राजस्थान के 19 निकायों में प्रमुखों (चेयरमैन/सभापति) की आयु 30 साल या उससे कम है. अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, दौसा, धौलपुर, जैसलमेर, झालावाड़, करौली, नागौर, प्रतापगढ़, सीकर, टोंक और उदयपुर से लेकर जयपुर, झुंझुनूं और जोधपुर तक युवा चेहरों ने शहर की सरकार की कमान संभाली है. बात अगर टोंक नगर परिषद की करें, तो सिर्फ 24 साल के मयंक गोयल का सभापति बनना ये बताने को काफी है कि अब आयु बाधा नहीं, बल्कि ऊर्जा पर्याय बन चुकी है.यानी की जिससे शीर्ष नेतृत्व में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 6% पर पहुंच गई है. जो इस बात का प्रमाण है कि युवा सिर्फ चुनाव लड़ने या पार्षद बनने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब नगर की सरकार के सर्वोच्च पदों पर भी अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने लगे हैं
दिग्गजों के गढ़ और युवाओं की सेंधमारी
दिलचस्प पहलू ये भी रहा कि ये युवा उभार उन इलाकों में सबसे ज्यादा मुखर रहा है, जिन्हें प्रदेश की दिग्गज राजनीति के केंद्र बिंदु रहे हैं.
भजनलाल शर्मा का गृह जिला (भरतपुर): मुख्यमंत्री के अपने क्षेत्र में 30 साल तक के 26 युवा पार्षद चुने गए,जिनमें 23 विशुद्ध रूप से Gen-Z युवा हैं.
जयपुर (दीया कुमारी और राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का प्रभाव क्षेत्र): यहा 30 साल तक के 70 युवा पार्षद सदन में पहुंचे,जिनमें 57 Gen-Z चेहरे शामिल हैं.
गोविंद सिंह डोटासरा का गढ़ (सीकर): कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में 49 युवा पार्षद जीते, जिनमें 40 Gen-Z हैं.
सचिन पायलट का कार्यक्षेत्र (टोंक): टोंक में 30 साल तक के 52 युवा पार्षद बने (40 Gen-Z), जो युवा नेतृत्व की बढ़ती स्वीकार्यता का सबसे बड़ा सबूत है.
बाड़मेर (रविंद्र सिंह भाटी का प्रभाव): यहां भी पश्चिमी राजस्थान की सियासत में युवाओं की पैठ दिखती है, जहां 29 साल तक के 12 Gen-Z पार्षद चुने गए.
क्या ये सिर्फ युवाओं की लहर है या कोई बड़ा बदलाव ?
स्थानीय निकाय की राजनीति राष्ट्रीय या विधानसभा चुनावों से बिल्कुल अलग होती है. जहां सिर्फ उम्र या किसी बड़े नेता का चेहरा काम नहीं आता, वार्ड स्तर पर खुद की पहचान,ज़मीनी नेटवर्क और जनता के बीच चौबीसों घंटे की मौजूदगी ही सबसे बड़ा हथियार है और इस बार की वोटिंग ये बता चुकी है कि अब वोटर केवल तजुर्बे के नाम पर पुराने चेहरों के मोहताज नहीं हैं. वे ऐसे ऊर्जावान हाथों में कमान सौंप रहे हैं, जो जनता के बीच रहे और जल्द से जल्द और सही फैसले ले सकें. ये बदलाव इस बात का संकेत भी है कि राजस्थान की लोकल बॉडी पॉलिटिक्स अब एक नए और युवा युग में एंट्री ले चुकी है, जहां अनुभव के साथ-साथ नई सोच का होना जरूरी हो चुका है.