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राजस्थान हाईकोर्ट ने शादीशुदा महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप के एग्रीमेंट के आधार पर दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी है. जोधपुर स्थित हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि पहले से विवाहित महिला का विवाह कानूनी रूप से समाप्त हुए बिना किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह जैसी स्थिति का दर्जा नहीं दिया जा सकता. अदालत ने याचिकाकर्ता पर तथ्य छिपाने और न्यायिक समय बर्बाद करने के लिए 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया.
युवक ने महिला को पत्नी बताकर दाखिल की थी याचिका
मामले में एक युवक ने अदालत में याचिका दायर कर बीकानेर निवासी महिला को अपनी पत्नी बताया था. उसने आरोप लगाया कि महिला निजी प्रत्यर्थियों के अवैध कब्जे में है. याचिकाकर्ता ने महिला को उनके कथित अवैध निरोध से मुक्त कराने और अदालत में पेश करने की मांग की थी. उसने अपनी मांग के समर्थन में लिव-इन रिलेशनशिप के एक एग्रीमेंट का आधार लिया था.
सुनवाई में सामने आया महिला की शादी का तथ्य
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को पता चला कि संबंधित महिला पहले से विवाहित है. उसका पति जीवित है और दोनों की तीन महीने की संतान भी है. इन तथ्यों के सामने आने के बाद अदालत ने याचिका के आधार और महिला को अवैध रूप से रोके जाने के दावे पर विचार किया.
खंडपीठ ने पाया कि महिला अपने परिजनों के पास रह रही थी. उसे अवैध रूप से बंधक बनाए जाने या उसकी स्वतंत्रता पर गैरकानूनी रोक लगाए जाने के संबंध में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया था.
भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 23 का उल्लेख
न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण और न्यायाधीश आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हो जाता, तब तक किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह जैसी स्थिति का दर्जा नहीं दिया जा सकता.
अदालत ने भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मामले में प्रस्तुत लिव-इन एग्रीमेंट शून्य और लोक नीति के विरुद्ध है. इसी आधार पर अदालत ने एग्रीमेंट के सहारे मांगी गई राहत को स्वीकार नहीं किया.
याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना
अदालत ने मामले में तथ्यों को छिपाने और न्यायिक समय बर्बाद करने पर नाराजगी जताई. इसके बाद युवक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई. साथ ही, याचिकाकर्ता को 25,000 रुपये चार सप्ताह के भीतर चाइल्ड सेक्रेटेरिएट्स के खाते में जमा कराने का निर्देश दिया गया.
फैसले का क्या है महत्व?
इस मामले में अदालत ने लिव-इन एग्रीमेंट के आधार पर महिला को पेश कराने की मांग और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की पोषणीयता पर विचार किया. फैसले में महिला के पहले से विवाहित होने, उसके पति के जीवित होने और अवैध निरोध के ठोस सबूत नहीं मिलने को महत्वपूर्ण माना गया. यह आदेश संबंधित मामले के तथ्यों और अदालत की टिप्पणियों पर आधारित है. इसे हर लिव-इन रिलेशनशिप या बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर लागू होने वाला सार्वभौमिक नियम नहीं माना जाना चाहिए.