राजस्थान निकाय चुनाव: 197 सीटों पर भाजपा की सुनामी, मंत्री के भाई की हार, कांग्रेस की फिसलन और 'आप' के चौंकाने वाले धमाके की पूरी कहानी
Rajasthan News: राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों में भाजपा ने 197 निकायों में मेयर-चेयरमैन पद जीते. कांग्रेस कई जगह बढ़त के बावजूद पिछड़ी. आप ने भी खाता खोला. निर्दलीय-बागियों ने कई निकायों में बोर्ड गठन का गणित बदल दिया.
Rajasthan Politics News: इस बार के राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे कई मायनों में चौंकाने वाले रहे. कहीं भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए बड़ी संख्या में मेयर और चेयरमैन के पद अपने नाम किए, तो कई जगह कांग्रेस मजबूत स्थिति में होने के बावजूद बोर्ड बनाने से पीछे रह गई. कुल 197 निकायों में भाजपा ने मेयर और चेयरमैन पदों पर जीत हासिल की. वहीं कांग्रेस को कई जगहों पर पार्टी के अंदर की खींचतान और बेहतर तालमेल नहीं होने का नुकसान उठाना पड़ा. इन चुनावों में आम आदमी पार्टी ने भी कुछ सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. सबसे ज्यादा चर्चा उन नतीजों की रही, जहां बड़े राजनीतिक परिवारों और रसूखदार नेताओं के प्रभाव के बावजूद स्थानीय समीकरण पूरी तरह अलग नजर आए. इससे यह साफ हुआ कि निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दे, पार्षदों के समीकरण और जमीनी स्तर की राजनीति का असर काफी अहम रहता है.
राजधानी में भाजपा की रणनीतिक बढ़त और मेयर पद पर कब्जा
प्रदेश की राजधानी जयपुर होने के कारण यहां के निकाय चुनावों पर पूरे राजस्थान की नजर थी. जयपुर में मेयर पद को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला काफी अहम माना जा रहा था. भाजपा ने वार्ड स्तर पर अपने संगठन को सक्रिय रखा और पार्षदों के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया. पार्टी की रणनीति का असर बोर्ड गठन के दौरान भी दिखाई दिया. भाजपा अपने मेयर पद के उम्मीदवार को जीत दिलाने में कामयाब रही और नगर निगम की सत्ता अपने हाथ में रखी.
जयपुर का नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि राजधानी में जीत का असर सिर्फ नगर निगम की राजनीति तक सीमित नहीं रहता. यहां होने वाला हर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बनता है. भाजपा ने वार्ड स्तर पर संपर्क, पार्षदों की संख्या और बोर्ड गठन के लिए जरूरी समर्थन जुटाने पर फोकस किया. इसके चलते पार्टी ने मेयर पद पर अपना कब्जा बरकरार रखा.
बीकानेर -दिग्गजों के गढ़ में उलटफेर और चौंकाने वाले समीकरण
बीकानेर में इस बार चुनावी तस्वीर काफी अलग दिखाई दी. यहां कई इलाकों में स्थानीय समीकरण बदले हुए नजर आए. जातीय समीकरणों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर नेताओं और प्रत्याशियों के बीच बने रिश्तों ने भी नतीजों पर असर डाला. जिन जगहों को पहले से किसी एक दल के मजबूत प्रभाव वाला माना जा रहा था, वहां मुकाबला उम्मीद से अलग दिखाई दिया.
कई दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों में भी पार्टी के लिए रास्ता आसान नहीं रहा. अंदरूनी खींचतान, टिकट को लेकर नाराजगी और विरोधी दलों की रणनीति ने समीकरण बदल दिए. ऐसे में बीकानेर के नतीजों ने यह दिखाया कि स्थानीय निकाय चुनाव में सिर्फ बड़े नेताओं का प्रभाव ही जीत की गारंटी नहीं होता. वार्ड स्तर पर बने समीकरण और उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ भी काफी मायने रखती है.
जोधपुर- पूर्व मुख्यमंत्री और सियासी दिग्गजों के गृह जिले में कड़ी टक्कर
जोधपुर को राजस्थान की राजनीति में एक अहम शहर माना जाता है. यह पूर्व मुख्यमंत्री और कई बड़े राजनीतिक नेताओं का गृह जिला भी रहा है. ऐसे में यहां के निकाय चुनावों को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पूरी ताकत लगाई. कई जगह दोनों प्रमुख दलों के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिला.
कांग्रेस ने कुछ जगहों पर पारंपरिक तरीके से अलग रणनीति अपनाई और गैर-पार्षद चेहरों पर भी भरोसा जताया. पार्टी ने स्थानीय समीकरणों को देखते हुए अलग-अलग स्तर पर रणनीति बनाई. हालांकि इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं रहा. कुछ जगह पार्टी को फायदा मिला, तो कुछ जगह अपेक्षित परिणाम नहीं आए. दूसरी ओर भाजपा ने भी अपने संगठन और पार्षदों के समीकरण के आधार पर बोर्ड बनाने की कोशिश की. जोधपुर में मुकाबला काफी कड़ा रहा और कई जगह आखिरी समय तक तस्वीर साफ नहीं थी.
कोटा-आखिरी वक्त के फैसलों और बाड़ेबंदी का असर
कोटा में निकाय चुनाव के दौरान टिकट वितरण से लेकर बोर्ड गठन तक काफी हलचल देखने को मिली. उम्मीदवारों के चयन को लेकर दोनों दलों के अंदर खींचतान की स्थिति बनी रही. टिकट को लेकर नाराज नेताओं और संभावित बगावत को संभालना भी पार्टियों के लिए चुनौती रहा.
चुनाव के बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी ने भी कोटा की राजनीति में खूब चर्चा बटोरी. अपने पार्षदों को टूटने से बचाने और दूसरे दल के संपर्क में जाने से रोकने के लिए उन्हें होटल और रिसॉर्ट में रखा गया. बोर्ड गठन के समय एक-एक पार्षद का समर्थन महत्वपूर्ण हो गया था. यही वजह रही कि पार्टियों ने अपने संख्याबल को सुरक्षित रखने के लिए आखिरी समय तक पूरी निगरानी रखी. इसका असर बोर्ड गठन के समीकरणों पर भी साफ दिखाई दिया.
197 निकायों में भाजपा की सुनामी और स्पष्ट बहुमत
राजस्थान के कुल 197 निकायों में भाजपा ने मेयर और चेयरमैन पदों पर सबसे ज्यादा जीत दर्ज की. बड़ी संख्या में निकायों में पार्टी के बोर्ड बनने से भाजपा के संगठन और शहरी क्षेत्रों में उसके आधार की तस्वीर सामने आई. कई जगह पार्टी ने सीधे बहुमत के दम पर बोर्ड बनाया, जबकि कुछ निकायों में उसे निर्दलीयों या दूसरे पार्षदों का समर्थन लेना पड़ा.
भाजपा के लिए इन नतीजों का एक अहम पहलू यह रहा कि पार्टी ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपने संगठन को चुनाव के दौरान सक्रिय रखा. वार्ड स्तर पर पार्षदों की संख्या जुटाने से लेकर बोर्ड गठन तक पार्टी ने रणनीति के साथ काम किया. 197 निकायों में सबसे ज्यादा मेयर और चेयरमैन पद हासिल करना इस चुनाव का सबसे बड़ा नतीजा रहा.
शुरुआती बढ़त के बावजूद कांग्रेस का कई जगहों पर पिछड़ना
कांग्रेस के लिए इन चुनावों में कई जगहों पर स्थिति शुरुआत में मजबूत दिखाई दी. कुछ निकायों में पार्टी के पास पर्याप्त पार्षद थे और जमीनी स्तर पर भी समर्थन नजर आ रहा था. इसके बावजूद कई जगह बोर्ड बनाने के समय पार्टी पिछड़ गई.
इसके पीछे टिकट वितरण के बाद पैदा हुई नाराजगी, आपसी मतभेद और पार्षदों के बीच बेहतर तालमेल नहीं बन पाना जैसी स्थितियां सामने आईं. कई जगह निर्दलीय और बागी पार्षदों की भूमिका निर्णायक हो गई. कांग्रेस के लिए चुनौती यह रही कि जहां उसके पास शुरुआती बढ़त थी, वहां भी वह जरूरी संख्याबल को अंतिम समय तक बनाए नहीं रख सकी. इससे कई निकायों में बोर्ड गठन का समीकरण उसके हाथ से निकल गया.
'आप' का अप्रत्याशित और चौंकाने वाला खाता खुलना
राजस्थान के निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. राज्य की स्थानीय राजनीति में लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला रहा है. ऐसे में आप की कुछ सीटों पर एंट्री ने चुनावी तस्वीर में तीसरे विकल्प की चर्चा को जगह दी.
हालांकि उसका प्रभाव हर निकाय में एक जैसा नहीं रहा, लेकिन जिन जगहों पर पार्टी ने जीत या मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई, वहां इसे स्थानीय चुनावों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया. आप के प्रदर्शन ने यह दिखाया कि कुछ क्षेत्रों में मतदाता पारंपरिक दो दलों से अलग विकल्प को भी मौका दे सकते हैं. आने वाले समय में इस प्रदर्शन को पार्टी की स्थानीय राजनीति में मौजूदगी के संदर्भ में देखा जाएगा.
शिक्षा मंत्री के भाई की अप्रत्याशित शिकस्त
इन चुनाव परिणामों में एक बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका उस समय देखने को मिला, जब प्रदेश के एक कद्दावर शिक्षा मंत्री के भाई को पालिकाध्यक्ष पद के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. बड़े राजनीतिक परिवार और प्रभावशाली नेताओं से जुड़े उम्मीदवारों को आमतौर पर स्थानीय स्तर पर मजबूत माना जाता है, लेकिन इस नतीजे ने अलग तस्वीर सामने रखी.
इस चुनाव ने यह भी दिखाया कि स्थानीय निकाय की राजनीति में सिर्फ राजनीतिक पहचान या बड़े नेता से जुड़ाव ही पर्याप्त नहीं होता. पार्षदों का समर्थन, स्थानीय समीकरण और क्षेत्र के मुद्दे भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. यही वजह है कि शिक्षा मंत्री के भाई की हार चुनाव के सबसे ज्यादा चर्चा वाले नतीजों में शामिल रही.
पुष्कर और अन्य पर्यटन स्थलों पर पार्षदों की गुप्त बाड़ेबंदी
निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद कई जगह बोर्ड बनाने के लिए जरूरी संख्या जुटाना पार्टियों के सामने बड़ी चुनौती बन गया. क्रॉस वोटिंग और पार्षदों के पाला बदलने की आशंका के बीच दोनों प्रमुख दलों ने अपने जीते हुए पार्षदों को सुरक्षित रखने के लिए बाड़ेबंदी की.
कई पार्षदों को रातों-रात बसों के जरिए जयपुर, पुष्कर और दूसरे सुरक्षित पर्यटन स्थलों तक ले जाया गया. उन्हें रिसॉर्ट और होटलों में रखा गया. इसका मकसद बोर्ड गठन तक पार्षदों की संख्या को सुरक्षित रखना था. जहां बहुमत का आंकड़ा कुछ ही पार्षदों से पूरा होना था, वहां एक-दो पार्षदों का फैसला भी पूरे बोर्ड का गणित बदल सकता था. इसलिए पार्टियों ने अपने पार्षदों पर नजर बनाए रखी.
बागी और निर्दलियों के हाथ में सत्ता की चाबी रही
कई निकायों में भाजपा या कांग्रेस में से किसी के पास भी साफ बहुमत नहीं था. ऐसे में चुनाव से पहले टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय के तौर पर मैदान में उतरे प्रत्याशी और दूसरे निर्दलीय पार्षद बेहद अहम हो गए. उनके पास बोर्ड बनाने के लिए जरूरी संख्या पूरी करने की ताकत थी.
ऐसी स्थिति में दोनों दलों के लिए निर्दलीयों का समर्थन हासिल करना जरूरी हो गया. कई जगह निर्दलीय पार्षदों ने जिस दल का साथ दिया, उसी का बोर्ड बन गया. यही वजह रही कि इन चुनावों में बागी और निर्दलीय पार्षद कई निकायों में निर्णायक भूमिका में नजर आए. स्थानीय निकाय चुनावों के इन नतीजों ने एक बार फिर दिखाया कि वार्ड स्तर पर बने छोटे-छोटे समीकरण भी पूरे बोर्ड की तस्वीर बदल सकते हैं.