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52 उप-शक्तिपीठों में शामिल है मां भस्मी देवी मंदिर: अनोखी मान्यताओं और रहस्यों से घिरा है यह पावन धाम

Edited ByRupak Kumar
Published: Oct 14, 2026, 01:19 PM IST|Updated: Oct 14, 2026, 02:13 PM IST
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Muzaffarpur News: बिहार के मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड स्थित मां भस्मी देवी मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और सदियों पुराने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है.

Muzaffarpur News: बिहार के मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड स्थित मां भस्मी देवी मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और सदियों पुराने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है. बूढ़ी गंडक नदी के तट पर पांच पीपल के पेड़ों के बीच स्थित इस मंदिर को 52 उप-शक्तिपीठों में से एक माना जाता है.
 

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पश्चिम दिशा में मंदिर का प्रवेश द्वार, जानिए मान्यता

मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड के पानापुर में नेपाल से आने वाली बूढ़ी गंडक नदी के तट पर पांच पीपल के वृक्षों के बीच एक अनोखी मंदिर स्थित है. मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में है, जबकि आमतौर पर मंदिरों और घरों का प्रवेश द्वार पूर्व या उत्तर दिशा में होता है. मान्यता है कि पहले मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में था, लेकिन एक घटना के दौरान मंदिर का मुख द्वार घूमकर पश्चिम दिशा की ओर हो गया.
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उप-शक्तिपीठ के रूप में मिली प्रसिद्धि

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां माता सती का दाहिना कपोल यानी गाल गिरा था. इसी वजह से इस स्थान को 52 शक्तिपीठों में से एक उप-शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्धि मिली. मंदिर से जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत करती हैं.
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हवन कुंड की भस्म से जुड़ी है एक मान्यता

मंदिर की एक प्रमुख मान्यता यहां स्थित हवन कुंड की भस्म से जुड़ी है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस भस्म का लेप लगाने से चर्म रोग, पुराने शारीरिक कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं. इसी मान्यता के कारण यहां की भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा रही है. इसी से मंदिर का नाम मां भस्मी देवी पड़ा.
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1958 से पहले यहां बलि देने की परंपरा थी

बताया जाता है कि वर्ष 1958 से पहले यहां मन्नत पूरी होने पर बलि देने की परंपरा थी. बलि के बाद प्रसाद और हवन सामग्री के साथ हवन कुंड में भस्म तैयार की जाती थी. इसके बाद श्रद्धालु पवित्र भस्म को अपने साथ ले जाते थे. मंदिर के प्रधान पुजारी के अनुसार, नवरात्र के दौरान बकरे की बलि दी जाती थी और उससे जुड़ी धार्मिक प्रक्रिया के बाद हवन कुंड में भस्म तैयार होती थी.
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पहले पूरे साल जलता था हवन कुंड

हालांकि, वर्ष 1958 में अयोध्या से आए साधु-संतों और नागा साधुओं ने पूजा-अर्चना कर बलि प्रथा बंद कराई. इसके बाद से यहां मन्नत पूरी होने पर बलि देने के बजाय कबूतर उड़ाने की परंपरा शुरू हुई. आज भी श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर मंदिर परिसर में कबूतर उड़ाकर माता के प्रति आस्था व्यक्त करते हैं. बताया जाता है कि यहां का हवन कुंड पहले पूरे साल जलता रहता था.
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1975 की भीषण बाढ़ में भी सुरक्षित रहा मंदिर

बूढ़ी गंडक नदी के किनारे स्थित होने के बावजूद इस मंदिर से जुड़ी एक और खास मान्यता है. बताया जाता है कि वर्ष 1975 में आई भीषण बाढ़ के दौरान भी नदी का पानी मंदिर के प्रांगण और गर्भगृह तक नहीं पहुंचा था. बाढ़ का पानी मंदिर के नीचे ही रहा. इस घटना को श्रद्धालु माता की कृपा और मंदिर की विशेषता से जोड़कर देखते हैं.
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सच्चे मन से मांगी गई मन्नत होती है पूरी

मां भस्मी देवी मंदिर नि:संतान दंपतियों और पुत्र प्राप्ति की कामना करने वाले श्रद्धालुओं के बीच विशेष रूप से प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है. मनोकामना पूरी होने के बाद माता के दरबार में आंचल पर नाच करवाने की अनोखी परंपरा भी निभाई जाती है. इस वजह से बिहार के अलग-अलग इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.
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रहस्य से भरा है मंदिर का इतिहास

मंदिर का इतिहास भी अपने आप में रहस्य से भरा है. पांच पीपल के पेड़ों के बीच स्थित इस प्राचीन मंदिर की स्थापना कब हुई, इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है. हालांकि, इसे पालकालीन बताया जाता है. वर्ष 1960 में पटना विश्वविद्यालय के एक इतिहासकार ने अपने अध्ययन के दौरान मंदिर के गर्भगृह में लगी ईंटों को पालकालीन बताया था. पाल वंश का शासनकाल आठवीं से 12वीं शताब्दी के बीच माना जाता है. हालांकि, इसके बाद मंदिर के इतिहास पर कोई विस्तृत शोध नहीं हुआ.
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देश ही नहीं विदेश से भी आते है श्रद्धालु

मंदिर की ख्याति बिहार से बाहर भी फैली हुई है. यहां बंगाल और असम के अलावा नेपाल और अमेरिका से भी श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं. मंदिर के प्रधान पुजारी बताते हैं कि एक समय नेपाल के लोग नाव से माता के दर्शन के लिए आते थे और पूजा-अर्चना के बाद वापस लौट जाते थे. आज भी दूर-दराज से भक्त यहां पहुंचकर पूजा करते हैं और मुंडन संस्कार भी कराते हैं.
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मुख्य पुजारी ने बताया

प्रधान पुजारी का कहना है कि मां भस्मी देवी मंदिर 52 उप-शक्तिपीठों में से एक है. इसलिए इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और मंदिर का जीर्णोद्धार कराने की जरूरत है. मंदिर से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं, ऐतिहासिक महत्व और श्रद्धालुओं की आस्था को देखते हुए इसके संरक्षण की मांग उठ रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस धार्मिक धरोहर से परिचित हो सकें. रिपोर्ट: मणितोष कुमार
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