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राजस्थान के जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद 87 वर्षीय आशुमल थाउमल हरपलानी (आसाराम) के जीवन और स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों तथा चिकित्सा संस्थानों की सिफारिशों के बावजूद, जेल प्रशासन द्वारा उन्हें आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवाने का आरोप लगाया जा रहा हैं. इस मामले ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और हिरासत में रखे गए व्यक्ति की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
बमबम ठाकुर ने बताया कि आशुमल थाउमल हरपलानी (आसाराम) कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं. इनमें एडवांस्ड कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD-DVD), बार-बार होने वाली एंजाइना की शिकायत, 13 अक्टूबर 2026 को हुआ नॉन-एसटी एलिवेशन मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (NSTEMI), 20 अक्टूबर 2026 को एट्रियल फिब्रिलेशन तथा 23 अक्टूबर 2026 को हृदयाघात के बाद दोबारा एंजाइना की शिकायत शामिल है. इसके अतिरिक्त वे इंटेस्टाइनल एंजियोडिस्प्लेसिया से भी पीड़ित हैं, जिसके कारण आंतरिक रक्तस्राव का खतरा बना हुआ है.
इन बीमारियों के प्रभाव के कारण उन्हें दोबारा हृदयाघात होने, जानलेवा अनियमित हृदय गति (कार्डियक एरिडमिया) उत्पन्न होने तथा अचानक कार्डियक अरेस्ट होने का पूरा खतरा है. उनकी उम्र और हाल की स्वास्थ्य घटनाओं को देखते हुए किसी भी आपात स्थिति में उपचार में थोड़ी-सी देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है.
आशुमल हरपलानी का कई वर्षों से उपचार कर रहे डॉ. सचित भोला के अनुसार, जीवन बचाने के लिए निरंतर चिकित्सकीय निगरानी, कार्डियक मॉनिटरिंग, 24 घंटे प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी तथा तत्काल उपचार की व्यवस्था आवश्यक है. इसमें ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (AED), आवश्यक आपातकालीन दवाइयां और कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) में प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता भी शामिल है. हालांकि, आरोप है कि जेल परिसर में ये सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.
बमबम ठाकुर ने बताया कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना का आरोप दस्तावेजों के अनुसार, 30 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि आशुमल हरपलानी को उपलब्ध कराई जा रही चिकित्सा सुविधाएं आगे भी जारी रहेंगी. 1 जुलाई 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने भी पूर्ववर्ती न्यायिक आदेशों के तहत अनुमत सभी चिकित्सा सुविधाएं आरोग्यम हॉस्पिटल में जारी रखने का निर्देश दिया था. इसके बाद 6 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार से आश्वासन दिया था कि एम्स जोधपुर की सिफारिशों का पालन किया जाएगा.
डॉ. सचित भोला ने 30 अक्टूबर को जेल अधीक्षक को लिखे पत्र में जेल के भीतर आवश्यक कार्डियक आपातकालीन सुविधाओं की अनुपलब्धता पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. आरोप है कि बार-बार मौखिक एवं लिखित रूप से अवगत कराने के बावजूद, जेल अधीक्षक प्रमोद शेखावत द्वारा आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था और न्यायिक निर्देशों की लगातार अनदेखी की जा रही है.
बताया गया है कि 28 अक्टूबर 2026 को आरोग्यम हॉस्पिटल के डॉ. अरुण कुमार त्यागी ने उनका परीक्षण कर कुछ पंचकर्म प्रक्रियाएं आईपीडी (IPD) में भर्ती करके कराने की सलाह दी थी, लेकिन जेल अधीक्षक ने उन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं कराया. साथ ही 28 अक्टूबर से उन्हें उनकी पसंद का कोई प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी 24 घंटे उपलब्ध नहीं कराया गया, जबकि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश मौजूद हैं.
इस गंभीर स्थिति को लेकर 29 अक्टूबर 2026 को जेल अधीक्षक को लिखित शिकायत भेजी गई और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में भी शिकायत दर्ज कराई गई है. आयोग से मांग की गई है कि जेल अधीक्षक द्वारा न्यायिक आदेशों की कथित अवहेलना के संज्ञान लेते हुए बंदी को तत्काल आरोग्यम हॉस्पिटल पहुंचाने के लिए हस्तक्षेप किया जाए.
आरोग्यम अस्पताल प्रशासन ने भी आत्मसमर्पण के समय उनकी गंभीर चिकित्सा स्थिति को देखते हुए समुचित चिकित्सा व्यवस्था जारी रखने की आवश्यकता बताई थी. साथ ही जेल में वापस आते ही चिकित्सा व्यवस्था बाधित होने की बात सामने आई है. यह पूरा मामला जेल प्रशासन की उस मूल जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है, जिसके तहत हिरासत में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब न्यायालयों के आदेश और सरकारी चिकित्सा संस्थानों की अनुशंसा मौजूद हैं, तो फिर 87 वर्षीय बंदी के जीवन को बचाने के लिए आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं और आपातकालीन उपचार में आखिर बाधा क्यों आ रही है. मामले में तत्काल हस्तक्षेप और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच की मांग की जा रही है.