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गांधी जयंती स्पेशल-यादगार किस्सा: जब मंच पर मची भगदड़ और टूट गया बापू का चश्मा, फिर...

Jaipur News: अजमेर में 1921 की गांधी जी की सभा के दौरान भीड़ के दबाव से मंच पर भगदड़ मच गई और बापू का चश्मा टूट गया. उनके सहयोगी ने चश्मे का अंश संभालकर रखा. गांधी जी की राजस्थान यात्राओं से जुड़े कई ऐसे किस्से इतिहास में दर्ज हैं.

गांधी जयंती स्पेशल-यादगार किस्सा: जब मंच पर मची भगदड़ और टूट गया बापू का चश्मा, फिर...
Image Credit: फाइल फोटो.

Jaipur News: देशभर में आज 2 अक्टूबर को गांधी जयंती मनाई जा रही है. यह दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के रूप में मनाया जाता है. गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और स्वच्छता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया. इस अवसर पर देशभर में प्रार्थना सभाएं, स्वच्छता अभियान और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.

महात्मा गांधी का राजस्थान से जुड़ाव स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का एक अहम किस्सा है. बापू ने अपने जीवन में मुख्य रूप से जयपुर और अजमेर संभाग की यात्राएं कीं. उस दौर में अजमेर, ब्यावर और पुष्कर जैसे इलाके उनकी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र रहे. गांधी जी की इन यात्राओं ने राजपूताना में आजादी, स्वदेशी, खादी और सामाजिक सुधारों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

गांधी जी की राजस्थान यात्राओं से जुड़े कुछ ऐसे किस्से भी हैं, जो इतिहास की किताबों में बहुत अधिक चर्चित नहीं हुए, लेकिन आज भी स्थानीय स्मृतियों में मौजूद हैं. इनमें अजमेर की एक जनसभा के दौरान मंच पर मची भगदड़ और उस दौरान बापू का चश्मा टूटने की घटना खास तौर पर जिक्र है.

1901 में जयपुर जंक्शन से हुई पहली यादगार मुलाकात
महात्मा गांधी का राजपूताना से पहला सीधा जुड़ाव साल 1901 में हुआ था. दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधी जी देश को करीब से समझने और अलग-अलग क्षेत्रों की यात्रा करने में जुटे थे. इसी दौरान राजकोट जाते समय उनकी ट्रेन जयपुर जंक्शन पर रुकी थी. यह कोई लंबी राजनीतिक यात्रा या जनसभा नहीं थी लेकिन राजस्थान की धरती से गांधी जी का यह पहला फॉर्मल जुड़ाव माना जाता है. यह घटना इतनी सामान्य और शांत तरीके से इतिहास में दर्ज हुई कि इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है.

इस ऐतिहासिक प्रसंग को याद रखने के लिए भारतीय डाक विभाग ने साल 2005 में एक विशेष 'स्पेशल कवर' भी जारी किया था. इस तरह जयपुर जंक्शन से जुड़ा गांधी जी का वह छोटा सा पड़ाव ऐतिहासिक याद का हिस्सा बन गया.

अजमेर बना गांधी जी की राजस्थान यात्राओं का प्रमुख केंद्र
अजमेर का महात्मा गांधी से विशेष ऐतिहासिक जुड़ाव रहा. गांधी जी अपने जीवनकाल में तीन बार अजमेर जिले में आए थे. उन्होंने 1921, 1922 और 1934 में अजमेर, पुष्कर और ब्यावर का दौरा किया.

इन यात्राओं का उद्देश्य केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था. गांधी जी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के साथ-साथ खादी और स्वदेशी को बढ़ावा देने तथा अस्पृश्यता निवारण यानी हरिजन उद्धार के लिए समाज को जागरूक करने पर भी जोर देते थे. अजमेर प्रवास के दौरान उन्होंने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, अजमेर शरीफ की जियारत भी की थी. यह उनके सर्वधर्म समभाव और हिंदू-मुस्लिम एकता के विचार से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग था.

अजमेर के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ भी गांधी जी के करीबी संबंध रहे. इनमें हरिभाऊ उपाध्याय प्रमुख नाम था. देश की आजादी को लेकर दोनों के बीच गहन रणनीतिक चर्चाएं होती थीं.

8 मार्च 1921: जनसभा में अचानक मची भगदड़
गांधी जी की अजमेर यात्रा से जुड़ा एक बेहद रोचक और कम चर्चित किस्सा 8 मार्च 1921 का है. उस दिन बापू अजमेर में एक विशाल जनसभा को संबोधित करने पहुंचे थे. गांधी जी को देखने और सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे थे. भीड़ में मौजूद लोग बापू के करीब जाना चाहते थे. इसी दौरान लोगों की भारी भीड़ के दबाव से मंच पर अचानक भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. अफरा-तफरी के बीच गांधी जी का चश्मा उनके चेहरे से गिर गया और टूट गया.

बापू के लिए चश्मा रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा था, लेकिन उस समय टूटे चश्मे को केवल एक सामान्य वस्तु समझकर छोड़ नहीं दिया गया. गांधी जी के एक सहयोगी और अनुयायी ने तुरंत जमीन पर गिरे चश्मे को उठाया और उसे सुरक्षित रख लिया.

आज उस टूटे हुए चश्मे का एक अंश अजमेर के गांधीवादी संग्राहक बी. एल. सामरा के पास गांधी जी की अनमोल धरोहर के रूप में सुरक्षित बताया जाता है. यह घटना इतिहास का ऐसा हिस्सा है, जिसका उल्लेख आम इतिहास पुस्तकों में कम मिलता है, लेकिन अजमेर की स्थानीय स्मृतियों में इसकी खास जगह है.

अजमेर से रवाना हुए और अगले दिन पहुंचते ही गिरफ्तार
8 मार्च की सभा के बाद अगले दिन 9 मार्च को गांधी जी ट्रेन से अहमदाबाद के लिए रवाना हुए. 10 मार्च की सुबह अहमदाबाद पहुंचते ही ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन पर अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत करने और आम जनता को ब्रिटिश कानून का पालन नहीं करने के लिए प्रेरित करने के आरोप में मुकदमा चलाया गया. इसके बाद 18 मार्च को उन्हें छह साल की सजा सुनाई गई. इस मुकदमे के दौरान भी एक ऐतिहासिक घटना सामने आई. गांधी जी ने अदालत में अपनी पैरवी खुद की. उनके व्यक्तित्व और सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से ब्रिटिश मजिस्ट्रेट ब्रूमफील्ड प्रभावित हुआ. सजा सुनाने से पहले उसने अपनी कैप उतारी और गांधी जी को सैल्यूट किया.

मजिस्ट्रेट ने अदालत में कहा, "आई सैल्यूट मिस्टर गांधी, यू हेव इन योर ड्यूटी, नॉउ आई एम डूइंग माई ड्यूटी." इसका मतलब था कि गांधी जी अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और अब वह अपना कर्तव्य निभा रहा है. सजा सुनाए जाने के बाद गांधी जी मुस्कुराए और मजिस्ट्रेट को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि इसी अदालत ने छह साल पहले उनके राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले को भी सजा सुनाई थी और उनके नक्शेकदम पर चलना उनके लिए गर्व की बात है.

1943 में जोधपुर पहुंचने से पहले ही रोक दिए गए
गांधी जी से जुड़ा राजस्थान का एक और कम चर्चित प्रसंग साल 1943 का है. उस समय भारत छोड़ो आंदोलन की आंच पूरे देश में फैल चुकी थी. गांधी जी ट्रेन से जोधपुर की यात्रा पर निकले थे. ब्रिटिश प्रशासन और तत्कालीन रियासती हुक्मरान उन्हें जोधपुर तक पहुंचने देना नहीं चाहते थे. गांधी जी के जोधपुर पहुंचने से पहले ही लूणी जंक्शन पर भारी पुलिस बल ने उन्हें रोक लिया. उन्हें आगे जाने की अनुमति नहीं दी गई. अंग्रेजी प्रशासन को आशंका थी कि यदि गांधी जी जोधपुर पहुंचे तो पूरी रियासत में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बड़ा आंदोलन और बगावत खड़ी हो सकती है.

हटूंडी में गांधी आश्रम ने आगे बढ़ाए उनके विचार
गांधी जी के विचारों का राजस्थान पर गहरा प्रभाव पड़ा. अजमेर के पास हटूंडी में उनके परम अनुयायी हरिभाऊ उपाध्याय ने गांधी आश्रम की स्थापना की. यह आश्रम राजपूताना में खादी, स्वदेशी आंदोलन और शिक्षा के प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र बना. गांधी जी जब अजमेर और पुष्कर आते थे, तब वे समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान और हरिजन सेवा पर विशेष जोर देते थे. उनके विचारों को आगे बढ़ाने में हरिभाऊ उपाध्याय और गांधी आश्रम जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही.

राजस्थान में आज भी जिंदा हैं गांधी जी की यादें
महात्मा गांधी की राजस्थान से जुड़ी स्मृतियां कई अलग-अलग घटनाओं में दिखाई देती हैं. 1901 में जयपुर जंक्शन पर उनका छोटा सा पड़ाव, 1921 में अजमेर की सभा के दौरान चश्मा टूटने की घटना और 1943 में जोधपुर पहुंचने से पहले लूणी जंक्शन पर रोके जाने का प्रसंग इस इतिहास के अलग-अलग पहलू सामने लाता है.

इन घटनाओं से राजस्थान और गांधी जी के बीच जुड़ाव की तस्वीर उभरती है. राजपूताना की धरती केवल राजा-महाराजाओं के शौर्य और वीरता के लिए ही नहीं जानी गई बल्कि महात्मा गांधी के अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम और उनके सामाजिक सुधारों के विचारों के प्रसार में भी इसकी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रही. गांधी जी के इन पदचिह्नों से जुड़ी स्मृतियां आज भी राजस्थान के इतिहास का हिस्सा हैं.
 

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Sandhya Yadav

Sandhya Yadav

लखनऊ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने वाली संध्या ने Zee News से पहले Newstrack और ETV Bharat जैसे प्रतिष्ठित डिजिटल न्यूज़ संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं. जमीनी खबरों की गहरी समझ रखने वाली संध्या ने राजस्थान विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव, गहलोत-पायलट राजनीतिक संकट और कोविड-19 महामारी समेत कई बड़े और जटिल घटनाक्रमों की बेहतरीन कवरेज की है.आप संध्या यादव से सीधे SANDHYA.YADAV@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा राजस्थान की खबरों के रियल-टाइम अपडेट्स के लिए आप उनसे लिंक्डइन (https://in.linkedin.com/in/sandhya-yadav-5734ba144) पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.
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