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Jaipur News: जयपुर की सदियों पुरानी पोलो परंपरा में 3 सितंबर 2026 की रात एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया. राजस्थान पोलो क्लब का मैदान पहली बार फ्लडलाइट्स की रोशनी से जगमगाया और रात के अंधेरे में घोड़ों की तेज टापों के बीच पोलो का रोमांच देखने को मिला. सितंबर जयपुर पोलो सीजन 2026 में आरपीसी कप के सेमीफाइनल मुकाबले नाइट पोलो के रूप में खेले गए. यह आयोजन जयपुर की पारंपरिक पोलो संस्कृति को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है.
फ्लडलाइट्स में पहली बार आधिकारिक नाइट पोलो
राजस्थान पोलो क्लब में पहली बार फ्लडलाइट्स की रोशनी में आधिकारिक नाइट पोलो मुकाबले आयोजित किए गए. मैदान की कृत्रिम रोशनी ने खेल का पूरा माहौल बदल दिया. घोड़ों की रफ्तार, खिलाड़ियों के शॉट और गेंद पर नियंत्रण का रोमांच रात के समय दर्शकों के लिए अलग अनुभव लेकर आया. महाराजा सवाई पद्मनाभ सिंह ने इस मौके को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि राजस्थान पोलो क्लब अब दुनिया के चुनिंदा फ्लडलाइट पोलो मैदानों में शामिल हो गया है.
आरपीसी कप के दोनों सेमीफाइनल रहे रोमांचक
नाइट पोलो के दौरान आरपीसी कप टूर्नामेंट के दोनों सेमीफाइनल मुकाबले खेले गए. पहले सेमीफाइनल में रामबाग/मेफेयर पोलो ने गोहिलवाड़ को 9-3 के बड़े अंतर से शिकस्त दी. इस मुकाबले में हुर्र अली ने शानदार प्रदर्शन किया और अपनी टीम के लिए 6 गोल किए.
दूसरे सेमीफाइनल में टीम जयपुर और आरपीसी आमने-सामने थीं. टीम जयपुर ने शानदार खेल दिखाते हुए आरपीसी को 12-3.5 से हराकर फाइनल में जगह बनाई. इस मुकाबले की सबसे बड़ी खासियत महाराजा सवाई पद्मनाभ सिंह का प्रदर्शन रहा. उन्होंने अपनी टीम के सभी 12 गोल अकेले दागे और जीत के सबसे बड़े नायक बने.
पद्मनाभ सिंह का लगातार दूसरा शानदार प्रदर्शन
जयपुर पूर्व राजपरिवार के सदस्य और प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी महाराजा सवाई पद्मनाभ सिंह के लिए सितंबर जयपुर पोलो सीजन 2026 की शुरुआत भी शानदार रही है. 1 सितंबर को सीजन के शुरुआती आरपीसी कप मुकाबले में टीम जयपुर का सामना रामबाग-मेफेयर पोलो से हुआ था. टीम जयपुर ने यह मुकाबला 7-3 से जीता और उस मैच में भी पद्मनाभ सिंह ने अपनी टीम के सभी 7 गोल अकेले किए थे.
इसके दो दिन बाद नाइट पोलो के ऐतिहासिक मुकाबले में उन्होंने 12 गोल करके अपने प्रदर्शन को और खास बना दिया. इस तरह शुरुआती दोनों मुकाबलों में उनकी गोल करने की क्षमता टीम जयपुर की जीत में निर्णायक रही.
अब फाइनल में आमने-सामने होंगी दो मजबूत टीमें
आरपीसी कप के फाइनल में अब टीम जयपुर और रामबाग/मेफेयर पोलो के बीच मुकाबला होगा. सेमीफाइनल में दोनों टीमों ने प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए अपनी जगह बनाई है. ऐसे में फाइनल को लेकर पोलो प्रेमियों की उत्सुकता बढ़ गई है. खासतौर पर टीम जयपुर की ओर से पद्मनाभ सिंह के प्रदर्शन पर सबकी नजर रहेगी.
पुरानी शाही परंपरा को मिला आधुनिक रूप
जयपुर में रात में पोलो का इतिहास पूरी तरह नया नहीं है. करीब 45 साल पहले दिवंगत महाराजा सवाई भवानी सिंह ने चौगान स्टेडियम में रात के समय विशेष रूप से जलती हुई पीतल की गेंदों के साथ पोलो का अनोखा मुकाबला कराया था. अब आधुनिक फ्लडलाइट्स के जरिए उसी पुरानी शाही परंपरा को नए और भव्य स्वरूप में सामने लाया गया है.
इस पहल ने जयपुर की ऐतिहासिक पोलो विरासत को आधुनिक खेल सुविधाओं से जोड़ने का काम किया है. साथ ही रात में मुकाबले होने से ऐसे खेल प्रेमियों के लिए भी नया विकल्प तैयार हुआ है, जो दिन के समय व्यस्त रहते हैं. इससे जयपुर में पोलो और खेल पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
रात में पोलो खेलना क्यों है कठिन
फ्लडलाइट्स में पोलो खेलना दिन के मुकाबले अधिक कठिन माना जाता है. कृत्रिम रोशनी में खिलाड़ियों को तेज गति से चलती गेंद पर लगातार नजर बनाए रखनी पड़ती है. मैदान में बनने वाली परछाइयां गेंद की वास्तविक स्थिति को समझने में भ्रम पैदा कर सकती हैं.
घोड़े पर तेज रफ्तार से चलते हुए खिलाड़ी को गेंद की दिशा, दूरी और गति का सही अनुमान लगाकर माललेट से शॉट लगाना होता है. रात में गहराई का अंदाजा लगाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है, जिससे सटीक शॉट लगाना कठिन हो जाता है. घोड़ों को भी फ्लडलाइट्स और मैदान पर बनने वाली परछाइयों के अनुसार खुद को ढालना पड़ता है.
फ्लडलाइट पोलो का वैश्विक इतिहास
फ्लडलाइट्स में खेल आयोजित करने की परंपरा का पोलो से पुराना संबंध है. दुनिया में पहला फ्लड-लिट पोलो मैच 18 जुलाई 1878 को लंदन के फुलहम में रनमेलाग क्लब और हरलिंगम क्लब के बीच खेला गया था. अब सितंबर 2026 में राजस्थान पोलो क्लब में आधिकारिक नाइट पोलो की शुरुआत ने जयपुर को भी उन चुनिंदा पोलो स्थलों की सूची में ला दिया है, जहां रात में कृत्रिम रोशनी के बीच इस खेल का आयोजन किया जाता है. जयपुर के लिए यह आयोजन केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं, साथ ही उसकी पुरानी पोलो पहचान को आधुनिक दौर के साथ जोड़ने वाला यादगार अवसर बन गया है.