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Alwar Mayor Election 2026: नगर निगम चुनाव के नतीजों ने अलवर में बोर्ड गठन का गणित बेहद दिलचस्प बना दिया है. 65 वार्डों वाले नगर निगम में भाजपा ने 28, कांग्रेस ने 23, बसपा ने एक और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 13 वार्डों में जीत दर्ज की है. बोर्ड बनाने के लिए 33 पार्षदों का समर्थन जरूरी है. ऐसे में भाजपा बहुमत के आंकड़े से महज 5 कदम दूर है, जबकि कांग्रेस को बहुमत के लिए 10 पार्षदों के समर्थन की जरूरत है. स्पष्ट बहुमत किसी भी दल को नहीं मिलने से अब सत्ता की चाबी 13 निर्दलीय पार्षदों के हाथ में आ गई है.
निर्दलीयों को साधने में जुटी BJP-कांग्रेस
निर्दलीय पार्षदों की बढ़ी राजनीतिक अहमियत के बीच भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने पक्ष में समर्थन जुटाने में जुटे हैं. सूत्रों के अनुसार, भाजपा करीब 7 से 8 निर्दलीय पार्षदों को अपने खेमे में लाने में कामयाब हो चुकी है. कांग्रेस भी निर्दलीय पार्षदों से संपर्क साधकर अपना गठजोड़ मजबूत करने की कोशिश में है. हालांकि मौजूदा समीकरणों को देखते हुए अलवर नगर निगम में भाजपा का बोर्ड बनने की संभावना फिलहाल ज्यादा मजबूत नजर आ रही है.
2019 के मुकाबले BJP को सिर्फ एक सीट का फायदा
अगर साल 2019 के निकाय चुनाव परिणामों से तुलना करें तो भाजपा को इस बार महज एक वार्ड का फायदा हुआ है. 2019 में भाजपा ने 27 वार्ड जीते थे, जबकि इस बार उसके खाते में 28 वार्ड आए हैं. वहीं, कांग्रेस ने पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है. 2019 में 19 वार्डों में जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस इस बार 23 वार्डों तक पहुंची है, यानी पार्टी को चार वार्डों का फायदा हुआ है. बसपा ने इस बार एक वार्ड में जीत दर्ज की है, जबकि निर्दलीय और अन्य दलों का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में कमजोर रहा है. 2019 में निर्दलीय व अन्य के खाते में 19 वार्ड थे, जो इस बार घटकर 14 रह गए हैं.
13 निर्दलीय तय करेंगे बोर्ड का भविष्य
हालांकि निर्दलीयों की संख्या कम हुई है, लेकिन इस बार उनकी भूमिका कहीं ज्यादा निर्णायक हो गई है. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर हैं और ऐसे में 13 निर्दलीय पार्षद ही बोर्ड गठन की दिशा तय करेंगे. जिस दल को पर्याप्त निर्दलीयों का समर्थन हासिल होगा, महापौर पद भी उसी के खाते में जाने की संभावना होगी और नगर निगम बोर्ड पर भी उसी दल का कब्जा होगा.
16 सितंबर तक नामांकन, 21 को मतदान
मेयर पद के नामांकन की अंतिम तारीख 16 सितंबर है, जबकि 18 सितंबर को नाम वापसी के बाद 21 सितंबर को मतदान होगा. भाजपा इस बार अपने पक्ष में पर्याप्त संख्याबल जुटाने के साथ-साथ संभावित क्रॉस वोटिंग की आशंका को भी खत्म करना चाहती है. यही वजह है कि पार्टी अतिरिक्त निर्दलीय पार्षदों को भी अपने पक्ष में लाने की रणनीति पर काम कर रही है.
2019 की क्रॉस वोटिंग से BJP ने लिया सबक
दरअसल, साल 2019 का अनुभव भाजपा के लिए अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. उस चुनाव में भाजपा के पास कांग्रेस से ज्यादा पार्षद होने के बावजूद पार्टी बोर्ड बनाने में सफल नहीं हो सकी थी. भाजपा के ही कुछ पार्षदों की क्रॉस वोटिंग के चलते कांग्रेस बोर्ड बनाने में कामयाब रही थी. ऐसे में इस बार भाजपा के सामने सिर्फ निर्दलीयों को साधने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने पार्षदों को भी एकजुट रखने की बड़ी जिम्मेदारी है.
अलवर में निर्दलीय बने 'किंगमेकर'
अलवर में फिलहाल निर्दलीय पार्षद किंगमेकर की भूमिका में हैं. भाजपा बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंच चुकी है और यदि पार्टी अपने पार्षदों को एकजुट रखते हुए जरूरी निर्दलीयों का समर्थन पुख्ता कर लेती है, तो नगर निगम की सत्ता उसके हाथ में आ सकती है. दूसरी ओर कांग्रेस के लिए चुनौती बड़ी है, लेकिन बोर्ड गठन की दौड़ अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. ऐसे में 21 सितंबर तक अलवर की सियासत में जोड़-तोड़, संपर्क और समर्थन का दौर जारी रहने की पूरी संभावना है.
Report-Jugal Gandhi