)
झालरापाटन के मुख्य बाजार में कुछ सीमित दुकानों में तैयार होने वाली फीणी सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि यहां की वर्षों पुरानी परंपरा और खानपान की विरासत है. पीढ़ी दर पीढ़ी हलवाइयों की तरफ से तैयार की जा रही इस मिठाई ने अपनी अलग पहचान बनाई है. स्थानीय कारीगरों की मेहनत और पारंपरिक बनाने के तरीके ने इसे खास बना दिया है. 
इसकी खासियत इसका स्वाद, बनावट और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया है. फीणी बनाने में कारीगरों को काफी मेहनत और हुनर की जरूरत होती है. ये ही वजह है कि इसका स्वाद दूसरी मिठाइयों से अलग माना जाता है. स्थानीय स्तर पर लोकप्रियता हासिल करने के बाद अब इसकी मांग देश के कई हिस्सों के साथ विदेशों तक पहुंच रही है.
झालरापाटन की इस पारंपरिक मिठाई को लेकर अब इसे और व्यापक पहचान दिलाने की उम्मीद भी बढ़ रही है. फीणी को जीआई टैग दिलाने की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा हो चुकी है. अगर इसे जीआई टैग मिलता है तो झालरापाटन की इस खास मिठाई को एक नई पहचान मिल सकती है.
झालरापाटन के फिनी व्यवसाई गिरधर स्वीट्स, के संचालक चिराग़ जैन कहते हैं कि उनका परिवार पिछले 5 पीढ़ियों से यानि करीब 200 सालों से झालरापाटन में फीनी बनाने का व्यवसाय कर रहा है. उनकी दुकान पर सालों से पुराने कारीगरों के हाथों से ही शुद्ध फीनी बनाने का कार्य किया जाता है. जिसमे शुद्धता का भी पूरा ध्यान रखा जाता है.
फीनी मिठाई में मावे का मिश्रण नहीं होता, इसलिए शुद्ध मैदा से बनने वाली मिठाई करीब 3 महीने तक खराब भी नहीं होती और इसमें मिलावट की भी ग्राहकों को आशंका नही रहती. उनके कुशल कारीगर, 4 तरह की फिनी बनाई जाती है, जिनका स्वाद और जायका भी अनोखा है.

फीनी खरीदारों ने बताया कि त्योहारों के दौरान मिलावटी मिठाइयों से बचने के लिए स्थानीय और ग्रामीण व्यक्ति फीनी पर ही विश्वसनीयता जताता है और त्यौहार पर एक दूसरे को भेजने के लिए अधिकांश लोग मिठाई के तौर पर फीनी का ही उपयोग करते हैं. ऐसे में शुद्ध फीनी की पसंद को अन्य महंगी मिठाइयां भी चुनौती नहीं दे पाती.
झालरापाटन की फिनी यहां की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक हुनर और स्वाद का अनूठा संगम है. जरूरत है तो बस इस पारंपरिक मिठाई को संरक्षण देने और देश-दुनिया में इसकी पहचान को और मजबूत बनाने की, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी झालरापाटन की इस मिठास का स्वाद चख सकें.
रिपोर्टर- महेश परिहार