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कभी क्रॉस वोटिंग, कभी अविश्वास तो कभी विवाद! जानें अलवर की मेयर कुर्सी का पूरा सियासी खेल

Rajasthan News: अलवर की मेयर-सभापति की कुर्सी 1999 से ही सियासी उठापटक का केंद्र रही है. क्रॉस वोटिंग, अविश्वास प्रस्ताव, रिश्वत और ओबीसी सर्टिफिकेट विवाद ने कई बार समीकरण बदले. अब निकाय चुनाव में बीजेपी-कांग्रेस के सामने अपनों को साधने की चुनौती है.

कभी क्रॉस वोटिंग, कभी अविश्वास तो कभी विवाद! जानें अलवर की मेयर कुर्सी का पूरा सियासी खेल
Image Credit: Alwar Nikay Chunav

Alwar News: अलवर नगर परिषद से लेकर नगर निगम तक मेयर की कुर्सी हमेशा सियासी उठापटक के केंद्र में रही है. पिछले करीब 25 साल में यहां सत्ता कई बार बदली और हर बार कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं रहा. कभी अविश्वास प्रस्ताव ने हलचल मचाई तो कभी क्रॉस वोटिंग ने पूरा खेल पलट दिया. रिश्वत के आरोप में सभापति के जेल जाने से लेकर ओबीसी सर्टिफिकेट विवाद तक, अलवर की राजनीति में मेयर-सभापति की कुर्सी हमेशा चर्चा में रही है. अब निकाय चुनाव को लेकर एक बार फिर बीजेपी और कांग्रेस ने जिताऊ पार्षदों पर फोकस बढ़ा दिया है. इस बार दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विरोधियों से ज्यादा अपने ही बागियों को संभालने की है.

1999 में कांग्रेस की मीना सैनी बनीं सभापति
साल 1999 में अलवर नगर परिषद में कांग्रेस की मीना सैनी सभापति चुनी गई थीं. उस समय कांग्रेस का बोर्ड था, लेकिन 2003 में राज्य की सरकार बदलते ही नगर परिषद की सियासत भी बदल गई. मीना सैनी को पद से हटा दिया गया और बीजेपी की शकुंतला सोनी सभापति बनीं. इससे साफ हो गया था कि अलवर में सभापति की कुर्सी पर सियासी समीकरण कभी भी बदल सकते हैं.

अजय अग्रवाल के खिलाफ आया अविश्वास प्रस्ताव
2004 में बीजेपी के अजय अग्रवाल सभापति बने. उनके कार्यकाल में भी विवाद थमा नहीं. उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. हालांकि जोड़-तोड़ और सियासी गणित के दम पर अजय अग्रवाल अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे. इसके बाद 2009 में सभापति का सीधा चुनाव हुआ और बीजेपी की हर्षपाल कौर ने जीत दर्ज की.

हर्षपाल कौर का ओबीसी सर्टिफिकेट विवाद
हर्षपाल कौर के सभापति बनने के बाद उनके ओबीसी सर्टिफिकेट को लेकर विवाद खड़ा हो गया. तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया. इसके बाद कांग्रेस की कमलेश सैनी को सभापति बनाया गया. कुछ समय बाद बीजेपी की सुनीता खांबरा भी इस कुर्सी पर रहीं. वहीं हर्षपाल कौर ने मामले को कोर्ट में चुनौती दी और हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद दोबारा सभापति की कुर्सी संभाल ली.

2019 में क्रॉस वोटिंग ने पलट दिया पूरा खेल
2019 का चुनाव अलवर की निकाय राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. उस समय बीजेपी के पास 27 पार्षद थे, जबकि कांग्रेस के पास 19 पार्षद थे. संख्या बल बीजेपी के पक्ष में था, लेकिन चुनाव के दौरान सियासी गणित अचानक बदल गया. कांग्रेस ने निर्दलीय पार्षदों का साथ लिया और बीजेपी के कुछ पार्षदों की कथित क्रॉस वोटिंग ने पूरा खेल पलट दिया. इसके बाद कांग्रेस की बीना गुप्ता सभापति बनीं.

रिश्वत के आरोप में जेल गईं बीना गुप्ता
बीना गुप्ता का कार्यकाल भी विवादों से दूर नहीं रहा. रिश्वत के आरोप में एसीबी ने उन्हें गिरफ्तार किया और उन्हें जेल जाना पड़ा. बाद में उनके हटने के बाद कांग्रेस के मुकेश सारवान सभापति बने. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दिखा दिया कि अलवर में सभापति की कुर्सी तक पहुंचना जितना मुश्किल है, उसे संभालकर रखना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है.

नगर निगम बना तो बदला सियासी समीकरण
इसके बाद अलवर नगर परिषद को नगर निगम का दर्जा मिला. सभापति के हटने के बाद बीजेपी के उपसभापति घनश्याम गुर्जर ने नियमों के तहत जिम्मेदारी मिलने का दावा किया. मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और कोर्ट के आदेश के बाद घनश्याम गुर्जर ने मेयर की कुर्सी संभाली. इस तरह वे अलवर नगर निगम के पहले मेयर बने.

इस बार अपनों से ही खतरा
अब निकाय चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों फिर से मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं. दोनों पार्टियों का फोकस ऐसे पार्षदों पर है, जो चुनाव जीतने के साथ बोर्ड बनाने में भी मदद कर सकें. लेकिन अलवर के पुराने चुनावी इतिहास को देखें तो सिर्फ संख्या बल काफी नहीं है. क्रॉस वोटिंग और बगावत कई बार पूरा समीकरण बदल चुकी है. यही वजह है कि इस बार बीजेपी और कांग्रेस के सामने असली चुनौती विपक्ष से ज्यादा अपने दावेदारों और संभावित बागियों को संभालने की है. टिकट किसे मिलता है और चुनाव के बाद कौन किसके साथ खड़ा होता है, इसी से तय होगा कि अलवर में अगला बोर्ड किस पार्टी का बनेगा.

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