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वसुंधरा को मानते थे बेटी, अटल-आडवाणी के साथ अटूट रिश्ता : अंदर की वो बातें जो भैरों सिंह शेखावत के बारे में शायद ही कोई जानता हो

भैरों सिंह शेखावत 'बाबोसा' के अनसुने किस्से, नाती अभिमन्यु सिंह राजवी के साथ, इस खास इंटरव्यू में जानें वसुंधरा राजे को बेटी मानने, अटल बिहारी बाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से रिश्तों और परिवार से जुड़े कई दिलचस्प और भावुक खुलासे

वसुंधरा को मानते थे बेटी, अटल-आडवाणी के साथ अटूट रिश्ता : अंदर की वो बातें जो भैरों सिंह शेखावत के बारे में शायद ही कोई जानता हो
Image Credit: social media

इन कई अनछुए पहलुओं, बचपन की यादों और आज की बदलती राजनीति पर राजस्थान की सियासत के 'शिखर पुरुष' और देश के पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. भैरों सिंह शेखावत के नाती अभिमन्यु सिंह राजवी से हुए एक बेहद खास और भावुक बातचीत के कुछ अंश 

सवाल: हम सब बाबोसा के नाम से जानते हैं. लेकिन भैरों सिंह शेखावत एक नाना के रूप में किस तरह के थे ? परिवार के बीच उनकी कोई ऐसी खास याद, जो आज भी आपके दिल के करीब है?
जवाब: देखिए, पूरा जीवन उन्हीं के साथ बीता है, इसलिए यादें बहुत ज्यादा हैं. लेकिन मैं यही कहूंगा कि नाना के रूप में वो बिल्कुल वैसे थे, जैसे किसी आम राजस्थानी ग्रामीण परिवार के नाना होते हैं. अपने बच्चों और नातियों के लिए, दिनभर काम करने के बाद भी, चाहे वो मुख्यमंत्री रहे हों या उपराष्ट्रपति, उनकी इच्छा रहती थी कि रात को सोने से पहले आधा घंटा या एक घंटा परिवार और बच्चों के साथ बिताएं.

फोटा साभार : @RajviAbhimanyu

सवाल: बाबोसा की छवि ऐसी थी कि वैचारिक रूप से विरोधी होने के बावजूद उनके विरोधी भी उनके मुरीद थे. आज के समय में इस तरह की राजनीति कितनी प्रासंगिक है? 
जवाब: मुझे लगता है कि आज राजनीति में जो कड़वाहट आ गई है, उस समय के नेताओं ने उसे अपने व्यक्तिगत संबंधों में कभी नहीं आने दिया. मैं बचपन की कुछ यादें बताता हूं. राजस्थान में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता उनके बहुत करीबी दोस्त थे. जब अशोक गहलोत जी मुख्यमंत्री थे, तब भी उनके मंत्रिमंडल में रहे चंदनमल वैद्य, प्रद्युम्न सिंह जी, गुलाब सिंह शाक्तावत और विधानसभा अध्यक्ष परसराम मदेरणा जैसे नेता उनसे मिलते-जुलते थे.

विधानसभा चलती थी तो दिन में एक-दूसरे पर खूब आरोप लगाते थे, लेकिन सदन से बाहर निकलने के बाद ये बात मन में नहीं रखते थे. उन्हें पता था कि ये राजनीतिक विरोध है, व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं.

मेरी मां की शादी से दो दिन पहले राजस्थान कांग्रेस के बड़े नेता और 17 साल तक मुख्यमंत्री रहे मोहनलाल सुखाड़िया जी का निधन हो गया था. शेखावत साहब इससे बहुत दुखी हुए. उन्होंने घर में बज रही शहनाइयां बंद करवा दीं और रोशनी उतरवानी शुरू कर दी. बाद में सुखाड़िया जी की पत्नी इंदुबाला सुखाड़िया जी, जो कांग्रेस की सांसद थीं, ने फोन करके कहा कि आपकी एक ही बेटी है, उसकी शादी है, कृपया शादी के कार्यक्रम में कमी न आने दें.

इसी तरह रामनिवास मिर्धा और नाथूराम मिर्धा जैसे नेताओं के परिवारों से भी उनके अच्छे संबंध थे. वो हमें समझाते थे कि इन नेताओं को भी अपने नानाजी की तरह सम्मान देना. आज भी कई परिवार एक-दूसरे के संपर्क में हैं. उनके करीबी दोस्तों में पूर्व प्रधानमंत्री और समाजवादी नेता चंद्रशेखर जी भी शामिल थे. राजनीतिक मतभेदों को निजी रिश्तों पर हावी नहीं होने देना उनकी बड़ी खासियत थी.

फोटो साभार: X/@RajviAbhimanyu

सवाल: अटल जी और आडवाणी जी के साथ जनसंघ से लेकर बीजेपी को खड़ा करने में बाबोसा की भूमिका को आप किस तरह याद करते हैं?
जवाब: देखिए, अगर ये पांच-छह लोग साथ नहीं होते, तो शायद भारत में जनसंघ का नामोनिशान भी नहीं होता. अटल जी, आडवाणी जी, भैरों सिंह जी, मुरली मनोहर जोशी और राजमाता सिंधिया ने एक-दूसरे का बहुत साथ दिया. उनमें कभी यह भावना नहीं आई कि कौन बड़ा नेता है और कौन छोटा.

एक बहुत मशहूर तस्वीर है, जिसमें 1952 में अटल जी, आडवाणी जी और भैरों सिंह जी साथ हैं. 2002 में अटल जी के जन्मदिन पर शेखावत साहब उन्हें एक अलग तरह का उपहार देना चाहते थे. किसी ने उन्हें 1952 की ये तस्वीर भेजी थी. उन्होंने उसे फ्रेम करवाकर प्रधानमंत्री आवास पर अटल जी को भेंट किया. उसी समय आडवाणी जी भी वहां आ गए.

प्रमोद महाजन जी ने सुझाव दिया कि जब 1952 की तस्वीर मौजूद है, तो 2002 में भी तीनों की ऐसी ही तस्वीर खिंचवाई जाए. पचास साल पहले ये तीनों जनसंघ के कार्यकर्ता थे और पचास साल बाद उनमें से एक प्रधानमंत्री, एक उपराष्ट्रपति और एक उपप्रधानमंत्री बन चुके थे. ये तस्वीर जनसंघ से बीजेपी तक के सफर और उनके संघर्ष की मिसाल है.

फोटो साभार: X/@RajviAbhimanyu

सवाल: विद्याधर नगर में बाबू साहब की समाधि के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ जो आपसी सम्मान देखने को मिला, उस पर आपकी क्या भावनाएं हैं?
जवाब: समाधि स्थल के लिए हम जीवनभर गहलोत साहब के आभारी रहेंगे. राजस्थान में पहली बार किसी नेता के सम्मान में सरकार की ओर से इस तरह का स्मारक बनाया गया. जब गहलोत साहब से ये आग्रह किया गया, तो उन्होंने बिना देर किए कहा कि आप लोग जगह चुन लीजिए, मैं आदेश जारी कर दूंगा.

उस समय सुधांश पंत जेडीए कमिश्नर थे, जो बाद में मुख्य सचिव बने. मुख्यमंत्री कार्यालय से भी अधिकारियों को भेजा गया, ताकि भैरों सिंह जी के स्मारक के लिए सही जगह चुनी जा सके.

गहलोत साहब उन आखिरी लोगों में से थे, जो शेखावत साहब के बहुत बीमार होने पर उनसे मिलने पहुंचे थे. दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे. उनके जाने के बाद भी गहलोत साहब ने परिवार से कहा कि किसी भी जरूरत में उन्हें बताएं, वो परिवार के साथ हैं. मेरे हिसाब से गहलोत साहब आज भी राजस्थान की उस पुरानी राजनीति की परंपरा निभा रहे हैं, जिसमें राजनीतिक दल अलग होने के बावजूद दोस्ती और सम्मान कायम रहता था.

सवाल: शुरुआती दौर से लेकर आखिरी समय तक वसुंधरा राजे के साथ विचारों और राजनीतिक तालमेल में जो मतभेद आए, उन पर आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: वसुंधरा जी को शेखावत साहब हमेशा अपनी बेटी की तरह मानते थे. राजमाता साहब की बेटियों वसुंधरा जी, यशोधरा राजे जी और उषा राजे जी के प्रति उनका वैसा ही सम्मान था, जैसा मेरी मां के प्रति था. उन्होंने वसुंधरा जी को आगे बढ़ाने में मदद की. मैंने खुद उन्हें कई बार वसुंधरा जी के पक्ष में खड़े होते देखा, खासकर तब, जब उनके राजनीतिक नुकसान की आशंका होती थी.

मतभेदों की बात करें तो शेखावत साहब के लिए परिवार और व्यक्तिगत संबंधों से भी ऊपर बीजेपी और राजस्थान के प्रति उनका लगाव था. जब उन्हें कोई बात ठीक नहीं लगती थी, तो वो उसे खुलकर कहते थे. वसुंधरा जी को भी जब पता चलता था कि वो किसी बात से नाराज हैं, तो दोनों तरफ से नाराजगी दूर करने के प्रयास होते थे.

आज भी जब वसुंधरा जी भाषण देती हैं, तो शेखावत साहब के साथ बिताए समय को याद करती हैं. उन्होंने वसुंधरा जी के राजनीतिक सफर में काफी मदद की. उन्हें झालावाड़ से लेकर धौलपुर तक चुनाव लड़ाने में शेखावत साहब ने साथ दिया. मेरे हिसाब से उन्होंने वसुंधरा जी के लिए उतना किया, जितना कोई पिता अपनी बेटी के लिए करता है. मतभेद आए, लेकिन उन्हें दूर करने के प्रयास भी लगातार होते रहे.

सवाल: खाचरियावास से निकलकर पूरे राजस्थान में बाबू साहब के नाम से पहचान बनाने तक के उनके सफर को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: मैं मानता हूं कि मेहनत और समर्पण हर कोई कर सकता है, लेकिन उनकी कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं लगती. खाचरियावास में उनके पिता किसान थे. वो किसी राजा या जागीरदार परिवार से नहीं आते थे. यहां तक कि पहले चुनाव में उनके पास जमानत राशि जमा करने के पैसे भी नहीं थे. वहां से निकलकर उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वो असाधारण है.

वो विधानसभा सत्र के दौरान घर आकर अखबारों की कटिंग करते थे और उनकी फाइल बनाकर रखते थे, ताकि अगले सत्र में जरूरत पड़ने पर उन जानकारियों का इस्तेमाल कर सकें. उन्होंने एक मशीन की तरह काम किया. उनकी मेहनत और समर्पण के साथ लोगों का सहयोग भी जुड़ता गया.

उन्होंने हमेशा ऐसी सीटों से चुनाव लड़ना चुना, जहां बीजेपी कमजोर थी या पहले कभी नहीं जीती थी. बाली, श्रीगंगानगर, छबड़ा, धौलपुर, निम्बाहेड़ा और किशनपोल जैसी जगहों से चुनाव लड़कर उन्होंने पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की. वो अपनी कोई सुरक्षित सीट बनाकर परिवार के लिए छोड़ने की राजनीति में विश्वास नहीं रखते थे. उन्होंने पूरे राजस्थान में अपनी पहचान बनाई. मेरे हिसाब से उनका यह सफर देश के सबसे प्रेरणादायक राजनीतिक सफरों में से एक है.

फोटो साभार: X/@RajviAbhimanyu

सवाल: आज की राजनीति और बाबोसा के समय की राजनीति में सबसे बड़ा अंतर क्या है ?
जवाब: आज कई नेता विधानसभा में बोलते हैं तो उसका वीडियो बनाकर तुरंत सोशल मीडिया पर डाल दिया जाता है. अधिकारियों से मिलने जाते हैं, तब भी वीडियो बनता है. मुझे लगता है कि आज की राजनीति काफी हद तक कैमरे के सामने प्रदर्शन जैसी हो गई है. कई बार ध्यान इस बात पर रहता है कि लोग सोशल मीडिया पर कितना पसंद करेंगे और फॉलोअर्स कितने बढ़ेंगे.

शेखावत साहब के समय विधानसभा में न वीडियो रिकॉर्डिंग होती थी और न ऑडियो रिकॉर्डिंग. फिर भी वो आठ-दस घंटे कमरे में बैठकर पढ़ाई करते थे, ताकि सदन में सही बात रख सकें. जनता के बीच भाषण देना हो या योजना आयोग की बैठक में जाना हो, वह आंकड़ों और तथ्यों की तैयारी करते थे. उनका ध्यान इस बात पर रहता था कि राजस्थान के लिए ज्यादा से ज्यादा क्या हासिल किया जा सकता है.

 कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने एक बार कहा था कि आज के नेता पहले अखबार में पढ़ते हैं और फिर भाषण देते हैं, जबकि भैरों सिंह जी पहले भाषण देते थे और अगले दिन वो अखबारों में छपता था. मेरे हिसाब से यही उस समय और आज की राजनीति के बीच का बड़ा अंतर है.

इस खास बातचीत और सादगी-संघर्ष की अनकही कहानियों के बीच, 'बाबू साहब' की जयंती पर उनके नाती अभिमन्यु सिंह राजवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर अपने नानासा को याद करते हुए एक बेहद भावुक पोस्ट साझा किया-

 

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Pragati Pant Awasthi

Pragati Pant Awasthi

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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