस जमाने के चोल राजाओं को बड़े और खूबसूरत मंदिर बनवाने का बहुत शौक था.
राजा राजराज ने अपनी सल्तनत का नाम चमकाने और भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति दिखाने के लिए इसे तैयार कराया था.
पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी देखकर आज भी समझ आता है कि उस दौर के कारीगर कितने कमाल के थे.
इंद्र देव के सफेद हाथी ऐरावत से जुड़ा है इसका नाम
शिवजी के इस धाम का नाम एक पुरानी पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है. कहते हैं कि देवराज इंद्र के सफेद हाथी ऐरावत ने इसी जगह आकर भगवान शिव की तपस्या की थी.
एक ऋषि के श्राप की वजह से ऐरावत हाथी की चमड़े का रंग बदल गया था. इसके बाद उसने यहां के पवित्र तालाब में नहाकर शिवजी की पूजा की, जिससे उसकी खोई हुई चमक वापस आ गई.
इसी वजह से मंदिर का नाम ऐरावतेश्वर पड़ा. एक मान्यता ये भी है कि यमराज ने भी अपनी बीमारी ठीक करने के लिए यहां प्रार्थना की थी.
पत्थर का विशाल रथ और यूनेस्को का ऐतिहासिक दर्जा
ऐरावतेश्वर मंदिर की बनावट द्रविड़ शैली का बेहतरीन नमूना है. मंदिर का मुख्य हिस्सा इस तरह तराशा गया है, जैसे पत्थर का कोई बहुत बड़ा रथ खड़ा हो.
इस रथ में खिंचते हुए घोड़े और गोल पहिए बने हैं, जो बिल्कुल असली लगते हैं. दीवारों पर नक्काशी करके पुराणों की कथाएं उकेरी गई हैं.
इसी खूबसूरती की वजह से इसे तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर के साथ महान चोल मंदिरों की गिनती में रखा गया है. यूनेस्को ने भी इसे विश्व धरोहर घोषित किया है.
सीढ़ियों से निकलती हैं संगीत की 7 मीठी धुनें
इस मंदिर की सबसे हैरान करने वाली बात यहां की संगीतमय सीढ़ियां हैं. मंदिर के द्वार के पास बनी 7 सीढ़ियों को इस तरह तराशा गया है कि उन पर हल्का सा थपथपाने पर संगीत के सातों सुर यानी सा रे ग मा पा धा नि की आवाज सुनाई देती है.
बिना किसी आधुनिक मशीन या औजार के उस दौर में पत्थरों से संगीत निकालना आज भी इंजीनियरों को सोच में डाल देता है. ये हुनर उस जमाने के कारीगरों की समझ को दिखाता है.
तमिलनाडु जाएं तो इस मंदिर को देखना क्यों जरूरी है?
ऐरावतेश्वर मंदिर सिर्फ पत्थर और चूने की इमारत नहीं है, यह भारत के पुराने इतिहास की पहचान है. मंदिर के बड़े-बड़े प्रांगण, नक्काशीदार खंभे और यहां का शांत माहौल मन को बहुत सुकून देता है.
अगर आपको पुरानी चीजें, इतिहास या अनोखी जगहें देखने का शौक है, तो तमिलनाडु जाने पर यहां जरूर घूमना चाहिए. ये मंदिर हमें याद दिलाता है कि सैकड़ों साल पहले भी हमारे देश के कारीगर कितने कमाल के थे.
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(Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों, यूनेस्को (UNESCO) के अभिलेखों, चोल साम्राज्य के इतिहास और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है.