अरब सागर में खारा नहीं होगा साबरमती का मीठा पानी, अरावली की पहाड़ियां चीरकर पहुंचेगा उदयपुर
Dewas Water Project : झीलों की नगरी उदयपुर में पानी की कमी को दूर करने के लिए भजनलाल सरकार ने ऐतिहासिक देवास परियोजना (तृतीय और चतुर्थ चरण) पर काम की रफ्तार तेज कर दी है. करीब 1,690 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण परियोजना से साबरमती बेसिन का बेका बहने वाला पानी,अब उदयपुर की पिछोला और फतहसागर झीलों को पूरे साल लबालब रखेगा.
साबरमती कहां से कहां बहती है ?
साबरमती , राजस्थान के उदयपुर जिले में अरावली की पहाड़ियों कोटड़ा और गोगुंदा क्षेत्र से होता है. यहां से निकलकर ये दक्षिण की ओर गुजरात में एंट्री करती है और आखिरकार अरब सागर में जाकर मिल जाती है.
साबरमती कब ओवरफ्लो रहती है और मीठा पानी खारा होने से कैसे बचेगा ?
मानसून के दौरान जब भारी बारिश होती है,तो साबरमती बेसिन और उसकी सहायक नदियों (जैसे वाकल नदी)में पानी का बहाव बेहद तेज हो जाता है. चूंकि राजस्थान में इस पानी को रोकने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी,इसलिए ये मीठा पानी बहकर गुजरात के रास्ते सीधे अरब सागर (समुद्र)में गिर जाता था और खारा हो जाता था. देवास प्रोजेक्ट के तहत बांध बनाकर इस ओवरफ्लो पानी को रोक लिया जाएगा,जिससे मीठा पानी समुद्र में जाकर बर्बाद होने से बच जाएगा.
पानी उदयपुर कैसे लाया जाएगा ?
साबरमती बेसिन के पानी को रोका जाएगा फिर अरावली पहाड़ियों के बीच 14.6 किलोमीटर लंबी दो सुरंगों (टनल)बनाकर पानी को डायवर्ट करके उदयपुर की झील प्रणाली से जोड़ा जाएगा. पानी पहले सुरंगों से होता हुआ देवास-द्वितीय (आकोदड़ा बांध) तक पहुंचेगा और वहीं से प्राकृतिक नदी मार्गों यानी कि बूझड़ा और अमरजोक के रास्ते सीधे पिछोला झील आ जाएगा.
देवास प्रोजेक्ट क्या है - खर्च और किसको फायदा ?ये एक वाटर-डायवर्जन प्रोजेक्ट है, जो राजस्थान में बेकार बहने वाले पानी को मोड़कर पानी की कमी वाले इलाकों तक पहुंचाता है. पहला चरण 1974 में और दूसरा चरण 2015 में पूरा हुआ था.
कुल लागत: इस प्रोजेक्ट (फेस-3 और 4) पर लगभग 1,690 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं.
- उदयपुर शहर को हर साल 1,000 मिलियन क्यूबिक फीट (MCFT) अतिरिक्त पानी मिलेगा.
- पिछोला और फतहसागर झीलें पूरे साल भरी रहेंगी.
- पर्यटन,बोटिंग और होटल इंडस्ट्री चमकेगी,जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा.
- आसपास के भूजल स्तर में सुधार होगा.
अरावली के बीच कैसे बनेगी सुरंग ?
सबसे खास बात ये है कि इस सुरंग में पानी को खींचने या बहाने के लिए किसी मोटर या हैवी पंपिंग स्टेशन की जरूरत नहीं होगी. सुरंगों को अरावली की पहाड़ियों के बीच वैज्ञानिक ढलान के सिद्धांत पर डिजाइन किया गया है. ऊंचे बांध से नीचे की ओर पानी ग्रेविटी के चलते अपने आप बहेगा.
दो बांध कहां-कहां बन रहे हैं ?
गोगुंदा तहसील के अंतर्गत दो बड़े बांधों का निर्माण किया जा रहा है
देवास-चतुर्थ बांध: गोगुंदा के अंबावा गांव के पास (क्षमता: 390 MCFT)
यहां से 4.15 किमी लंबी लिंक टनल से पानी देवास-तृतीय में जाएगा.
देवास-तृतीय बांध: गोगुंदा के नाथियाथल गांव के पास (क्षमता: 703 MCFT)
यहां से 10.50 किमी लंबी मुख्य टनल के जरिए पानी आकोदड़ा बांध (देवास-II) पहुंचेगा.
उदयपुर के साथ किस-किस क्षेत्र ?
शहर की बढ़ती आबादी के लिए रोजाना लगभग 3.43 करोड़ लीटर अतिरिक्त पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित होगी. गोगुंदा और कोटड़ा क्षेत्र के लगभग 186 ग्रामीण-आदिवासी गांवों को पीने के शुद्ध पानी का स्थायी समाधान मिलेगा. उदयपुर के साथ-साथ आसपास के टूरिज्म हब और ग्रामीण इलाकों में जल सुरक्षा मजबूत होगी.
कब तक देवास प्रोजेक्ट पूरा होने का लक्ष्य है ?
देवास परियोजना के तीसरे और चौथे चरण का शिलान्यास मार्च 2024 में हुआ था. राज्य सरकार ने इसे 44 महीने (लगभग 3.5 से 4 साल) की समय-सीमा में तेजी से पूरा करने का लक्ष्य रखा है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के निर्देश पर प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग की जा रही है,ताकि अगले 3 सालों के भीतर उदयपुर को इसका पूरा लाभ मिलने लगे.