जिंदगी में कुछ हादसे इंसान की पूरी दुनिया बदल देते हैं, लेकिन कुछ लोग उसी बदली हुई जिंदगी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं. राजस्थान की दो बेटियां अवनी लेखरा और मोना अग्रवाल इसकी मिसाल हैं. एक सड़क दुर्घटना के बाद व्हीलचेयर पर पहुंची, तो दूसरी महज नौ महीने की उम्र में पोलियो की वजह से शारीरिक चुनौतियों से घिर गई. दोनों के सामने रास्ते आसान नहीं थे, लेकिन दोनों ने अपनी परिस्थितियों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया. आज दोनों अंतरराष्ट्रीय पैरा निशानेबाजी में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं और राजस्थान का नाम रोशन कर रही हैं.
अवनी लेखरा-एक सड़क हादसे ने बदल दी जिंदगी
8 नवंबर 2001 को जयपुर में जन्मी अवनी लेखरा का बचपन दूसरे बच्चों की तरह सामान्य गतिविधियों, पढ़ाई और खेलकूद के बीच गुजर रहा था लेकिन साल 2012 में एक सड़क दुर्घटना ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. उस समय अवनी पांचवीं कक्षा में पढ़ती थीं.
अवनी अपने परिवार के साथ जयपुर से धौलपुर जा रही थीं. उनके पिता कार चला रहे थे और अवनी पीछे की सीट पर सो रही थीं. रास्ते में कार कई बार पलट गई. हादसे में परिवार के दूसरे सदस्य भी घायल हुए, लेकिन अवनी को सबसे गंभीर चोट लगी. उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई, जिसके कारण कमर के नीचे के हिस्से में लकवा हो गया. इसके बाद वह अपने पैरों से चलने में असमर्थ हो गईं और व्हीलचेयर पर निर्भर हो गईं.
हादसे के बाद उनकी जिंदगी अस्पताल, सर्जरी और लंबे उपचार के बीच सिमट गई. उनकी पीठ की सर्जरी हुई और वह करीब पांच से छह महीने तक बिस्तर पर रहीं. पढ़ाई भी प्रभावित हुई और उन्हें लगभग दो साल तक घर पर रहकर पढ़ाई करनी पड़ी. इस दौरान शिक्षकों ने घर आकर उनकी पढ़ाई जारी रखने में मदद की. अवनी के लिए यह केवल शारीरिक चोट से उबरने की चुनौती नहीं थी, बल्कि एक ऐसी उम्र में अपनी बदली हुई जिंदगी को स्वीकार करने का संघर्ष भी था, जब बच्चे अपने सपनों को आकार देना शुरू करते हैं.
पिता ने दिखाई नई राह, निशानेबाजी बनी जिंदगी का लक्ष्य
अवनी के पिता ने उनके पुनर्वास में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने अवनी को खेलों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया, ताकि वह शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को मजबूत बना सकें. शुरुआत में अवनी ने तीरंदाजी में हाथ आजमाया, लेकिन उन्हें इसमें वैसी सफलता और सहजता महसूस नहीं हुई. साल 2015 में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान उन्होंने निशानेबाजी शुरू की. प्रसिद्ध भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा से प्रेरित होकर उन्होंने राइफल शूटिंग को गंभीरता से अपनाया.
शुरुआत में शारीरिक संतुलन बनाना, शरीर के ऊपरी हिस्से को मजबूत करना और लंबे समय तक एकाग्रता बनाए रखना उनके लिए बड़ी चुनौती थी. उन्होंने नियमित अभ्यास और मेहनत से इन कठिनाइयों पर काम किया, जो खेल कभी छुट्टियों का शौक था, वही धीरे-धीरे उनका लक्ष्य बन गया.
साल 2015 में ही उन्होंने अपने पहले क्षेत्रीय स्तर के मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. टोक्यो पैरालंपिक 2020 में दो पदक और पेरिस पैरालंपिक 2024 में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने इतिहास रचा. टोक्यो में उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण और 50 मीटर राइफल थ्री पोजिशंस में कांस्य जीता था. पेरिस में 10 मीटर एयर राइफल का स्वर्ण दोहराकर वह दो पैरालंपिक स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं.
मोना अग्रवाल, नौ महीने की उम्र में पोलियो, लेकिन हौसले नहीं हुए कमजोर
सीकर में 8 नवंबर 1987 को जन्मीं मोना अग्रवाल की कहानी भी संघर्ष से शुरू होती है. महज नौ महीने की उम्र में उन्हें पोलियो हो गया, जिससे उनके दोनों पैर प्रभावित हुए. बचपन से ही उन्हें शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
मोना परिवार में तीन बेटियों में तीसरी थीं. उनके शुरुआती जीवन में परिवार के सामने उनकी परवरिश और भविष्य को लेकर चिंताएं थीं. ऐसे समय में उनकी दादी गीतादेवी ने उनका हौसला बढ़ाया और उनकी परवरिश में सहयोग देने का भरोसा दिलाया. मोना ने बाद में अपनी सफलता में दादी के विश्वास और प्रोत्साहन को अहम बताया.
शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और कला विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की. महज 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने स्वतंत्र जीवन जीने का फैसला लिया. उन्होंने मानव संसाधन और मार्केटिंग के क्षेत्र में काम किया और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ीं.
एथलेटिक्स, पावरलिफ्टिंग और सिटिंग वॉलीबॉल से निशानेबाजी तक
मोना का खेलों से जुड़ाव केवल निशानेबाजी तक सीमित नहीं रहा. साल 2016 में उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में कदम रखा और शॉटपुट, डिस्कस थ्रो और जैवलिन थ्रो में हिस्सा लिया. राज्य स्तर पर उन्होंने इन स्पर्धाओं में पदक भी जीते. इसके अलावा पैरा पावरलिफ्टिंग में भी अपनी प्रतिभा दिखाई.
साल 2019 में उन्होंने राजस्थान की महिला सिटिंग वॉलीबॉल टीम की कप्तानी की और टीम को राष्ट्रीय महिला सिटिंग वॉलीबॉल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक दिलाया. उनका खेल सफर लगातार आगे बढ़ रहा था, लेकिन निजी जीवन की जिम्मेदारियां भी उनके साथ थीं.
मोना शादीशुदा हैं और दो बच्चों की मां हैं और जयपुर में रहतीं हैं. उनके पति रवींद्र चौधरी भी पूर्व व्हीलचेयर बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं. परिवार के लिए एक कठिन दौर तब आया, जब उनके बेटे के महज दो महीने का होने के समय पति को बाइक दुर्घटना में मस्तिष्क में चोट लगी. इससे परिवार की परिस्थितियां प्रभावित हुईं और मोना के लिए दूर जाकर प्रशिक्षण लेना मुश्किल हो गया.
इसी दौरान उन्होंने अपने घर के पास स्थित शूटिंग अकादमी में राइफल शूटिंग शुरू करने का फैसला किया. दिसंबर 2021 में शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों तक पहुंचा. शुरुआत में राइफल का वजन संभालना, शरीर का संतुलन बनाए रखना और लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठकर अभ्यास करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था.
लगातार अभ्यास के साथ उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने शुरू किए. साल 2024 में पेरिस पैरालंपिक में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल SH1 स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा.
मां, खिलाड़ी और परिवार की जिम्मेदारियां
मोना की कहानी का एक अहम पहलू यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी के साथ उन्हें बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं. उनके ससुर की गंभीर बीमारी के बीच उनकी सास बच्चों की देखभाल में सहयोग करती हैं. परिवार के इस समर्थन से मोना को प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के लिए समय मिल पाता है.
हालांकि उनकी चुनौतियां यहीं खत्म नहीं हुईं. लगातार बैठकर अभ्यास करने के कारण उन्हें रीढ़ की नसों से जुड़ी परेशानी भी हुई, जिसके लिए उन्हें पुनर्वास और शरीर की मुद्रा सुधारने पर काम करना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने अपने अभ्यास और तकनीक को बेहतर बनाने का प्रयास जारी रखा.
नागोया में मोना का स्वर्ण, अवनी का रजत
19 अक्टूबर 2026 को जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई पैरा गेम्स में दोनों खिलाड़ियों ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग SH1 स्पर्धा में मोना अग्रवाल ने 250.0 अंक के साथ स्वर्ण पदक जीता और नया गेम्स रिकॉर्ड बनाया. अवनी लेखरा ने 249.6 अंक के साथ रजत पदक हासिल किया. यह मुकाबला बेहद करीबी रहा. मोना ने अंतिम दौर में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण अपने नाम किया, जबकि अवनी को रजत से संतोष करना पड़ा. भारत के लिए यह दोहरी सफलता थी.
दो कहानियां, एक संदेश
अवनी लेखरा और मोना अग्रवाल की जीवन यात्राएं अलग हैं, लेकिन दोनों की कहानी का संदेश एक है. अवनी ने एक सड़क दुर्घटना के बाद अपनी जिंदगी को नए सिरे से दिशा दी, तो मोना ने बचपन से चली आ रही शारीरिक चुनौतियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अपने खेल को नई ऊंचाई दी.
दोनों की उपलब्धियां केवल पदकों की कहानी नहीं हैं. ये उस विश्वास की कहानी हैं, जिसमें मुश्किल हालात के बावजूद व्यक्ति अपने लिए नई राह बना सकता है. जयपुर और सीकर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं इन दोनों खिलाड़ियों ने राजस्थान की बेटियों और देश के दिव्यांग खिलाड़ियों को यह संदेश दिया है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मेहनत और संकल्प से नई पहचान बनाई जा सकती है.