राजस्थान पंचायत चुनाव में परिवारवाद पर घिरी कांग्रेस-बीजेपी: नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट, कार्यकर्ताओं की हिस्सेदारी पर उठे सवाल
राजस्थान पंचायत चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के टिकट वितरण को लेकर परिवारवाद की बहस तेज हो गई है. दोनों दलों में कई नेताओं के बेटे, बेटियों, पत्नियों और अन्य रिश्तेदारों को टिकट मिला है. कांग्रेस विधायक अनीता जाटव के टिकट वितरण पर लगाए गए आरोपों से राजनीतिक चर्चा बढ़ गई है.
राजस्थान में पंचायती राज चुनाव के बीच परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है. जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के नेताओं के परिजनों की दावेदारी चर्चा में है. कहीं पूर्व मंत्री की बेटी और दिवंगत नेता की बहू को टिकट मिला है, तो कहीं विधायक के बेटे, नेताओं की पत्नियां और अन्य रिश्तेदार चुनावी मैदान में हैं. भाजपा में नगरीय विकास एवं आवासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा के बेटे दुर्गा सिंह खर्रा के निर्दलीय नामांकन ने इस बहस को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है.
इस बार सवाल केवल यह नहीं है कि नेताओं के परिवारों को टिकट क्यों मिले, बल्कि यह भी है कि पार्टी संगठन में लंबे समय से काम कर रहे कार्यकर्ताओं को कितनी प्राथमिकता मिली. पंचायत चुनाव में परिवार की राजनीतिक पहचान, स्थानीय जनाधार, जातीय समीकरण और जीतने की संभावना के बीच उम्मीदवार चयन की कसौटी पर चर्चा तेज है.
कांग्रेस में गोविंदराम मेघवाल की बेटी को मिला टिकट
बीकानेर में पूर्व कैबिनेट मंत्री गोविंदराम मेघवाल की बेटी सरिता चौहान को जिला परिषद के वार्ड 26 से कांग्रेस का टिकट दिया गया है. इसी जिले में दिवंगत कांग्रेस नेता रामेश्वर डूडी के बेटे अजय डूडी की पत्नी निकिता डूडी को वार्ड 13 से प्रत्याशी बनाया गया है. इन दोनों नामों के साथ बीकानेर में कांग्रेस के टिकट वितरण में राजनीतिक विरासत का मुद्दा चर्चा में है.
उदयपुर में विधायक पुष्करलाल डांगी के बेटे को बनाया गया उम्मीदवार
उदयपुर जिले में मावली विधायक पुष्करलाल डांगी के बेटे शांतिलाल डांगी को जिला परिषद वार्ड 43 से उम्मीदवार बनाया गया है. वहीं आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक बंशीलाल मीणा के बेटे दीपक मीणा को वार्ड 21 से टिकट मिला है. वार्ड 32 के उम्मीदवार राज सिंह झाला को पूर्व विधायक गजेंद्र सिंह शक्तावत का भांजा बताया गया है. अजमेर में पूर्व विधायक महेंद्र सिंह गुर्जर की पत्नी और पूर्व प्रधान कमलेश गुर्जर को भी कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है.
इन उदाहरणों से कांग्रेस के टिकट वितरण में राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी का मुद्दा सामने आया है. हालांकि, किसी उम्मीदवार को केवल उसके पारिवारिक संबंधों के आधार पर अयोग्य ठहराना उचित नहीं होगा. असल सवाल यह है कि उम्मीदवार का अपना जनाधार, संगठन में योगदान और क्षेत्र में सक्रियता कितनी है.
भाजपा में भी नेताओं के परिवारों की दावेदारी
भाजपा में भी राजनीतिक परिवारों से जुड़े उम्मीदवारों की चर्चा है. भीलवाड़ा में पूर्व कैबिनेट मंत्री कालूलाल गुर्जर की पत्नी और पूर्व प्रधान सरोज गुर्जर को उम्मीदवार बनाया गया है. सरपंच संघ के जिला अध्यक्ष शक्ति सिंह कालियास की पत्नी तारा कंवर को भी टिकट मिला है.
इस बीच सीकर जिले की श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के वार्ड 19 से मंत्री झाबर सिंह खर्रा के बेटे दुर्गा सिंह खर्रा ने निर्दलीय नामांकन दाखिल किया. अक्टूबर के मध्य में सामने आए इस घटनाक्रम ने स्थानीय भाजपा राजनीति में चर्चा बढ़ा दी. दुर्गा सिंह ने स्थानीय कार्यकर्ताओं और लोगों की नाराजगी को अपने फैसले की वजह बताया. उन्होंने यह भी कहा कि वे भाजपा की विचारधारा से जुड़े हैं. ऐसे में यह मामला केवल परिवारवाद की बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय संगठन और उम्मीदवार चयन से जुड़े असंतोष को भी सामने लाता है.
झुंझुनू में जिला प्रमुख की कुर्सी पर नजर
झुंझुनू में जिला प्रमुख पद के लिए महिला आरक्षण के बाद राजनीतिक परिवारों से जुड़ी महिला दावेदारों को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं. हर्षिनी कुलहरि जो पूर्व सांसद एवं विधायक नरेंद्र कुमार के परिवार से जुड़ी हैं और भाजपा नेता राजेश बाबल की पत्नी पूजा बाबल के नाम संभावित दावेदारों के रूप में सामने आए हैं. कांग्रेस की ओर से सांसद विजेंद्र सिंह ओला की पत्नी और पूर्व जिला प्रमुख राजबाला ओला का नाम भी चर्चा में रहा है.
इन नामों को आधिकारिक टिकट की घोषणा से अलग संभावित दावेदारी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. जिला प्रमुख का पद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण उम्मीदवार चयन में पार्टी नेतृत्व, स्थानीय गुटों और सामाजिक समीकरणों की भूमिका अहम मानी जा रही है.
टिकटों की सूची के साथ बढ़ी अंदरूनी खींचतान
17 अक्टूबर तक सामने आई चुनावी तस्वीर में प्रत्याशियों की सूची और स्थानीय असंतोष दोनों चर्चा में हैं. कांग्रेस ने जयपुर जिले की आमेर, जालसू और रामपुरा डाबड़ी पंचायत समितियों के लिए दूसरे चरण में 51 उम्मीदवारों की सूची जारी की है. पार्टी ने इन तीनों पंचायत समितियों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण से आगे बढ़ते हुए 60 प्रतिशत से अधिक महिला प्रत्याशियों को अवसर दिया है.
वहीं सीकर जिला परिषद के 49 वार्डों में कांग्रेस ने 48 उम्मीदवार घोषित किए हैं और एक वार्ड खाली रखा है. जालोर में सभी 43 वार्डों के लिए प्रत्याशियों की घोषणा की गई है. टिकटों की इन सूचियों के बीच अब राजनीतिक दलों के सामने स्थानीय असंतोष को संभालने और कार्यकर्ताओं को साथ रखने की चुनौती है.
दूसरी ओर करौली में कांग्रेस विधायक अनीता जाटव ने टिकट वितरण को लेकर अपनी ही पार्टी के जिला नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने चुनाव चिह्न आवंटन में गड़बड़ी का आरोप लगाया है. ये आरोप फिलहाल उनके बयान के रूप में सामने आए हैं. इनकी स्वतंत्र पुष्टि और पार्टी नेतृत्व का पक्ष अलग से महत्वपूर्ण होगा. यह घटनाक्रम बताता है कि पंचायत चुनाव में विवाद केवल परिवारवाद तक सीमित नहीं, बल्कि टिकट वितरण की पारदर्शिता भी बड़ा मुद्दा बन रही है.
परिवारवाद बनाम कार्यकर्ता असली कसौटी क्या ?
पंचायत चुनाव स्थानीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. गांव की सड़क, पेयजल, नाली, स्वच्छता, सरकारी योजनाओं का लाभ और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे सीधे मतदाताओं से जुड़े हैं. ऐसे में राजनीतिक परिवारों से आने वाले उम्मीदवारों के सामने भी अपने काम और जनसंपर्क के आधार पर समर्थन जुटाने की चुनौती रहेगी.
राजनीतिक विरासत किसी उम्मीदवार को पहचान, संसाधन और संपर्क का लाभ दे सकती है. दूसरी ओर संगठन में वर्षों तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं को यदि टिकट नहीं मिलता, तो उनमें असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है. हालांकि, परिवार से जुड़ा होना अपने आप में अयोग्यता का प्रमाण नहीं है, उसी तरह किसी बड़े नेता का रिश्तेदार होना जनसेवा और जीत की गारंटी भी नहीं है.
पंचायत चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों के सामने असली परीक्षा यही है कि वे राजनीतिक विरासत, सामाजिक प्रतिनिधित्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं. आखिरकार मतदाताओं का फैसला ही तय करेगा कि राजनीतिक परिवारों की पकड़ मजबूत होती है या स्थानीय जनाधार रखने वाले नए चेहरों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है.