राजस्थान पंचायत चुनाव के पहले चरण में ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर मतदान किया. गांव वालों ने अपना फर्ज निभा दिया. अब नेताओं की बारी है. किसी ने खेत छोड़ा, किसी ने दुकान तो कोई घर का काम छोड़कर वोट डालने पहुंचा, लेकिन सवाल ये है कि वोट देने वाले गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित क्यों हैं. पीने के पानी के लिए 400 रुपए का टैंकर, इलाज के लिए शहर की दौड़, पढ़ाई के लिए दूर जाते बच्चे और सड़कों के लिए लंबा इंतजार... चुनाव से पहले वादों की बरसात करने वाले प्रत्याशियों को ग्रामीणों ने ईवीएम का बटन दबाकर पांच साल की जिम्मेदारी सौंप दी है. अब मतदाताओं का साफ संदेश है कि हमने वोट देकर अपना फर्ज निभाया, अब जीतने वाले वादे नहीं, काम करके दिखाएं.
गांव में पानी नहीं है, तो 400 रुपए खर्च कर टैंकर मंगवाना पड़ता है. इलाज करवाना हो तो शहर की दौड़ लगानी पड़ती है. सड़क नहीं होने से सफर मुश्किल है और बच्चों को अच्छी पढ़ाई के लिए गांव से दूर भेजना पड़ता है. कहीं नालियां नहीं हैं, तो कहीं स्ट्रीट लाइट का इंतजार है. ये उन गांवों की तस्वीर है, जहां हर पांच साल में चुनाव आते हैं, विकास के वादे होते हैं, लेकिन ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतें आज भी पूरी नहीं हो पाई हैं.
पंचायती राज चुनाव के पहले चरण में मतदान केंद्रों पर कुछ अलग ही तस्वीर नजर आई. किसी ने खेत का काम छोड़ा, किसी ने दुकान खोलने से पहले मतदान किया, तो कोई घर-गृहस्थी का काम छोड़कर वोट डालने पहुंचा. बुजुर्ग लाठी के सहारे मतदान केंद्र पहुंचे, तो पहली बार वोट डालने वाले युवाओं में भी उत्साह दिखाई दिया. लेकिन मतदान केंद्रों पर लगी कतारों के बीच एक सवाल भी खड़ा था. आखिर गांवों की बदहाली कब दूर होगी. ग्रामीण मतदाताओं का कहना है कि उन्होंने लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा दी है. अब जिन्हें ईवीएम का बटन दबाकर पांच साल के लिए जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, उन्हें भी अपना फर्ज निभाना होगा.
मतदान केंद्रों पर वोट डालने आए ग्रामीण मतदाताओं का कहना है कि चुनाव के समय गांव में सड़क, पानी, स्कूल, अस्पताल और रोजगार के वादे करने वाले जनप्रतिनिधि जीतने के बाद गांव को भूल न जाएं. ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ी समस्या पेयजल की बनी हुई है. कई जगह लोगों को पानी के लिए टैंकर मंगवाने पड़ते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक एक टैंकर पर करीब 400 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. यानी जिस पानी को बुनियादी सुविधा के तौर पर घर तक पहुंचना चाहिए, उसके लिए भी जेब ढीली करनी पड़ रही है.
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी ग्रामीणों की चिंता बढ़ाती है. गांव में पर्याप्त इलाज नहीं मिलने पर मरीजों को शहर जाना पड़ता है. खराब सड़कों के कारण यह सफर और मुश्किल हो जाता है. शिक्षा के लिए भी कई परिवारों को बच्चों को दूर भेजना पड़ता है. ग्रामीणों की मांग है कि गांवों में ही बेहतर स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और आवागमन के साधन उपलब्ध कराए जाएं.
पंचायत चुनाव आते ही गांवों में विकास के वादों की लंबी लिस्ट तैयार हो जाती है. कोई सड़क बनवाने का भरोसा देता है, तो कोई घर-घर पानी पहुंचाने की बात करता है. कोई स्कूल-कॉलेज खुलवाने का दावा करता है, तो कोई खेल मैदान, नालियां और स्ट्रीट लाइट लगवाने का दावा करता है. ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन वादों में से कितने वादे धरातल पर उतरेंगे. 5 साल बाद जब फिर चुनाव होंगे, तो क्या गांव की तस्वीर बदली होगी या फिर इन्हीं समस्याओं को लेकर नए सिरे से वादे किए जाएंगे. मतदाताओं ने साफ कहा है कि अब भाषण नहीं, विकास का हिसाब चाहिए.
बहरहाल, चुनाव कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहां वोट देने के बाद पांच साल तक हर सुविधा घर पहुंचाने की गारंटी मिल जाए, लेकिन यह भी सच है कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. उन्हें समस्याओं को संबंधित विभागों तक पहुंचाने, बजट दिलाने और काम पूरा करवाने के लिए जवाबदेह होना होगा.