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दीपावली पर आतिशबाजी का अपना अलग ही आकर्षण है, लेकिन बूंदी के मिट्टी से बने अनार की बात ही कुछ खास है. राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही यह पारंपरिक आतिशबाजी आज भी लोगों की पसंद बनी हुई है. रंग-बिरंगी रोशनी, लंबे समय तक चलने और कम आवाज के कारण बूंदी के मिट्टी के अनार की मांग हाड़ौती सहित राजस्थान के कई जिलों और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात तथा मध्यप्रदेश तक है.
दो परिवारों के भरोसे जिंदा है बूंदी की पारंपरिक कला
बूंदी में इस पारंपरिक कला को शोरगर जमील अहमद और खलील भाई के परिवार आज भी जीवित रखे हुए हैं. कारीगर जमील अहमद बताते हैं कि पहले यहां करीब एक दर्जन परिवार इस काम से जुड़े थे, लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा सिमटती चली गई. अब केवल दो परिवार ही इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं. मिट्टी के अनार के अलावा यहां चक्कर, रोलर, रातरानी, बरसाती जाड़, इंद्रधनुष, ज्वालामुखी, मेहताब और झरना जैसी आतिशबाजी भी तैयार की जाती है.
दो मिनट तक बिखेरते हैं रंगीन रोशनी
कारीगरों के मुताबिक, बूंदी के मिट्टी के अनार करीब दो मिनट तक रंगीन रोशनी बिखेरते हैं और इनकी रोशनी 30 से 40 फीट तक पहुंचती है. तेज आवाज और अधिक धुएं के बजाय रोशनी पसंद करने वाले लोग इन्हें प्राथमिकता देते हैं.
कई राज्यों तक पहुंच रही बूंदी की पहचान
कोटा से आए ग्राहक और राहुल बताते हैं कि वे पिछले 25 से 30 वर्षों से बूंदी के अनार खरीद रहे हैं. इनके रिश्तेदार भी दूसरे राज्यों में इनकी मांग करते हैं. मिट्टी के अनार की कीमत 15 रुपये से लेकर 400 रुपये तक है.
बढ़ती लागत और संरक्षण की कमी से सिमट रहा कारोबार
कारीगर कामरान शोरगर बताते हैं कि यह उद्योग कई गरीब परिवारों को रोजगार देता है, लेकिन बढ़ती लागत, कम मुनाफे और सरकारी संरक्षण के अभाव में इससे जुड़े लोगों की संख्या लगातार घट रही है. बूंदी की यह रियासतकालीन आतिशबाजी कला केवल एक कारोबार नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान भी है. जरूरत है कि इस पारंपरिक हुनर को संरक्षण और प्रोत्साहन मिले, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी बूंदी के मिट्टी के अनार की चमक देख सकें.