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Jodhpur Garba: नवरात्र में मां दुर्गा की भक्ति, शक्ति और आराधना के लिए शहरभर में गरबे के पांडाल सजे हैं. कहीं ढोल की थाप है, तो कहीं डांडिया की खनक, लेकिन सूर्यनगरी जोधपुर में एक ऐसा गरबा पांडाल भी है, जहां न तो बच्चों को संगीत की आवाज सुनाई देती है और न ही वे अपनी खुशी को शब्दों में बयां कर सकते हैं. इसके बावजूद मां दुर्गा की भक्ति में इन बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है. इनकी मुस्कान, कदमों की लय और डांडिया की ताल हर किसी का दिल जीत रही है.

साउंड सुनाई नहीं देता, फिर भी ताल पर थिरकते हैं बच्चे
ज़ी मीडिया की टीम जब पोलो पावटा क्षेत्र में आयोजित इस अनूठे गरबा उत्सव में पहुंची, तो नजारा देखकर हर कोई हैरान रह गया. यहां करीब 100 से 150 मूक-बधिर बच्चे गरबा करते नजर आए. ये बच्चे संगीत को सुन नहीं सकते, लेकिन उसकी लय और कंपन को महसूस करते हुए एक-दूसरे के साथ कदम मिलाकर नृत्य कर रहे हैं. कोई गरबा की गोलाकार लय में घूम रहा है, तो कोई साथी के साथ डांडिया खेलकर अपनी खुशी जाहिर कर रहा है.

इन बच्चों के चेहरों पर खिलती मुस्कान और गरबे के प्रति उत्साह इस बात का अहसास कराता है कि खुशियां महसूस करने के लिए आवाज सुनना या शब्दों में अपनी बात कहना जरूरी नहीं है. जरूरत है तो बस जज्बे, आत्मविश्वास और अपनों के साथ की.
बच्चों ने खुद संभाली आयोजन की जिम्मेदारी
इस आयोजन की खास बात यह भी है कि गरबे का पूरा कार्यक्रम बच्चों ने आपसी सहयोग से आयोजित किया. अपनी सीमाओं को पीछे छोड़कर इन बच्चों ने साबित किया कि इच्छाशक्ति हो, तो हर चुनौती का सामना किया जा सकता है. गरबे के दौरान बच्चे एक-दूसरे के इशारों को समझते हुए तालमेल बनाते हैं और पूरे उत्साह के साथ उत्सव का आनंद लेते हैं.

परिजनों और समाज का मिल रहा साथ
इस आयोजन में धीरज सुथार, रेखा शर्मा और नवनीत कुमार महेश गहलोत रवि शर्मा सहित अन्य सहयोगी बच्चों का हौसला बढ़ा रहे हैं, उनके बच्चे भी इस आयोजन में शामिल हैं. परिजनों और आसपास के लोगों के सहयोग से बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने और समाज के साथ उत्सव मनाने का अवसर मिल रहा है.
भक्ति में शब्द नहीं, भावना जरूरी

नवरात्र के इस माहौल में इन बच्चों का गरबा समाज को एक खास संदेश दे रहा है. मां दुर्गा की आराधना के लिए न आवाज जरूरी है, न शब्दों की अभिव्यक्ति. सच्ची भक्ति दिल से महसूस की जाती है. पोलो पावटा का यह गरबा पांडाल सिर्फ नृत्य और डांडिया का आयोजन नहीं, बल्कि हौसले, समानता और खुशियों का उत्सव बन गया है. इन बच्चों के थिरकते कदम बता रहे हैं कि जिंदगी का संगीत कानों से नहीं, दिल से महसूस किया जाता है.
REPORTER- RAKESH KUMAR BHARDWAJ