पैरों के नीचे होती हैं जलती लपटें, थम जातीं दर्शकों की सांसें, बीकानेर में दीपावली पर फिर याद आई 'बनाटी'!
दीपावली पर बीकानेर के बारह गुवाड़ चौक में 203 साल पुरानी बनाटी परंपरा निभाई गई. प्रतिभागियों ने 8 से 12 किलो की जलती मशाल घुमाकर हैरतअंगेज करतब दिखाए. आयोजन में बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने भी हिस्सा लिया.
बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत और पुरानी परंपराओं की झलक एक बार फिर दीपावली पर देखने को मिली. शहर के बारह गुवाड़ चौक में 203 साल पुरानी बनाटी घुमाने की परंपरा निभाई गई. इस दौरान प्रतिभागियों ने 8 से 12 किलो तक वजनी जलती हुई मशालों को घुमाकर ऐसे करतब दिखाए कि वहां मौजूद लोग रोमांचित हो उठे. आग की लपटों के बीच साहस, संतुलन और शारीरिक दक्षता का यह प्रदर्शन आकर्षण का केंद्र रहा.
जलती मशालों के साथ दिखाए हैरतअंगेज करतब
दीपावली के अवसर पर बारह गुवाड़ चौक में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने भारी बनाटी को कभी सिर के ऊपर तो कभी पैरों के नीचे से घुमाया. जलती मशालों के साथ उनके करतब देखकर दर्शक दंग रह गए. आसपास के मोहल्लों से बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन को देखने पहुंचे. लोगों ने तालियां बजाकर और नारे लगाकर प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाया.
दो दिन तक तेल में भिगोकर तैयार होती है बनाटी
बनाटी तैयार करना भी एक खास कला है. इसके लिए लकड़ी के दोनों सिरों पर सूत के कोड़े बांधे जाते हैं. इसके बाद इन्हें करीब दो दिन तक तेल में भिगोकर रखा जाता है. बनाटी के दोनों सिरों का वजन और आकार बराबर रखा जाता है, ताकि इसे घुमाते समय संतुलन बना रहे और मशाल लंबे समय तक जलती रहे.
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एक महीने तक किया अभ्यास
स्थानीय लोगों के मुताबिक, बनाटी घुमाने के करतब दिखाने के लिए लंबे अभ्यास और प्रशिक्षण की जरूरत होती है. प्रशिक्षित उस्तादों के मार्गदर्शन में प्रतिभागियों ने करीब एक महीने तक इसकी तैयारी की. आयोजन में बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने भी हिस्सा लिया. इससे परंपरा में अलग-अलग पीढ़ियों की भागीदारी देखने को मिली.
नई पीढ़ी तक पहुंच रही पुरानी विरासत
होली की रम्मतों के लिए प्रसिद्ध बारह गुवाड़ चौक में आयोजित यह कार्यक्रम बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है. आयोजन सनाथा महाराज, फागणिया मारजा और पागा मारजा की पावन स्मृति में किया गया. यह कार्यक्रम ईश्वर महाराज और बारह गुवाड़ के महानुभावों के सानिध्य में हुआ.
बदलते समय के साथ कई पुरानी परंपराएं पीछे छूट रही हैं, लेकिन बारह गुवाड़ चौक का यह आयोजन बताता है कि बीकानेर में सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है. बनाटी के साथ दिखाए गए करतब केवल साहस का प्रदर्शन नहीं, बल्कि 203 साल पुरानी परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास भी हैं.