पंचायत चुनाव का चक्कर: युवाओं और बुजुर्गों में टक्कर, सरपंची के लिए गांव में सियासी घमासान
राजस्थान में पंचायत चुनाव की तैयारियों के साथ गांवों में सरपंच पद को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. जयपुर शहर की सीमा से सटे निमेड़ा गांव में इस बार मुकाबला सिर्फ दावेदारों के बीच नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच भी नजर आ रहा है. बुजुर्ग दावेदार अपने अनुभव और गांव में पकड़ को ताकत बता रहे हैं, जबकि युवा अब नेतृत्व की कमान अपने हाथ में लेने की बात कह रहे हैं.
Rajasthan Panchayat Chunav: पंचायत चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, गांवों में सियासी गर्मी बढ़ती जा रही है. सरपंच बनने के लिए दावेदार पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने लगे हैं. जयपुर शहर की सीमा से सटे निमेड़ा गांव में इस बार मुकाबला थोड़ा अलग है. यहां सरपंची की कुर्सी को लेकर बुजुर्गों और युवाओं के बीच खींचतान साफ नजर आ रही है. बुजुर्गों का कहना है कि पंचायत चलाने के लिए अनुभव जरूरी है, जबकि युवा पीढ़ी अब खुद को नेतृत्व के लिए तैयार बता रही है. दोनों तरफ से अपने-अपने दावे किए जा रहे हैं.
बुजुर्गों को अपने अनुभव पर भरोसा
निमेड़ा में सरपंच पद के दावेदार रामनारायण लांबा चुनावी तैयारी में जुटे हैं. उनके साथ बुजुर्ग समर्थकों की टोली भी नजर आ रही है. गांव की राजनीति और चुनाव लड़ने-लड़ाने का लंबा अनुभव रखने वाले लोग उनके अभियान में साथ खड़े हैं. चौपालों पर समर्थक लांबा की जीत के दावे कर रहे हैं. उम्रदराज नेताओं का कहना है कि गांव की राजनीति को वे लंबे समय से समझते हैं और लोगों के बीच उनकी मजबूत पकड़ है. ऐसे में युवाओं को अभी कुछ समय इंतजार करने की सलाह भी दी जा रही है.
युवाओं ने भी संभाला मोर्चा
दूसरी तरफ गांव के युवा भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि अब समय बदल चुका है और नई पीढ़ी को भी गांव की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिलना चाहिए. युवाओं की टोलियां गांव में चुनावी चर्चा करती नजर आ रही हैं. उनका मानना है कि नई सोच और नई ऊर्जा के साथ पंचायत के कामकाज को आगे बढ़ाया जा सकता है. कुछ युवा तो बुजुर्ग नेताओं को अब मार्गदर्शक की भूमिका में रहने की सलाह तक दे रहे हैं.
नई पीढ़ी में बढ़ी सियासी चाहत
हाल के आंदोलनों और शहरी निकाय चुनावों में युवाओं की सक्रियता के बाद पंचायत चुनाव में भी नई पीढ़ी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं. गांवों में लंबे समय से सक्रिय बुजुर्ग नेताओं के सामने अब युवा दावेदार अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. निमेड़ा में भी यही तस्वीर दिखाई दे रही है. एक तरफ अनुभव और पुरानी पकड़ का दावा है, तो दूसरी तरफ युवा जोश और नई सोच की बात कर रहे हैं.
फैसला जनता के हाथ में
फिलहाल गांव की चौपालों से लेकर चाय की थड़ियों तक सरपंची की चर्चा है. बुजुर्ग और युवा दोनों अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं. अब असली फैसला गांव की जनता करेगी. किसके सिर सरपंची का ताज सजेगा और किसे इंतजार करना पड़ेगा, इसका जवाब चुनाव परिणाम आने के बाद ही मिलेगा.