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राजस्थान पंचायत चुनाव : सत्ता की वो पहली सीढ़ी,जहां से सरपंच और प्रधान बने मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता

राजस्थान में पंचायती राज चुनावों का बिगुल जल्द ही बजने वाला है। गांवों की चौपालों से लेकर ढाणियों तक कि 'इस बार सरपंच कौन बनेगा ?' या 'प्रधान का टिकट किसे मिलेगा ?' पंचायती राज व्यवस्था को हमेशा से भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत और बुनियादी नींव माना जाता रहा है. 2 अक्टूबर 1959 को देश में पंचायती राज व्यवस्था का औपचारिक शुभारंभ भी राजस्थान के नागौर से ही हुआ था.

Written By Pragati Pant Awasthi
Published: Oct 15, 2026, 02:07 PM IST | Updated: Oct 15, 2026, 02:44 PM IST
Image Credit: rajasthan panchayat elections path to power sarpanch to cm leaders
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राजस्थान की राजनीति में पंचायत चुनाव अब सिर्फ गांव की नालियों,सड़कों या पानी के प्रबंधन तक सीमित नहीं रह गया. ये चुनाव राज्य और देश की सर्वोच्च राजनीति का वो 'लॉन्चपैड'बन चुका हैं, जहां से निकलकर कई नेताओं ने शीर्ष पदों तक का सफर तय किया है.

आखिर क्यों होती है पंचायत चुनाव में टिकट की इतनी मारामारी ?

पंचायती राज चुनाव आते ही राजनीतिक दलों के कार्यालयों से लेकर स्थानीय सांसदों और विधायकों के घरों पर टिकट चाहने वालों की भारी भीड़ लग जाती है. इस भारी प्रतिस्पर्धा और होड़ के पीछे कुछ बेहद ठोस राजनीतिक वजह हैं. 
1- ग्राम पंचायत (सरपंच),पंचायत समिति (प्रधान)या जिला परिषद का चुनाव वो पहला दरवाजा है,जो मुख्यधारा की राजनीति एंट्री दे सकता है.
2-एक सरपंच या प्रधान का अपने इलाके के हर परिवार और उनकी बुनियादी समस्याओं से सीधा वास्ता होता है. ये ही जनाधार भविष्य के विधानसभा चुनावों में उनके लिए वोट बैंक का काम कर सकता है.
3-पंचायत स्तर पर राजनीति की ट्रेनिंग भी हो जाती है,जैसे- जनता के गुस्सा को कैसे संभालना है और बीडीओ या कलेक्टर से काम निकलवाने का हुनर भी इस दौरान सीखा जा सकता है.
4-पंचायत स्तर पर लगातार जीत और जनाधार, प्रदेश स्तर पर पहचाना जाता है. विधायकों के लिए भी ऐसे मजबूत सरपंच या प्रधान जीत की गारंटी बन सकते हैं.


मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा : सरपंच से राज्य के मुखिया
जब भी पंचायती राज व्यवस्था से निकले नेताओं की बात होगी,तो राजस्थान के वर्तमान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का नाम सबसे बड़ा उदाहरण रहेगा. उनका राजनीतिक सफर इस बात का सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण है कि कैसे एक आम कार्यकर्ता अपनी मेहनत के बलबूते राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है.भजनलाल शर्मा, भरतपुर जिले के एक छोटे से गांव अटारी से है. उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत सीधे किसी बड़े पद से नहीं, बल्कि पंचायत स्तर से ही की थी. साल 1994 में, जब वो सिर्फ 27 साल के युवा थे, तब वे अपने गांव अटारी के सरपंच चुने गए थे. उन्होंने सरपंच का ये पद एक बार नहीं. अटारी के सरपंच से शुरू हुआ उनका ये सफर आगे चलकर जिलाध्यक्ष, प्रदेश महामंत्री और फिर सांगानेर से विधायक बनने के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री पद (2023) तक जा पहुंचा है.

गोविंद सिंह डोटासरा : पंचायत समिति प्रधान से कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष 
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मौजूदा अध्यक्ष और पूर्व शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा की कहानी भी पंचायती राज व्यवस्था की असली ताकत को बयां करती है. डोटासरा ने अपनी शुरुआत वकालत से की थी,लेकिन उनकी राजनीतिक उड़ान पंचायत की राजनीति से ही शुरू हुई. उनका पहला बड़ा चुनावी पड़ाव साल 2005 में आया, जब वे सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ पंचायत समिति के प्रधान निर्वाचित हुए. एक प्रधान के रूप में उन्होंने अपने इलाके के लोगों से ऐसा सीधा जुड़ाव बनाया कि सिर्फ तीन साल बाद, 2008 में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दे दिया. उन्होंने अपना पहला विधानसभा चुनाव महज 34 वोटों के मामूली अंतर से जीता था. लेकिन, पंचायत स्तर से मिले अनुभव ने उन्हें इतना परिपक्व बना दिया था कि इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

रामेश्वर डूडी: नोखा के प्रधान से नेता प्रतिपक्ष तक 
राजस्थान के कद्दावर किसान नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी का राजनीतिक उदय भी पंचायत की राजनीति से ही हुआ था. साल 1995 में अपने पिता के निधन के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और डूडी 1995 में बीकानेर जिले की नोखा पंचायत समिति से प्रधान चुने गए और 1999 तक इस पद पर रहे. जमीनी पकड़ के चलते वे आगे चलकर बीकानेर से लोकसभा सांसद बने और बाद में नोखा से विधायक चुने गए. राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका ने ये साबित करती है कि पंचायत समिति का एक पद राज्य स्तर की राजनीति में स्थापित होने का सबसे बेहतरीन जरिया बन सकता है.

हरलाल सिंह खर्रा: सरपंच से शुरू हुई राजनीतिक विरासत
शेखावाटी क्षेत्र के दिग्गज नेता रहे हरलाल सिंह खर्रा ने भी अपनी शुरुआत पंचायत स्तर से ही की थी. साल 1957 से 1961 तक महरौली के सरपंच रहे और उसके बाद 1965 से 1967 तक पंचायत समिति के प्रधान पद पर काबिज रहे. सरपंच और प्रधान के रूप में हासिल की गई लोकप्रियता ने ही उन्हें विधानसभा तक पहुंचाया और वे राजस्थान की राजनीति के बड़े चेहरे बने. उनकी विरासत को आगे बढ़ाया उनके पुत्र, झाबर सिंह खर्रा ने जो राजस्थान सरकार में  मंत्री है.

कुलमिलाकर राजस्थान में पंचायती राज चुनाव महज स्थानीय मुद्दे सुलझाने का अखाड़ा नहीं हैं. ये सत्ता का वो एंट्री गेट है, जो सीधे विधानसभा और लोकसभा के गलियारों में खुलता है. जब कोई प्रत्याशी सरपंच या प्रधान का चुनाव लड़ता है,तो वो केवल एक गांव या ब्लॉक का नेता नहीं बन रहा होता है. वो भविष्य के एक बड़े राजनेता के रूप में अपनी नींव रख रहा होता है.

 

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मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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