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Rajasthan Nikay Chunav: नगरीय निकाय चुनाव में आरक्षण का गणित, अब सियासत का नया समीकरण बता रहा है. लॉटरी में ओबीसी के लिए करीब 20 फीसदी सीटें आरक्षित, लेकिन चुनावी मैदान में हर 100 उम्मीदवारों में 47 ओबीसी चेहरे हैं यानी पार्टियों ने ओबीसी को सिर्फ आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामान्य सीटों पर भी ओबीसी उम्मीदवारों पर दांव लगाया है और इस पूरे समीकरण में महिला आरक्षण ने सियासत की तस्वीर और बदल दी है. 33 फीसदी महिला आरक्षण के मुकाबले 35.7 फीसदी महिलाएं मैदान में हैं, जिनमें करीब 46 फीसदी ओबीसी महिलाएं हैं.
सामान्य सीटों पर भी OBC उम्मीदवारों की मजबूत मौजूदगी
नगरीय निकाय चुनाव में इस बार सिर्फ आरक्षित सीटों का गणित नहीं चल रहा, बल्कि आरक्षण से बाहर की सामान्य सीटों पर भी सामाजिक समीकरण साधने की राजनीतिक कोशिश साफ दिखाई दे रही है. प्रदेशभर में कुल 38,929 उम्मीदवारों में 18,184 ओबीसी वर्ग से हैं यानी हर 100 प्रत्याशियों में करीब 47 ओबीसी उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि निकायों की लॉटरी में ओबीसी आरक्षण करीब 20% के आसपास है. यानी ओबीसी के उम्मीदवारों की संख्या उनके लिए आरक्षित सीटों की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है. राजनीतिक तौर पर इसका बड़ा संकेत यह है कि पार्टियों और स्थानीय राजनीतिक समूहों ने ओबीसी को सिर्फ आरक्षित वार्डों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामान्य सीटों पर भी ओबीसी चेहरे उतारकर व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व और वोट समीकरण साधने की कोशिश की है.


महिला उम्मीदवारों में भी OBC नंबर-1
ओबीसी महिला प्रत्याशी–6,349
सामान्य वर्ग की महिलाएं–3,929
एससी महिला प्रत्याशी –3,055
एसटी महिला प्रत्याशी–558
महिला आरक्षण में भी OBC का दबदबा
राज्य निर्वाचन आयोग के डेटा को खंगाला जाए तो यहां सबसे बड़ा अंतर ओबीसी में है. आरक्षित हिस्से के मुकाबले मैदान में ओबीसी उम्मीदवारों की हिस्सेदारी करीब 27 प्रतिशत अंक ज्यादा है. वहीं, नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण ने सामाजिक समीकरण को एक और परत दी है. कुल 13,891 महिला उम्मीदवार मैदान में हैं, जो कुल प्रत्याशियों का 35.7% हैं. इनमें अकेले 6,349 ओबीसी महिलाएं हैं यानी सभी महिला प्रत्याशियों में करीब 46% ओबीसी महिलाएं हैं. इसे राजनीतिक नजरिए से देखें तो ओबीसी और महिला आरक्षण का दोहरा समीकरण इस चुनाव में खासा महत्वपूर्ण हो गया है. आरक्षित महिला सीटों पर तो महिला प्रत्याशी जरूरी हैं ही, लेकिन पार्टियों के लिए ओबीसी महिला चेहरा स्थानीय सामाजिक समीकरण साधने का भी जरिया बन गया है.
पिछले चुनावों में भी OBC की बढ़ती जीत
ओबीसी के चुनावी प्रभाव को पिछले निकाय चुनावों के आंकड़ों से तुलना करने पर तस्वीर और स्पष्ट होती है. पिछले दो चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि OBC उम्मीदवार आरक्षित सीटों से कहीं ज्यादा सामान्य सीटों पर भी जीत दर्ज करते रहे हैं. 2014-15 में 187 निकायों में कुल 5,282 सीटों में ओबीसी के लिए 1,040 सीटें आरक्षित थीं यानी करीब 19.7% आरक्षण, लेकिन चुनाव परिणाम में ओबीसी वर्ग के उम्मीदवार 2,152 सीटों पर जीते यानी कुल सीटों की करीब 40.7% सीटों पर ओबीसी उम्मीदवारों की जीत हुई. इसी तरह 2019-20 के नगरीय निकाय चुनाव में 196 निकायों में कुल 7,500 सीटों में से 1,520 सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित थीं यानी करीब 20.3% आरक्षण. ओबीसी उम्मीदवार 3,318 सीटों पर जीते. यह कुल सीटों का करीब 44.2% था. इस बार 2026 के नगरीय निकाय चुनाव में कुल उम्मीदवारों में 46.7 फीसदी ओबीसी हैं.
जयपुर में भी OBC की बड़ी हिस्सेदारी
जयपुर जिले में कुल 2,643 उम्मीदवार हैं. इनमें 900 महिलाएं और 1,743 पुरुष हैं. ओबीसी के 1,128 उम्मीदवार हैं, जिनमें 375 महिलाएं और 753 पुरुष हैं. यानी जयपुर में भी कुल उम्मीदवारों का करीब 42.7% OBC है. झुंझुनूं इस मामले में और मजबूत नजर आता है कुल 2,407 उम्मीदवारों में 1,366 ओबीसी हैं, यानी करीब 56.7 फीसदी, इनमें 502 ओबीसी महिलाएं हैं.
झुंझुनूं में आधे से ज्यादा उम्मीदवार OBC
बहरहाल, तो क्या निकाय चुनाव में ओबीसी अब सिर्फ आरक्षण का हिस्सा नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण का सबसे बड़ा फैक्टर बन चुका है. जब आरक्षण करीब 20 फीसदी है, लेकिन मैदान में OBC उम्मीदवार 46.7 फीसदी हैं. जब पिछले चुनावों में भी आरक्षित सीटों से दोगुने से ज्यादा सीटों पर OBC उम्मीदवार जीते तो क्या इस बार सामान्य सीटों का गणित भी OBC के इर्द-गिर्द घूमेगा. क्या OBC की ये बढ़ती राजनीतिक हिस्सेदारी निकाय सत्ता की तस्वीर बदलेगी और सबसे बड़ा सवाल क्या इस चुनाव के बाद OBC सिर्फ एक आरक्षित वर्ग नहीं, बल्कि निकाय सत्ता की निर्णायक ताकत बनकर उभरेगा?
रिपोर्ट- दीपक गोयल