भाषा चुनें
  • Hindi
  • English
  • Marathi
  • Bengali
  • Tamil
  • Malayalam
  • Gujarati
  • Telugu
  • Kannada
  • Odisha
  • Z Bharat
  • ZEE PHH
  • ZEE Business
  • WION
राज्य चुनें
  • उत्तर प्रदेश
  • उत्तराखण्ड
  • मध्य प्रदेश
  • छत्‍तीसगढ़
  • हरियाणा
  • दिल्ली
  • बिहार
  • झारखण्ड
  • राजस्‍थान
  • हिमाचल प्रदेश
  • हिन्दीEnglishमराठीবাংলাதமிழ்മലയാളംગુજરાતીతెలుగుಕನ್ನಡଓଡ଼ିଶାZ BharatPHHBusinessWION
  • facebookyoutubetwitterlinkedinwhatsapp
Zee News Hindi
App
Zee News Hindi
  • News
  • वीडियो
  • फोटोज़
  • रील्स
  • लाइव ब्लॉग
  • राज्य चुनें

Add Zee Business As A Preferred Source
App
  • लेटेस्ट न्यूज़
  • देश
  • खेल
  • दुनिया
  • मनोरंजन
  • बिजनेस
  • ओरिजनल
  • टेक
  • धर्म
  • ऑटो
  • एजुकेशन
  • एस्ट्रोलॉजी
  • राशिफल
  • LIVE टीवी
  • लेटेस्ट न्यूज़
  • देश
  • खेल
  • दुनिया
  • मनोरंजन
  • बिजनेस
  • ओरिजनल
  • टेक
  • धर्म
  • ऑटो
  • एजुकेशन
  • एस्ट्रोलॉजी
  • राशिफल
  • ज़ी न्यूज़ हिंदी
  • /राजस्थान
  • /गोडावण का जादुई सफर : अंडे से निकले,टनल में ली 'सेल्फ-ट्रेनिंग' और खुद सीखी उड़ान

गोडावण का जादुई सफर : अंडे से निकले,टनल में ली 'सेल्फ-ट्रेनिंग' और खुद सीखी उड़ान

The Great Indian Bustard Rajasthan, Godawan : राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण को विलुप्त होने से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने नायाब तरीका अपनाया, इन पक्षियों को उनके असली और प्राकृतिक स्वभाव से जोड़े रखा गया. नन्हे गोडावण ने अंडे से बाहर आने के बाद से किसी इंसान को नहीं देखा, बल्कि एक सुरक्षित टनल में खुद गिरकर, संभलकर और दौड़कर उड़ान भरना सीखा है.

Written ByPragati Pant Awasthi
Published: Oct 03, 2026, 02:39 PM IST|Updated: Oct 03, 2026, 06:34 PM IST
joinshare
गोडावण का जादुई सफर : अंडे से निकले,टनल में ली 'सेल्फ-ट्रेनिंग' और खुद सीखी उड़ान
Image Credit: great indian bustard godawan

About the Author

Pragati Pant Awasthi

Pragati Pant Awasthi

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
Read More

ट्रेंडिंग

  • न्यूज़
  • फोटो
  • वीडियो
चक्रवाती तूफान 'अर्नब' का बिहार पर दिखेगा असर, 28 अक्टूबर से बारिश के आसार, 29 को पूरे राज्य में 'ऑरेंज अलर्ट'

चक्रवाती तूफान 'अर्नब' का बिहार पर दिखेगा असर, 28 अक्टूबर से बारिश के आसार, 29 को पूरे राज्य में 'ऑरेंज अलर्ट'

2

PM मोदी के पिता पर टिप्पणी से गरमाई सियासत: गजेंद्र सिंह शेखावत और अतुल भंसाली ने कांग्रेस को घेरा

3

SBI-PNB-HDFC में 16 दिन नहीं होगा काम! चेक करें नवंबर में कब-कब बंद रहेंगे बैंक?

4

एटम बम का घमंड धड़ाम: भारत की परमाणु पावर से 'जिन्नालैंड' में हड़कंप; बिलबिला उठे सियासतदान

5

BJP vs Congress: 1 नवंबर को कांग्रेस की रैली के जवाब में बीजेपी करेगी पदयात्रा

logo
  • contact us
  • privacy policy
  • legal
  • investor info
  • advertise with us
© 1998-2026 Indiadotcom Digital Private Limited, All Rights Reserved.

गोडावण यानी Great Indian Bustard देश के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है. राजस्थान में इसकी सबसे बड़ी बची हुई आबादी है,लेकिन इनकी संख्या लगातार बेहद कम बनी हुई है. बिजली की हाईटेंशन लाइनें, प्राकृतिक आवास में बदलाव और दूसरे मानवीय हस्तक्षेप इनके लिए बड़ी चुनौती हैं.गोडावण की संख्या बढ़ाने के लिए जैसलमेर में कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसके तहत सुरक्षित तरीके से अंडों से चूजे तैयार किए गए और उन्हें प्राकृतिक वातावरण में लौटने के लिए तैयार किया गया. अब कैप्टिव ब्रीडिंग से पैदा हुए गोडावण को जैसलमेर के प्राकृतिक आवास में छोड़ने की तैयारी है. लेकिन असली चुनौती सिर्फ गोडावण को कैद में पैदा करना नहीं,बल्कि उन्हें जंगल में सुरक्षित तरीके से जीवित रहने और आगे प्रजनन करने लायक बनाना है. रिलीज के बाद इनकी निगरानी और ट्रैकिंग के जरिए ये देखा जाएगा कि ये पक्षी प्राकृतिक वातावरण में कैसे व्यवहार करते हैं और कितने सफलतापूर्वक सर्वाइव कर पाते हैं.

राजस्थान के रेगिस्तान से वन्यजीव संरक्षण के तहत अंडे से निकलने के बाद बिना किसी मानवीय दखल के,एक विशेष 'टनल'(सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर)में पलकर इन छोटे गोडावण (Great Indian Bustard) ने अब खुद उड़ना सीख लिया है.जब वैज्ञानिकों को यकीन हो गया कि, ये नन्हे परिंदे आसमान नापने के लिए तैयार हैं, तो 4 अक्टूबर 2026 को इन्हें इस टनल से आज़ाद कर प्रकृति की गोद में छोड़ा जा रहा है.

अंडे से टनल तक का जादुई सफर
गोडावण के संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि कृत्रिम रूप से (Artificial Incubation)अंडे सेने के बाद चूजों को इंसानों की आदत न पड़े जिसे (Human Imprinting) कहते हैं. अगर उन्हें इंसानों की आदत पड़ जाती,तो वे जंगल में कभी खुद का बचाव नहीं कर पाते.इसी समस्या को सुलझाने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और राजस्थान वन विभाग ने एक विशेष 'सॉफ्ट-रिलीज टनल'या एनक्लोजर बनवाया.

गोडावण जैसी कठपुतलियों की मदद से देते थे दाना-पानी
जब ये चूजे अंडे से बाहर आए,तो उन्हें एक ऐसे सुरक्षित बाड़े (टनल)में रखा गया जो चारों तरफ से ढका हुआ था. इस टनल के पास किसी भी इंसान या वैज्ञानिक को जाने की अनुमति नहीं थी. अगर दाना या पानी देना भी होता, तो उसे खास तरीके से और गोडावण जैसी दिखने वाली कठपुतलियों की मदद से दिया जाता था, ताकि चूजों को लगे कि उनकी मां ही उन्हें पाल रही है.

टनल के अंदर की 'सेल्फ-ट्रेनिंग'
इस टनल के अंदर का माहौल बिल्कुल डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) के प्राकृतिक आवास जैसा बनाया गया था. यहां इन छोटे-छोटे चूजों ने खुद से अपना जीवन कौशल (Survival Skills) विकसित किया. टनल के अंदर प्राकृतिक रूप से कीड़े-मकोड़े और टिड्डे छोड़े गए. चूजों ने अपनी जन्मजात वृत्ति (Instinct) का इस्तेमाल किया और दौड़-दौड़ कर अपना शिकार खुद पकड़ना सीखा.जैसे-जैसे वे बड़े हुए,टनल की लंबाई और खुली जगह ने उन्हें दौड़ने का मौका दिया. उन्होंने दौड़ते हुए अपने पंख फड़फड़ाना शुरू किया. किसी ट्रेनर ने उन्हें नहीं बताया कि कैसे उड़ना है. हवा के झोंकों और उनके डीएनए में बसे प्राकृतिक ज्ञान ने उन्हें उड़ान के गुर सिखाए.

4 अक्टूबर 2026: आज़ादी की पहली उड़ान
कई महीनों की इस 'सेल्फ-ट्रेनिंग' के बाद, अब इन गोडावण के पंखों में इतनी ताकत आ गई है कि वे रेगिस्तान की तेज हवाओं का सामना कर सकें. कैमरों और दूरबीनों से लगातार निगरानी कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि ये पक्षी अब पूरी तरह से जंगली व्यवहार कर रहे हैं और उड़ने में सक्षम हैं.4 अक्टूबर 2026 की तारीख तय हुई, जब इस विशेष टनल के गेट हमेशा के लिए खोल दिए जाएंगे. ये वो पल होगा जब ये गोडावण पहली बार अपने बाड़े से निकलकर थार के असीमित आसमान में अपने पंख पसारेंगे.

कैसे किया जा रहा है गोडावण का संरक्षण ?
गोडावण (Great Indian Bustard - GIB) भारत के सबसे गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) पक्षियों में से एक है. सरकारी और वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक,पूरी दुनिया में अब 150 से भी कम गोडावण बचे हैं,और इनमें से लगभग 90% से ज्यादा सिर्फ राजस्थान के जैसलमेर में पाए जाते हैं.

कैसा किया गया संरक्षण ?
इस पूरे प्रोजेक्ट का मुख्य केंद्र जैसलमेर का डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) है. इसके तहत दो प्रमुख ब्रीडिंग सेंटर काम कर रहे हैं.सम (Sam) कंजर्वेशन सेंटर में अत्याधुनिक इनक्यूबेटर और हैचिंग यूनिट्स स्थापित हैं. वहीं रामदेवरा सेंटर को गोडावण की पॉपुलेशन बढ़ाने के लिए एक सैटेलाइट सुविधा के रूप में विकसित किया गया है.

क्या है पूरी प्रक्रिया ?
ये प्रोजेक्ट 'बस्टर्ड रिकवरी प्रोग्राम'के तहत पर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC),राजस्थान सरकार और WII का एक संयुक्त प्रयास है.

अंडों की खोज कैसे होती है ?
वन विभाग की टीमें मानसून के दौरान रेगिस्तान में मादा गोडावण द्वारा दिए गए अंडों की सावधानीपूर्वक तलाश करती हैं. अक्सर ये अंडे शिकारियों (कुत्ते,लोमड़ी) या मवेशियों के पैरों से नष्ट होने के खतरे में होते हैं. फिर सुरक्षित रूप से लाए गए इन अंडों को ब्रीडिंग सेंटर के इनक्यूबेटर में रखा जाता है,जहां तापमान और नमी बिल्कुल प्राकृतिक माहौल जैसी रखी जाती है. चूजों के जन्म के बाद उन्हें उस 'टनल' में शिफ्ट किया जाता है, ये टनल उन्हें बाहरी खतरों से बचाती है लेकिन जंगली माहौल का पूरा अहसास कराती है.

सैटेलाइट टैगिंग क्यों होती है ?
टनल से आज़ाद करने से पहले इन पक्षियों के शरीर पर बहुत ही हल्के सैटेलाइट ट्रांसमीटर (GPS Tag) लगाए जाते हैं. पीठ पर लगे सोलर-पावर्ड GPS टैग से 24 घंटे रियल-टाइम डेटा मिलेगा. इससे वैज्ञानिक ये ट्रैक कर पाते हैं कि, आज़ाद होने के बाद पक्षी कहां जा रहे हैं,दिन भर में कितना उड़ रहा है,कहां सो रहा है और उसका कोर हैबिटेट क्या है और क्या ये नए गोडावण जंगल में पहले से मौजूद प्राकृतिक गोडावण के झुंड के साथ घुल-मिल पा रहे हैं ? अगर ये पक्षी खुले जंगल के खतरों को पार कर लेते हैं,तो ये साबित हो जाएगा कि कैप्टिव ब्रीडिंग से तैयार पक्षी जंगल में जी सकते हैं. इससे हर साल नए गोडावण को जंगल में छोड़ने का रास्ता खुलेगा,जो विलुप्ति की कगार पर खड़ी आबादी को फिर से आबाद करेगा.

मेटिंग और नेस्टिंग की ट्रैकिंग
जब ये पक्षी वयस्क हो जाएंगे,तो वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी नजर इनके प्रजनन पर होगी.फील्ड बायोलॉजिस्ट दूरबीन और कैमरा ट्रैप की मदद से ये मॉनिटर करेंगे कि क्या नर गोडावण मेटिंग के लिए प्राकृतिक 'डिस्प्ले' (मादा को रिझाने की प्रक्रिया) कर रहा है ? अगर मादा गोडावण जंगल में खुद घोंसला बनाकर अंडे देती है,तो ये इस प्रोजेक्ट की अंतिम और सबसे बड़ी जीत मानी जाएगी.

हाई-टेंशन बिजली की तारें है परेशानी
गोडावण का ये सफल परीक्षण एक बड़ी जीत है, लेकिन जंगलों में अभी भी कई खतरे मौजूद हैं. हाई-टेंशन बिजली की तारें गोडावण की मौत का सबसे बड़ी वजह रही हैं. चूंकि इनका वजन ज्यादा होता है (लगभग 15-18 किलो) और इनकी 'फ्रंटल विजन' (सामने देखने की क्षमता) कमजोर होती है, इसलिए ये उड़ते समय तारों को देख नहीं पाते और टकरा जाते हैं. इसी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद तारों पर 'बर्ड डायवर्टर' (Bird Diverters) लगाए जा रहे हैं.

8.50 करोड़ की लगात से बनी टनल
गोडावण को विलुप्ति से बचाने के राजस्थान के रामदेवरा में करीब 8.50 करोड़ रुपये की लागत से इस टनल को बनाया गया था. प्रोजेक्ट को लेकर राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने बताया कि ब्रीडिंग सेंटर में अब तक करीब 130 गोडावण सफलतापूर्वक तैयार किए जा चुके हैं.

सक्सेस मॉडल की रेप्लिका
सबसे खास बात ये कि अगर 'पपेट-रियरिंग' (कठपुतली से पालने) और 'रीवाइल्डिंग टनल' का ये जैसलमेर मॉडल पूरी तरह सफल होता है, तो इसी तकनीक का इस्तेमाल भारत के अन्य अति-संकटग्रस्त पक्षियों जैसे- खरमोर (Lesser Florican),बंगाल फ्लोरिकन (Bengal Florican) और जेर्डन कोर्सर (Jerdon's Courser) को बचाने में किया जा सकेगा.

जिस तरह अमेरिका ने 'कैलिफोर्निया कोंडोर' (California Condor) को बचाने के लिए कठपुतली तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था,उसी तरह राजस्थान का ये गोडावण प्रोजेक्ट ग्रासलैंड (घास के मैदानों) के ईकोसिस्टम को बचाने के लिए भारत का अपना स्वदेशी 'कंजर्वेशन ब्लूप्रिंट' बन जाएगा.
 

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:
Rajasthan News
Jaisalmer News