RBI का बड़ा कदम: क्या है करेंसी स्वैप? जिसके जरिये बैंकों से कम किये 11 लाख करोड़; महंगाई पर लगेगी लगाम!
Cash Surplus: आरबीआई ने बैंकिंग सिस्टम से 11 लाख करोड़ रुपये का एक्स्ट्रा कैश हटाने के लिए करेंसी स्वैप किया है. सेंट्रल बैंक की तरफ से उठाए गए इस कदम का महंगाई और बैंकिंग सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा. आइए जानते हैं-
Currency Swap Explained: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद भारी नकदी को कम करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में करेंसी स्वैप (Currency Swap) का सहारा लिया है. देश के बैंकिंग सिस्टम में कैश सरप्लस करीब 11 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. बाजार में इतनी बड़ी मात्रा में एक्स्ट्रा कैशन बनी रहने से ब्याज दर पर दबाव पड़ता है और लोन की डिमांड बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है. ऐसे में आरबीआई (RBI) ने विदेशी मुद्रा यानी डॉलर-रुपये के Sell-Buy Swap के जरिये सिस्टम से रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करने की कोशिश की है. आखिर करेंसी स्वैप क्या होता है, यह कैसे काम करता है और RBI को इससे क्या फायदा होगा? आइए आसान भाषा में समझते हैं-
क्या होता है करेंसी स्वैप?
आसान शब्दों में कहें तो करेंसी स्वैप (Currency Swap) दो पक्षों के बीच एक तय अवधि के लिए विदेशी मुद्रा और लोकल करेंसी की अदला-बदली का फाइनेंशियल एग्रीमेंट होता है. आरबीआई (RBI) और कमर्शियल बैंकों जैसे SBI, HDFC, ICICI आदि के बीच जब यह एग्रीमेंट होता है तो इसके दो स्टेप होते हैं. पहला स्टेप मौजूदा समय में और दूसरा स्टेप भविष्य की तय तारीख पर पूरा होता है.
करेंसी स्वैप के दो प्रकार
सेल-बाय स्वैप (Sell-Buy Swap): इसमें आरबीआई (RBI) की तरफ से सबसे पहले बैंकों को अमेरिकी डॉलर की बिक्री की जाती है, बदले में उनसे भारतीय रुपये लिये जाते हैं. इसके बाद एग्रीमेंट के अनुसार तय समय सीमा पूरी होने पर RBI वही डॉलर बैंकों से वापस खरीद लेता है और उन्हें उनके रुपये लौटा देता है.
बाय-सेल स्वैप (Buy-Sell Swap): इसमें प्रोसेस ठीक उल्टा होता है. आरबीआई (RBI) पहले बैंकों से डॉलर खरीदता है और बाजार में रुपये डालता है. बाद में उन डॉलर को बैंकों को वापस बेच देता है. हाल ही में आरबीआई ने Sell-Buy Swap के जरिये बैंकिंग सिस्टम में बने अतिरिक्त रुपये को अपने पास मंगाया है. इसका मकसद बाजार में लिक्विडिटी लेवल को नॉर्मल करना है.
कैसे काम करता है RBI करेंसी स्वैप सिस्टम?
- पहले कदम के तहत आरबीआई स्पॉट मार्केट में डॉलर की बिक्री करता है. आरबीआई ने कमर्शियल बैंकों से शॉर्ट टर्म Sell-Buy फॉरेन एक्सचेंज स्वैप का करार किया. इसके तहत RBI ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार से अमेरिकी डॉलर बैंकों को बेचे.
- दूसरे कदम के तहत आरबीआई बैंकों से रुपये बाहर निकालता है. जब बैंकों ने RBI से डॉलर खरीदे तो भुगतान के लिए अपनी जमा से अरबों रुपये निकालकर RBI के पास जमा कराए. इस प्रोसेस के पूरा होते ही बैंकिंग सिस्टम से 11 लाख करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा बाहर निकल गया.
- तीसरे कदम के तहत आने वाले समय में डॉलर की वापसी का वादा होता है. दरअसल, यह एक स्वैप डील है, इसलिए RBI ने बैंकों के साथ एग्रीमेंट किया कि अक्टूबर या आने वाले 6 से 12 महीने में वह इन डॉलर को तय फॉरवर्ड रेट पर बैंकों से वापस ले लेगा. तब तक यह एक्स्ट्रा पैसा बैंकिंग सिस्टम से बाहर रहेगा और बाजार में नकदी का बैलेंस बना रहेगा.
बैंकों में 11 लाख करोड़ सरप्लस कैसे आए?
हालिया महीनों में भारतीय बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPI) ने भारी मात्रा में निवेश किया. इसके अलावा, भारतीय कंपनियों की तरफ से विदेशों से पूंजी जुटाने और ग्लोबल बॉन्ड सूचकांकों में भारत के शामिल होने से देश में अमेरिकी डॉलर का इनफ्लो हुआ. जब बाजार में डॉलर ज्यादा होते हैं तो रुपया मजबूत होने लगता है. इससे भारत के निर्यात पर असर पड़ सकता है. रुपये में उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए RBI ने बाजार से डॉलर खरीदे. डॉलर खरीदने के बदले RBI ने बाजार में भारतीय रुपये जारी किये और बैंकों के पास भारी मात्रा में रुपया इकट्ठा हो गया.
एक्स्ट्रा लिक्विडिटी और महंगाई
इकोनॉमिक्स का बेसिक नियम है कि जब बाजार में किसी चीज की अधिकता होती है तो उसकी कीमत गिर जाती है. यही नियम पैसे या नकदी पर भी लागू होता है. जब बैंकों के पास 11 लाख करोड़ की भारी नकदी बिना किसी उपयोग के पड़ी रहती तो बैंकों की फंडिंग कॉस्ट बहुत कम हो जाती है. बैंक इस पैसे को जल्द से जल्द उधार देने के लिए ब्याज दर में कटौती करने लगते हैं. लोन सस्ता होने पर बाजार में मनी सप्लाई तेजी से बढ़ जाती है. लोग और कंपनियां लोन लेकर खरीदारी, निवेश और खर्च बढ़ा देते हैं. बाजार में डिमांड बढ़ने पर सप्लाई उस रेश्यो में नहीं हो पाती तो महंगाई बढ़ने लगती है. कच्चे तेल के की कीमतें बढ़ने से यदि घरेलू लेवल पर महंगाई बढ़ती है तो इससे देश की इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ेगा.
RBI ने बॉन्ड बेचने के बजाय करेंसी स्वैप को क्यों चुना?
बाजार से अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए आरबीआई (RBI) के पास कई ऑप्शन मौजूद थे. ऐसे में यह सवाल है कि केंद्रीय बैंक ने करेंसी स्वैप का का तरीका ही क्यों चुना? यदि RBI एक्स्ट्रा पैसे को कम करने के लिए सरकारी बॉन्ड (Government Securities) की सीधी बिक्री (OMO) करता तो बाजार में बॉन्ड की सप्लाई बहुत बढ़ जाती. इससे बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) में उछाल आता और सरकार के लिए लोन लेना महंगा हो जाता. करेंसी स्वैप से बॉन्ड मार्केट पर दबाव नहीं पड़ता.
इसके अलावा आरबीआई यदि VRRR नीलामी के जरिये भी बैंकों से पैसा लेता तो कई बार बैंक अनिश्चितता के कारण VRRR में अपनी पूरी पूंजी लगाने से कतराते हैं. करेंसी स्वैप बैंकों को डॉलर के रूप में एक सुरक्षित और बेहतर रास्ता देता है. स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) के तहत बैंक अपना एक्स्ट्रा पैसा आरबीआई (RBI) के पास पार्क कर सकते हैं. लेकिन इसमें RBI को बैंकों को ब्याज देना पड़ता है. करेंसी स्वैप एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें घरेलू बॉन्ड बाजार को नुकसान पहुंचाए बिना आरबीआई बाजार से नकदी को कम कर लेता है.
एक्सपर्ट की राय
फाइनेंशियल मार्केट के जानकारों का कहना है कि करेंसी स्वैप बेहद प्रभावशादी लेकिनप अस्थायी कदम है. एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की सीनियर इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा ने कहा, 'सेल-बाय स्वैप डील से लिक्विडिटी की प्रॉब्लम पूरी तरह खत्म नहीं होती, यह भविष्य की किसी तारीख के लिए टाला जाता है.' जब स्वैप की मैच्योरिटी होगी तो RBI को दोबारा डॉलर खरीदकर बाजार में रुपये डालने होंगे. यदि आरबीआई 6 से 12 महीने के लिए स्वैप का यूज करता है तो वह घरेलू बॉन्ड मार्केट को प्रभावित किये बिना बड़ी नकदी को लंबे समय तक इनएक्टिव कर सकता है.