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जोधपुर में अनूठी परंपरा : कहीं रावण दहन, तो कहीं दामाद की मौत पर शोक

राजस्थान के जोधपुर में एक ओर शहर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर श्रीमाली गोधा गोत्र से जुड़े कुछ लोग रावण दहन के बाद शोक मनाते हैं. उनके लिए रावण केवल रामायण का खलनायक नहीं, बल्कि अपने गोत्र से जुड़ा पूर्वज और परिवार का सदस्य है. इसी मान्यता के चलते वे दशहरे के दिन स्नान करते हैं, जनेऊ बदलते हैं और इसके बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं.

Reported ByRakesh Bhardwaj
Published: Oct 20, 2026, 01:27 PM IST|Updated: Oct 20, 2026, 02:00 PM IST
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जोधपुर में अनूठी परंपरा : कहीं रावण दहन, तो कहीं दामाद की मौत पर शोक
Image Credit: jodhpur rawan mandir

About the Author

Rakesh Bhardwaj

Rakesh Bhardwaj

राकेश कुमार भारद्वाज पाली (राजस्थान) निवासी वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो पिछले 20 से अधिक वर्षों से प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय हैं। वर्तमान में वे ज़ी राजस्थान में जोधपुर जिला ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं।इतिहास में एमए, विधि (LL.B.)में अध्यनरत, पत्रकारिता (BJMC) में बहु-विषयक शिक्षा प्राप्त भारद्वाज जी ने अपने करियर की शुरुआत पाली में लॉकल न्यूज चैनल से की इसके बाद उन्होंने दैनिक नवज्योति ,ईटीवी राजस्थान ,जी राजस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में लंबे समय तक अपनी सेवाएँ दीं। पाली व जोधपुर में लम्बे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेषकर स्वास्थ्य-चिकित्सा और क्षेत्रीय राजनीति की सटीक व संवेदनशील रिपोर्टिंग के साथ राजस्थान हाईकोर्ट मुख्यपीठ में पत्रकारिता के लिए जाना जाता है।
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रावण दहन के बीच निभाई जाती है शोक की परंपरा
जोधपुर में रावण से जुड़ी ये मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है. श्रीमाली गोधा गोत्र से जुड़े परिवारों का मानना है कि रावण उनके गोत्र से था और उसकी पत्नी मंदोदरी का पीहर मंडोर में था. मंडोर में पीहर होने के लिहाज से रावण को मंडोर निवासी अपना दामाद मानते हैं. दशहरे पर रावण दहन को वे अपने दामाद की मृत्यु के प्रतीक के रूप में देखते हैं. ये ही वजह है कि इस दिन उनके परिवारों में उत्सव के बजाय शोक की परंपरा निभाई जाती है. श्रीमाली समाज के गोधा गोत्र की ओर से रावण दहन के बाद स्नान करना, जनेऊ बदलना और फिर भोजन ग्रहण करना इस परंपरा का हिस्सा बताया जाता है.

चांदपोल में रावण का मंदिर, मंदोदरी की भी पूजा
जोधपुर के चांदपोल क्षेत्र में रावण का मंदिर है. यहां रावण के साथ मंदोदरी का भी मंदिर है. बताया जाता है कि यहां पहले छोटा मंदिर था, जिसे बाद में विस्तार देकर भव्य रूप दिया गया. मंदिर परिसर में लंकेश से जुड़ी अन्य धार्मिक और अक्षय वाटिका विकसित करने की बात भी सामने आती है. इसके साथ यहां नवग्रह मंदिर के साथ रावण के कुलेदवी खरानना देवी का भी मंदिर है, बताया जाता है कि रावण जब भी युद्ध में जाता तो अपनी कुलदेवी की पूजन करने के बाद ही युद्ध करता था. मंदिर के पुजारी कमलेश दवे और उनके पुत्र अजय दवे बताते हैं कि उनके परिवार में पीढ़ियों से रावण को अपने गोत्र से जुड़ा माना जाता रहा है. उनके अनुसार, उनके दादा-परदादा भी इस परंपरा का पालन करते थे. इसी मान्यता के चलते रावण दहन के दिन वे शोक मनाते हैं और स्नान के बाद ही भोजन करते हैं.


 

मंडोर नाम और मंदोदरी के पीहर की किंवदंती
मंडोर को मंदोदरी से संबंधित बताया जाता है और यहां उसकी चावरी होने की बात कही जाती है. कुछ लोग ये भी मानते हैं कि भगवान राम का जोधपुर में आगमन हुआ था. हालांकि, इन दावों की ऐतिहासिक पुष्टि को लेकर स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है. इतिहास से जुड़े कुछ लोगों के मुताबिक मंदोदरी का पीहर मंडोर में होने की मान्यता है.
एक शहर, दशहरे की दो तस्वीरें
जोधपुर की खासियत ये है कि यहां रावण को लेकर आस्था और परंपरा के दो अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं. शहर में कई जगहों पर रावण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं चांदपोल के रावण मंदिर और श्रीमाली गोत्र से जुड़ी मान्यता के कारण कुछ परिवार इस दिन शोक की परंपरा निभाते हैं.
 

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