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कैसे मिलता है दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित 'वर्ल्ड हेरिटेज' का तमगा ?
किसी भी साइट को विश्व धरोहर घोषित करने की प्रक्रिया बेहद जटिल और वैज्ञानिक होती है. सबसे पहले संबंधित देश की सरकार (स्टेट पार्टी) अपने ऐतिहासिक स्थलों की एक 'टेंटेटिव लिस्ट' तैयार करती है. इसके बाद एक विस्तृत 'नॉमिनेशन डोज़ियर' यूनेस्को को भेजा जाता है. यूनेस्को की दो प्रमुख सलाहकार संस्थाएं जैसे-इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स (ICOMOS) और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN)—इस जगह का जमीनी मूल्यांकन करती हैं. सबसे बड़ी शर्त ये है कि उस जगह में 'आउटस्टैंडिंग यूनिवर्सल वैल्यू' (OUV) यानी उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य होना चाहिए. इसके बाद ही वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी की वार्षिक बैठक में वोटिंग के जरिए उस साइट को हेरिटेज का ताज पहनाया जाता है.
ताजपोशी के बाद कैसे और क्यों छिन जाता है हेरिटेज का दर्जा ?
वर्ल्ड हेरिटेज का टैग कोई स्थायी जागीर नहीं है. यूनेस्को की नज़र लगातार इन धरोहरों पर बनी रहती है. अगर किसी धरोहर के मूल स्वरूप (OUV) को युद्ध, प्राकृतिक आपदा, अवैध निर्माण, प्रदूषण या अनियंत्रित शहरीकरण से खतरा पहुंचता है, तो यूनेस्को सबसे पहले उसे 'डेंजर लिस्ट' (खतरे में पड़ी विश्व धरोहरों की सूची) में डालता है. सरकार को सुधार के लिए एक डेडलाइन और दिशा-निर्देश दिए जाते हैं. अगर सरकार तय समय में उस ऐतिहासिक स्थल की प्रामाणिकता और अखंडता को बहाल करने में फेल रहती है, तो वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी के दो-तिहाई बहुमत से उस स्थल से हमेशा के लिए ये दर्जा छीन (डीलिस्ट) लिया जाता है.
क्या है वो रिपोर्ट और अल्टीमेटम ?
जयपुर के परकोटे (दीवार वाले शहर) में हो रहे अवैध व्यावसायिक निर्माण, ट्रैफिक के बढ़ते दबाव और मूल ढांचे में बदलाव को लेकर यूनेस्को गंभीर चिंता जता चुका ह.। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि जयपुर के लिए जो 'स्पेशल एरिया हेरिटेज प्लान' और 'हेरिटेज मैनेजमेंट प्लान' लागू होना चाहिए था, उसमें भारी कोताही बरती गई है. परकोटे के भीतर ऐतिहासिक बरामदों पर अतिक्रमण और प्राचीन हवेलियों के असली स्वरूप को बदलकर कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने की घटनाएं यूनेस्को के रडार पर हैं. कमेटी ने चेतावनी दी थी कि अगर विरासत के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो इस साइट को 'डेंजर लिस्ट' में डाला जा सकता है.
अल्टीमेटम के बाद सरकार ने अभी तक क्या किया ?
राजस्थान सरकार ने परकोटे के संरक्षण और विकास के लिए 100 करोड़ रुपये का विशेष बजट प्रावधान किया था. हवा महल, जयपुर सिटी पैलेस, ऐतिहासिक दरवाजों और परकोटे की बाहरी दीवारों के जीर्णोद्धार का काम किया गया है. शहर के पारंपरिक स्वरूप को बचाने के लिए मुख्य बाजारों में अवैध और आधुनिक चमक-दमक वाले विज्ञापनों/साइनबोर्ड्स को हटाकर एकरूपता लाने के निर्देश दिए .हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट ने भी अवैध निर्माण और हेरिटेज सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और नगर निगम को सर्वे कर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं.
जयपुर सिटी को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है ?
ये जिम्मेदारी जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और नगर निगम (हेरिटेज/ग्रेटर) की है. इन दोनों विभागों को ये सुनिश्चित करना होता है कि परकोटे के भीतर कोई अवैध कमर्शियल या रेजिडेंशियल निर्माण नहीं हो और हेरिटेज बायलॉज का सख्ती से पालन हो. इनके अलावा राज्य सरकार का पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग भी ऐतिहासिक स्मारकों और महलों की सुरक्षा और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है.
जयपुर सिटी की स्थापना कब हुई ?
जयपुर शहर की स्थापना 18 नवंबर 1727 को हुई थी. ये भारत का पहला सुनियोजित शहर माना जाता है. इस शहर का नक्शा वास्तु शास्त्र और नौ चौपड़ी (9 Square) के मॉडल पर आधारित है. इसे इस तरह बसाया गया था कि मुख्य सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90 डिग्री) पर काटती हैं. साल 1876 में वेल्स के राजकुमार अल्बर्ट एडवर्ड के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी (टेराकोटा पिंक) रंग से रंग दिया गया था, तभी से इसे 'पिंक सिटी' कहा जाने लगा.
शहर के चारों ओर सुरक्षा दीवार और 7-8 ऐतिहासिक एंट्री गेट हैं. (जैसे जोरावर सिंह गेट, सूरजपोल, सांगानेरी गेट, चांदपोल आदि) जो जयपुर की प्राचीन रक्षा प्रणाली को दर्शाते हैं.
जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह द्वितीय कौन थे ?
महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय , कछवाहा राजपूत वंश के एक शासक थे, जिन्होंने आमेर की रियासत पर शासन किया. उनका कार्यकाल 1699 से 1743 ईस्वी तक रहा. महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने पुरानी राजधानी आमेर से पानी की कमी और बढ़ती आबादी के चलते साल 1727 में एक आधुनिक, सुरक्षित और भव्य शहर 'जयपुर' को बसाया था. जिसके लिए बंगाल के प्रसिद्ध वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य की मदद ली गयी थी. इतिहास में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय को कुशल रणनीतिकार और गणितज्ञ माना जाता है. जो खगोल शास्त्र (Astronomy) और वास्तुकला के भी अच्छे जानकार थे. इसी के चलते जयपुर में जंतर-मंतर का निर्माण कराया गया था. इसे भी यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा मिला है.
जब जयपुर को मिला था वर्ल्ड हैरिटेज साइट का टैग
जयपुर को ये प्रतिष्ठित दर्जा 6 जुलाई 2019 को अज़रबैजान के बाकू में आयोजित वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी के 43वें सेशन में मिला था. 1727 में सवाई जयसिंह द्वितीय के बसाये गये इस शहर में प्राचीन हिंदू, मुगल और पश्चिमी वास्तुकला का अद्भुत संगम दिखता है. विद्याधर भट्टाचार्य के दिशा-निर्देश में बने इसके चौपड़, बाजार और ऐतिहासिक इमारतें इसे दुनिया के अन्य शहरों से बिल्कुल अलग और उत्कृष्ट बनाते हैं, जिसकी वजह से इसे ये टैग हासिल हुआ था.
अगर छिन गया टैग, तो कितना बड़ा होगा जयपुर का नुकसान ?
राजस्थान टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र राठौड़ कहते हैं, "मैं 40 साल से इस सेक्टर में काम कर रहा हूं. यही हमारी रोजी-रोटी है. राजस्थान के पास जो हेरिटेज है, वह दुनिया में कहीं नहीं है" .उनके मुताबिक, अगर जयपुर से यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज का टैग छिन गया, तो बहुत बड़ा नुकसान होगा. असली टूरिज्म विदेशी सैलानियों से ही माना जाता है और टैग छिनने के बाद उनकी संख्या में भारी गिरावट आ जाएगी. अंतरराष्ट्रीय टूरिज्म मैप पर शहर अपनी 'प्रिमियम' साख खो देगा, जिससे स्थानीय हस्तशिल्प, होटल इंडस्ट्री और रोजगार पर सीधा नकारात्मक असर पड़ेगा.
अब तक यूनेस्को किसका छीना है टैग
यूनेस्को सिर्फ चेतावनी नहीं देता, बल्कि कड़ी कार्रवाई भी करता है. इतिहास में ऐसी कई जगहें हैं, जिन्होंने विकास की अंधी दौड़ में अपना हेरिटेज टैग हमेशा के लिए खो दिया
अरेबियन ओरिक्स अभ्यारण्य, ओमान (2007) : अवैध शिकार और पर्यावरण को नुकसान के बावजूद, ओमान सरकार ने तेल की खोज के लिए इस दुर्लभ अभ्यारण्य के दायरे को 90% तक कम कर दिया था. इसके बाद यूनेस्को ने इसका दर्जा वापस ले लिया.
ड्रेस्डेन एल्बे घाटी, जर्मनी (2009): इस खूबसूरत घाटी के बीचों-बीच सरकार ने भारी ट्रैफिक के लिए आधुनिक 'वाल्डश्लॉस्चेन ब्रिज' का निर्माण करवा दिया था. यूनेस्को की लगातार चेतावनियों के बाद भी जब काम पूरा हो गया, तो इस ऐतिहासिक स्थल का टैग हमेशा के लिए छिन गया.
लिवरपूल मैरीटाइम मर्केंटाइल सिटी, यूनाइटेड किंगडम (2021): ब्रिटेन की साइट पर हुए भारी आधुनिक और नए निर्माणों ने शहर की मूल ऐतिहासिक प्रामाणिकता को खत्म कर दिया था, जिसके चलते इसका दर्जा छीन लिया गया।
बग्राती कैथेड्रल, जॉर्जिया (2017 - आंशिक रूप से डीलिस्ट): 11वीं शताब्दी के इस ऐतिहासिक चर्च में सरकार ने कुछ ऐसे भारी रेनोवेशन और आधुनिक निर्माण कर दिए थे, जिससे इसकी मूल प्राचीन शैली प्रभावित हुई और यूनेस्को ने इसे अपनी हेरिटेज लिस्ट से बाहर कर दिया.
विरासत बचाने की संजीवनी : अब क्या किया जाना चाहिए?
जयपुर के हाथ से ये टैग निकलना एक भयानक भूल होगी. राजस्थान टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष , नरेंद्र राठौड़ की ये चिंता बिल्कुल वाजिब है कि जयपुर जैसे सुनियोजित बसे शहर तक का संरक्षण नहीं हो पा रहा है और टूरिज्म के नाम पर सिर्फ लीपापोती हो रही है. इस विरासत को बचाने के लिए अब गंभीर कोशिश होनी चाहिए. सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि जयपुर के परकोटे को पूरी तरह संरक्षित किया जाए और वहां से सभी अवैध कब्जे तुरंत हटाए जाएं. हेरिटेज मैनेजमेंट प्लान को सिर्फ कागजों तक सीमित न रखकर सख्ती से जमीन पर लागू करना होगा. सिर्फ सरकारी महकमों पर निर्भर रहने के बजाय, हेरिटेज से जुड़े लोगों, गाइडों और विशेषज्ञों का एक 'ग्रिड' (समन्वय समिति) बनाया जाना चाहिए, ताकि काम सिर्फ कागजों पर न हो, बल्कि हकीकत में जमीन पर उतरे. ट्रैफिक मैनेजमेंट को सुधारने के लिए बाहरी रिंग रोड और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रभावी इस्तेमाल करना होगा।और सबसे अहम बात- ये सब जल्दी से जल्दी करना होगा, वरना बहुत देर हो जाएगी. क्योकिं जो विरासत सदियों में बनती है, उसे उजड़ने में सिर्फ कुछ गलत फैसले और अनदेखी ही लगती है.