Rajasthan Nikay Chunav 2026 : बाड़मेर में बदला सत्ता का समीकरण, 15 साल का वनवास खत्म, कांग्रेस के किले में बीजेपी का कब्जा
Rajasthan Nikay Chunav 2026 : बाड़मेर की राजनीति में 14 सितंबर 2026 का दिन लंबे समय तक याद रखा जाएगा. नगर परिषद के चुनाव परिणाम ने शहर की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल दिया. जिस नगर परिषद पर लंबे समय से कांग्रेस का दबदबा रहा, वहां अब कमल खिल चुका है. 29 सीटों के बहुमत ने नगर परिषद की सरकार तय की, लेकिन नतीजों के पीछे सिर्फ भाजपा की रणनीति नहीं, कांग्रेस की गुटबाजी की कहानी भी है.
Rajasthan Nikay Chunav 2026 : 55 वार्डों वाली नगर परिषद में भाजपा ने 29 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है. कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई, जबकि 5 निर्दलीय पार्षद जीतकर आए. यानी भाजपा को बोर्ड बनाने के लिए किसी जोड़-तोड़ या निर्दलीय पार्षद के सहारे की जरूरत नहीं रह गई. ये परिणाम इसलिए भी बड़ा है क्योंकि 2019 में तस्वीर इसके बिल्कुल उलट थी. तब कांग्रेस ने 33 सीटें जीतकर मजबूत बोर्ड बनाया था. सात साल के अंतराल में 33 से 21 पर पहुंची कांग्रेस और विपक्ष से सत्ता के केंद्र तक पहुंची भाजपा यह आंकड़ों से कहीं बड़ी राजनीतिक कहानी है.
बलराम प्रजापत से दिलीप माली तक... अब भाजपा की बारी
बाड़मेर की नगर निकाय राजनीति का सफर नगरपालिका से नगर परिषद तक का रहा है. पुराने दौर में बलराम प्रजापत नगरपालिका के अध्यक्ष रहे. इसके बाद नगर परिषद की राजनीति में उषा जैन, लूणकरण बोथरा और दिलीप माली जैसे चेहरों ने सभापति के रूप में शहर की सरकार संभाली. 2019 में कांग्रेस के 33 पार्षदों के साथ दिलीप माली सभापति बने. उस समय कांग्रेस के पास संगठनात्मक ताकत के साथ स्थानीय राजनीति में मजबूत पकड़ मानी जाती थी. लेकिन अब वही नगर परिषद भाजपा के बहुमत वाले बोर्ड के हाथ में जाने जा रही है. सभापति पद का अंतिम चेहरा अभी तय होना बाकी है, लेकिन सत्ता की चाबी भाजपा के पास पहुंच चुकी है।.
ये भाजपा की जीत है या कांग्रेस की हार ?
बाड़मेर के चुनाव परिणाम को समझने के लिए ये सवाल सबसे महत्वपूर्ण है. भाजपा की 29 सीटें निश्चित रूप से उसके संगठन और चुनावी रणनीति की सफलता बताती हैं, लेकिन इस जीत की पृष्ठभूमि में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा. चुनाव से पहले ही कांग्रेस के भीतर गुटबाजी सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुकी थी. पूर्व विधायक मेवाराम जैन समर्थकों के साथ प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचे और पार्टी में गुटबाजी खत्म करने की मांग उठी. खुद जैन ने बाद में दावा किया कि कांग्रेस में गुटबाजी समाप्त हो चुकी है और सभी नेता मिलकर चुनाव लड़ेंगे.लेकिन चुनाव के दौरान सामने आई तस्वीर इन दावों से अलग थी. कांग्रेस के प्रत्याशियों की दो अलग-अलग बाड़ाबंदी की चर्चा सामने आई. एक तरफ मेवाराम जैन समर्थित प्रत्याशी और दूसरी तरफ कांग्रेस जिलाध्यक्ष लक्ष्मण गोदारा के नेतृत्व वाला समूह बताया गया. करीब 15 से 20 प्रत्याशियों के जैन समर्थक खेमे में होने की खबरें सामने आईं.
टिकट से लेकर बाड़ाबंदी तक... गुटों की खींचतान
कांग्रेस की टिकट प्रक्रिया ने भी अंदरूनी समीकरणों के बारे में बता दिया था. पार्टी ने 55 में से 51 वार्डों के उम्मीदवार पहले घोषित किए थे. चार बार पार्षद रहे और मेवाराम जैन के करीबी माने जाने वाले सुल्तानसिंह का टिकट काटकर नए चेहरे विक्रम को मौका दिया गया. दूसरी तरफ पूर्व पार्षद महावीर बोहरा की पत्नी मधुलता को टिकट दिया गया, जिन्हें जैन विरोधी खेमे से जुड़े राजनीतिक समीकरणों में देखा गया. यानी चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही कांग्रेस के भीतर टिकट सिर्फ चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति संतुलन का सवाल बन चुका था. ये ही वजह है कि अब कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा सवाल ये होगा कि 2019 में 33 पार्षदों वाला संगठन महज कुछ वर्षों में 21 तक कैसे पहुंच गया ?
केके विश्नोई की भूमिका
क्या प्रत्याशियों का चयन सही था ? या क्या नेताओं के बीच समन्वय की कमी रही ? या क्या कार्यकर्ता दो खेमों में बंट गए ? या फिर कांग्रेस स्थानीय चुनाव को सामूहिक लड़ाई बनाने के बजाय नेताओं के प्रभाव की लड़ाई बना बैठी ?
इन सवालों के जवाब अब पार्टी नेतृत्व को देने होंगे और इस पूरी कहानी में केके विश्नोई कहां खड़े हैं ? इस सबके बीच भाजपा की इस जीत के राजनीतिक समीकरण में राज्यमंत्री और गुड़ामालानी विधायक केके विश्नोई की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. विश्नोई 2023 में गुड़ामालानी विधानसभा एमएमसीट से जीतकर भजनलाल शर्मा सरकार में राज्यमंत्री बने.बाड़मेर की राजनीति में उनकी सक्रियता लगातार दिखाई देती रही है. बाड़मेर क्षेत्र में विकास, संगठन और राजनीतिक मुद्दों को लेकर सक्रिय भूमिका निभाई है.सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि निकाय चुनाव से पहले केके विश्नोई का आत्मविश्वास साफ दिखाई दे रहा था. 6 सितंबर को उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि भाजपा सभी जगहों पर भारी बहुमत के साथ बोर्ड बनाएगी और विपक्ष मैदान में नजर नहीं आ रहा. आज बाड़मेर नगर परिषद का परिणाम सामने है और भाजपा 29 सीटों के साथ बोर्ड बनाने की स्थिति में है. अब इसे संयोग कहें या राजनीतिक रणनीति का परिणाम लेकिन इतना तय है कि बाड़मेर में भाजपा का आत्मविश्वास अब परिणाम में बदल चुका है. हालांकि इस जीत का पूरा श्रेय किसी एक नेता को देना राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा. स्थानीय प्रत्याशियों की पकड़, भाजपा संगठन की मेहनत, प्रदेश सरकार का प्रभाव और कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी इन सभी ने मिलकर परिणाम बनाया है.
कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी
बाड़मेर का परिणाम कांग्रेस के लिए सिर्फ एक नगर परिषद हार नहीं है. ये उस संगठन के लिए चेतावनी है, जिसने 2019 में 33 सीटें जीती थीं. कांग्रेस के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भाजपा ने 29 सीटें कैसे जीतीं. असली सवाल ये है कि कांग्रेस अपनी 33 सीटें बचा क्यों नहीं पाई ? कांग्रेस अगर इस परिणाम को केवल भाजपा की लहर या स्थानीय प्रत्याशियों की हार मानकर आगे बढ़ती है तो संभव है कि असली समस्या जस की तस बनी रहे. क्योंकि चुनाव परिणाम ने एक बात साफ कर दी है बाड़मेर कांग्रेस के भीतर गुट सिर्फ राजनीतिक चर्चा नहीं रहे, उनका असर अब मतपेटी तक पहुंच चुका है.
अब भाजपा की भी अग्निपरीक्षा
भाजपा के लिए जश्न का दौर जरूर है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी. 15 साल के कथित राजनीतिक वनवास के बाद जनता ने भाजपा को नगर परिषद की चाबी सौंपी है. अब शहर सड़क, नाली, सीवरेज, सफाई, पेयजल, जल निकासी और अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर परिणाम चाहेंगे.29 पार्षद भाजपा के हैं, लेकिन शहर की अपेक्षाएं पूरे 55 वार्डों की हैं. इसलिए ये जीत भाजपा के लिए सिर्फ सत्ता हासिल करने की कहानी नहीं, बल्कि अगले पांच साल की जवाबदेही की शुरुआत है. बाड़मेर में कांग्रेस का पुराना किला ढह चुका है. भाजपा ने डेढ़ दशक बाद नगर परिषद में वापसी कर ली है. लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है. भाजपा ने बोर्ड जीता है, कांग्रेस ने सबक पाया है और अब बाड़मेर की जनता देखेगी कि सत्ता बदलने से शहर कितना बदलता है. कमल खिल चुका है... अब बाड़मेर इंतजार कर रहा है कि इस कमल से विकास की खुशबू आती है या नहीं.