'अमीरों की ट्रिक और गरीबों का माइंडसेट डिकोड', Sagar Sinha का Exclusive इंटरव्यू
Zee News Digital की स्पेशल इंटरव्यू सीरीज में बिजनेस कोच और मोटिवेशनल स्पीकर सागर सिन्हा ने गरीबों और अमीरों के माइंडसेट के बारे में खुलकर चर्चा की. साथ ही मनी मैनेजमेंट की टिप्स भी शेयर की.
Business influencer Sagar Sinha interview: 'आप की औकात अगर 10 उसी तरह की गाड़ी खरीदने की हो, तब आप एक गाड़ी खरीदिए'. 'अगर आप 40 हजार रुपये सैलरी उठाते हैं तो आपका खर्च करने का तरीका क्या होना चाहिए जिससे आप और आपका पैसा दोनों पैसे की मशीन बन जाए'. 'आज का यूथ पर्सनल फाइनेंस में ऐसी कौन सी गलतियां कर रहा है जिससे वह लोन ट्रैप में फंसता जा रहा है और आखिर में वह कौन से बातें हैं जो अमीर छिपाते हैं लेकिन मिडिल क्लास लोग उस पर अपनी शेखी बघारते हैं'. इन्हीं सब सवालों के लॉजिकल जवाब लेकर जी न्यूज डिजिटल की स्पेशल इंटरव्यू सीरीज में सागर सिन्हा ने बात की जो सोशल मीडिया पर फेमस इंफ्लुएंसर और बिजनेस कोच हैं.
आदित्य प्रकाश-सागर सिन्हा जी, आपकी जी न्यूज की स्पेशल इंटरव्यू सीरीज में स्वागत है. पर्सनल फाइनेंस को लेकर आपका फॉर्मूला क्या है जिससे बुढ़ापे तक यूथ के पास पैसा रहे?
सागर सिन्हा- पैसा भरपूर कमाओ और ईमानदारी से कमाओ. मैं तो 50-30-20 के फॉर्मूले पर लाइफ जीता हूं. इसका मतलब है कि 50 फीसद पैसा आपकी जरूरतों पर खर्च हो, 30 फीसद पैसा आपकी इच्छाओं पर खर्च हो और 20 फीसद पैसा सेविंग और इन्वेस्ट हो. जिस किसी ने भी इस चीज को अमल में लाकर जीना सीख लिया, वह कभी गरीब रह ही नहीं सकता. 50 फीसद में आपकी घर की जरूरतें, किराया, लोन की ईएमआई सब आती हैं. 30 फीसद में वह आता है जो आप करना चाहते हैं मसलन, बाहर खाने का मन हुआ, कपड़े खरीदे का मन हुआ, जूते खरीदने का मन हुआ, फोन खरीदने का मन हुआ...यह सब आपकी इच्छाएं हैं जो एक बेहतर लाइफ के लिए जरूरी हैं. अब इसके इसके बाद आती है सेविंग और इन्वेस्टमेंट जो आपकी इनकम का 20 फीसद हो. इसमें एसआईपी, क्रिप्टो, रियल एस्टेट और जमीन में इन्वेस्ट करना हो सकता है.
आदित्य प्रकाश-यह तो ठीक है लेकिन हमारे जो व्यूअर्स हैं, वह इस बात को कैसे समझेंगे? अगर किसी की 40 हजार सैलरी है तो वह इसे कैसे मैनेज करे?
सागर सिन्हा- अगर किसी की 40 हजार सैलरी है तो 20 हजार में आपकी जरूरत का खर्च होना चाहिए. इसमें घर का खाना-पीना, बच्चों की एजुकेशन फीस, ईएमआई सबकुछ आ जाना चाहिए. अगर इससे ज्यादा खर्च हो रहा है तो फिर दिक्कत है. अब बचा 50 फीसद यानी 20 हजार. 20 हजार में से 30 फीसद यानी 12 हजार रुपये में घूमना-फिरना, कपड़ा-लत्ता होना चाहिए. यह वह इच्छाएं हैं जिनका बिना जिंदगी खत्म तो नहीं होती लेकिन फिर जिंदगी, जिंदगी जैसी नहीं रहती. और अब जो बचा 20 फीसद यानी 8 हजार रुपये तो इसमें से कुछ हिस्सा सेविंग और कुछ हिस्सा इन्वेस्टमेंट होना चाहिए. यह दिखने में तो आसान लगता है लेकिन इसे बैलेंस करना बहुत ही डिफिकल्ट होता है. लोग यह सोचने लगते हैं कि हमारी सैलरी लाख-डेढ़ लाख हो जाएगी, तब यह करेंगे लेकिन खराब खर्चे की आदत हमारे डीएनए में घुस जाती है. आदमी आदतन मजबूर हो जाता है अपनी औकात से ज्यादा खर्च करने के लिए...आज अगर वह ऑल्टो से चल रहा है तो होंडा सिटी ले आएगा. सैलरी बढ़ेगी तो वह 1 बीएचके से 2 बीएचके में चला जाएगा. वह लाइफ स्टाइल बढ़ाता चला जाएगा लेकिन सेविंग और इन्वेस्टिंग नहीं.
आदित्य प्रकाश-सागर जी, आज का जो मौजूदा दौर है उसमें घर खरीदना कितना मुश्किल है. नोएडा, ग्रेटर नोएडा में 3 बीएचके फ्लैट का प्राइस 1 करोड़ से ज्यादा हो चुका है लेकिन लोगों की एवरेज सैलरी कुछ ज्यादा नहीं है. इसका क्या सॉल्यूशन है?
सागर सिन्हा- आज घर खरीदना जरूरत से ज्यादा एस्पिरेशन बन चुका है.अगर किसी की 30-40 हजार सैलरी है तो क्या जरूरत है एक करोड़ का फ्लैट लेने की. ऐसी बहुत सी जगह हैं जहां 50 लाख में घर मिल सकता है. और अगर वह भी नहीं ले सकते तो क्या जरूरत है महंगा घर खरीदने की. जब तक सैलरी या इनकम न बढ़ जाए, रेंट पर रहा जाए. जब पैसा नहीं है तो जरूरतों को हमको कॉम्प्रोमाइज करना सीखना होगा. इस बारे में एक बात आपको बताता हूं. दो साल पहले एक फिल्म आई थी 'हनुमान'. उस फिल्म का बजट था 12 करोड़ लेकिन बिजनेस कर गई 200 से 300 करोड़. तब किसी ने उस फिल्म के डायरेक्टर से पूछा कि आपने 12 करोड़ में इतनी बेहतरीन फिल्म कैसे बना दी? तब उसने कहा था कि मैंने तो बजट ज्यादा मांगा था लेकिन प्रोड्यूसर ने दिया नहीं. तब प्रोड्यूसर ने कहा था कि बड़े बजट में तो कोई भी फिल्म बना लेगा लेकिन जो आदमी छोटे बजट में अच्छी फिल्म बना ले तो असली काबलियत सामने आती है. जिंदगी को जिसने कमियों में जीना सीख लिया तो वह कभी ईएमआई ट्रैप, लोन के ट्रैप में नहीं फंसता. लोगों के हार्ड वर्क, मेहनत, लोगों के इन्वेस्टमेंट और लोगों के एसेट से इंस्पायर होना शुरू कीजिए, उनकी लग्जरी लाइफ से नहीं.
और हां, दूसरी जरूरी चीज. कभी भी एक सोर्स ऑफ इनकम पर डिपेंडेंट मत रहिए. ऐसा होने का मतलब है कि आप अपने फोर-व्हीलर को बिना स्टेपनी के एक ऐसे जंगल से गुजार रहे हैं जहां टायर कभी भी पंचर हो सकता है, वह भी परिवार के साथ. ऐसे में उसकी जिंदगी खराब हो सकती है. तो मल्टीपल सोर्स ऑफ इनकम बनाइये.
आदित्य प्रकाश-लेकिन जब इंसान जॉब करता है तो उसके पास तो वक्त ही नहीं बचता है?
सागर सिन्हा- वक्त तो बहुत होता है. आपके सामने मैं खुद एग्जांपल हूं. मैंने 9 साल इंजीनियर की जॉब की लेकिन आज जॉब नहीं करता. मैंने उसी समय को यूटेलाइज किया है. रही बात कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की तो ऑर्गेनाइजेशंस की पॉलिसी तब क्लैश होती है जब आप वही काम दूसरा शुरू करते हो. अगर आप इंजीनियर हैं और आप सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनते हैं तो कोई कॉन्फ्लिक्ट नहीं है न? और कई बार चीजें छिपाकर भी की जाती हैं. रही बात समय की तो वह 9-6 का समय तो बड़े आराम से अपने जॉब पर ध्यान देने में निकाल देता है लेकिन बाकी का समय रील्स देखने में, आलतू-फालतू के वीडियो देखने में, गप्पें लड़ाने में, दूसरों के गॉसिप्स करने में खर्च करेगा तो समय मिलेगा कहां? समय निकालना पड़ता है, होता किसी के पास नहीं है.
आदित्य प्रकाश-आज के टाइम में जो मोटिवेशनल स्पीकर्स या बिजनेस कोच वो बहुत ज़्यादा हो चुके हैं. इस फील्ड में क्या चांसेस हैं ग्रो करने के?
सागर सिन्हा- कोई भी फील्ड बहुत पैसा देने की कैपेबिलिटी रखती है. बस ये डिपेंड करता है कि आप उस फील्ड में टॉप पर पहुंचते हैं या नहीं. आज बहुत सारे बिजनेस कोच हैं जो 100 करोड़ सालाना तक कमाते हैं. आज मोटिवेशनल स्पीकर या बिजनेस कोच इतने सारे आ गए हैं लेकिन लोग उन्हीं को सुनेंगे जो रियल कंटेंट देंगे और जिनकी बातों में दम होगा. जिनकी बातों से लोगों की लाइफ में बदलाव आएगा. तो अगर आपको इस फील्ड में आना है तो पहले अपनी नॉलेज और स्किल्स पर काम कीजिए. जब आपके पास सही कंटेंट होगा तो लोग अपने आप आपको सुनेंगे और ग्रोथ भी मिलेगी.
आदित्य प्रकाश-एक चीज अक्सर जेन जी में देखने को मिल रही है कि वह बिजनेस को लेकर ज्यादा अवेयर नहीं है. इस बात में कितनी सच्चाई है?
सागर सिन्हा- आज के टाइम पर बिजनेस ग्लैमरस दिखता है. लोग 'शार्क टैंक' देखते हैं तो वहां स्टाइलिश जज बैठे होते हैं. बड़े-बड़े बिजनेस का इतना वैल्यूशन दिखाया जाता है कि जेन जी को लगता है कि बिजनेस का मतलब है ग्लैमर. अब दूर से तो बिजनेस ग्लैमर दिख रहा है लेकिन इसके पीछे बड़ा दर्द होता है. आपको रेवेन्यू बनाना है, सेल्स बढ़ाना है, प्राॅडक्ट मार्केटिंग करनी है. मार्केट की डिमांड के अनुसार प्राॅडक्ट बनाना है. इसके पीछे बहुत सारा दर्द होता है जो जेन जी देख ही नहीं पाता. वह ग्लैमर देखकर धंधे में कूद तो जाता है लेकिन जब उसको रिजल्ट वैसा नहीं मिलता, जैसा वह सोचकर आया है तो फिर बहुत जल्द बैक भी मार लेता है.
आदित्य प्रकाश- आज के युवाओं को आप पैसे के बारे में क्या मैसेज देना चाहेंगे?
सागर सिन्हा- यूथ के लिए मेरा सीधा मैसेज है कि अपने शुरुआती दिनों में वह खूब पैसे कमाए. हालांकि आज के समय में सोशल मीडिया के माध्यम से इंफॉर्मेशन इतनी हो गई है कि फोकस बिगड़ सा गया है. यूथ का फोकस क्लियर होना चाहिए कि उसे कौन सा कंटेंट देखना है और उसके आधार पर पैसे के लिए क्या प्लान बनाना है. आज डिस्ट्रैक्शन युवाओं का बड़ा दुश्मन बन गया है जिसमें फोकस करना मुश्किल हो रहा है.
पूरा इंटरव्यू साथ में अटैच्ड वीडियो में देखें...