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'मिनी लोकसभा चुनाव' का बिगुल बज चुका है. जिस राज्य से होकर रास्ता केंद्र के सिंहासन तक जाता है, उसके लिए लड़ाई का आगाज हो चुका है. जुबानी तीर शुरू हो चुके हैं और समाजवादी वार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के चीफ जयंत चौधरी के बीच ठन गई है.
हाल ही में, अखिलेश यादव ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी (SP) ने 'चवन्नी को रुपया' बना दिया. जाहिर है यह तंज जयंत चौधरी पर था, जो पहले सपा के ही सहयोगी थे और अब एनडीए में हैं. इसके बाद, यूपी के शामली में जाट 'हरियाणवी' गायक अंकित बालियान की हत्या ने इस बात पर बहस छेड़ दी कि कौन सी पार्टी असल में किसान समुदाय के साथ खड़ी है. अब जयंत ने 'चवन्नी-रुपया' वाली लड़ाई को पश्चिमी UP के गन्ने के खेतों तक पहुंचा दिया है. और 'G फॉर गन्ना, J फॉर जाट' का नारा दिया है. उन्होंने कहा, 'S और P को तो मौका भी नहीं मिलेगा.'
दोनों के बीच यह सिर्फ 'वर्ड वॉर' नहीं है. यह दिखाता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले RLD और SP पश्चिमी यूपी में अपनी सियासी साख को और मजबूत करने के लिए लड़ रहे हैं. BJP ने भी पकड़ बनाए रखने के लिए जान झोंक दी है.
सवाल है कि क्या RLD, जयंत पर अखिलेश के हमलों का जवाब दे पाएगी? RLD नेता का कहना है कि ये हमले जाटों के सम्मान पर चोट हैं. या फिर, क्या गन्ना और उससे जुड़ी चीजों को लेकर किसानों की नाराजगी NDA गठबंधन को नुकसान पहुंचाएगी? यह सब तब हो रहा है जब RLD की नजर UP के गन्ना उगाने वाले जाट-बहुल इलाकों में ज्यादा सीटों पर है.
UP के कुल वोटरों में जाटों की हिस्सेदारी सिर्फ 2% के आसपास है, लेकिन राज्य के पश्चिमी हिस्से में (जो हरियाणा और दिल्ली से सटा है) उनकी बड़ी आबादी उन्हें काफी असरदार बनाती है. माना जाता है कि पश्चिमी UP की 70-80 सीटों पर वे 12-15% वोटर हैं. और नॉर्थ मेन बेल्ट की 30-40 सीटों पर उनकी हिस्सेदारी 35% तक है. इस बेल्ट में मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ, सहारनपुर और बिजनौर जैसे जिले आते हैं, जहां गन्ना उगाया जाता है और जाटों का दबदबा है. उनका असर मुख्य इलाके के पश्चिम और दक्षिण में हापुड़, अमरोहा, मुरादाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़ और मथुरा तक भी फैला हुआ है.
UP के लगभग एक दर्जन जिलों में उनकी हिस्सेदारी 20-25% मानी जाती है. जाट वोट इस समुदाय को उन मुकाबलों में असरदार बनाते हैं, जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम हो सकता है. उनके कम्युनिटी नेटवर्क और हाल के किसान आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में भूमिका से उनकी चुनावी अहमियत और बढ़ जाती है.
मगर, सपा के लिए एक बड़ा नुकसान RLD का साथ ना होना है, जिसे 1996 में चौधरी अजीत सिंह ने बनाया था. इसके जरिए सपा को साल 2022 में जाट वोटरों तक पहुंचने में मदद मिली थी. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले, जब मोदी सरकार ने पूर्व PM चौधरी चरण सिंह (चौधरी अजीत के पिता और जयंत के दादा) को भारत रत्न देने का ऐलान किया, तो RLD NDA का हिस्सा बन गई.
अब बीजेपी को आरएलडी की राजनीतिक जगह का फायदा मिल रहा है. साथ ही उसका अपना संगठन और कल्याणकारी योजनाओं का मुद्दा भी है. अखिलेश ने RLD को चुनौती दी है और तंज कसा है कि वे अपनी चुनाव लड़ने वाली सीटों की संख्या (2022 में 33 थीं) को दोगुना करें. लेकिन NDA को भी गन्ने से जुड़ी नाराजगी और सहयोगियों के बीच ज्यादा सीटों के लिए होड़ का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें RLD भी शामिल है. लेकिन जयंत का G का मतलब गन्ना (गुर्जर या गुज्जर नहीं) वाला दांव भी जोखिम भरा है.
कुल मिलाकर, जाट इलाके में राजनीति गरमा रही है. क्या जयंत और BJP, अखिलेश को पश्चिमी UP और रोहिलखंड से दूर रख पाएंगे, जहां INDIA गठबंधन ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़त हासिल की थी?
मौजूदा UP विधानसभा का कार्यकाल मई 2027 में खत्म हो रहा है, और सभी 403 सीटों के लिए चुनाव उससे पहले पूरे होने चाहिए, बशर्ते सदन को उससे पहले भंग न किया जाए.
पिछले महीने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान, अखिलेश ने UP 2022 चुनावों से पहले जयंत की कही एक पुरानी बात को याद किया, जब वे सहयोगी थे. जयंत ने कहा था, 'क्या मैं कोई चवन्नी हूं, जिसे बस पलट दिया जाए?' ठीक जब SP-RLD गठबंधन की संभावना लग रही थी, RLD NDA में शामिल हो गई.
16 अगस्त को अखिलेश ने जयंत का नाम लिए बिना कहा कि SP ने ऐसे गठबंधन किए, जिनमें उसने 'चवन्नी को रुपया बना दिया', लेकिन जिन लोगों को उसने मजबूत किया, उन्होंने ही पार्टी छोड़ दी. SP नेताओं ने इस हमले को और तेज कर दिया. उन्होंने कहा कि जिन लोगों को 'राजनीति की ABCD' भी नहीं पता थी, वे पहले चवन्नी से अठन्नी, फिर एक रुपया और आखिर में 'चमकता हुआ सोना' बन गए.
जयंत ने शुरुआत में तो सीधे टकराव से बचने की कोशिश की. लेकिन 3 सितंबर को सहारनपुर में एक रैली में उन्होंने इन टिप्पणियों को चौधरी चरण सिंह की विरासत और जाट समुदाय का अपमान बताया. बाद में, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश की टिप्पणी को 'लोकतंत्र का अपमान' कहा.
जयंत ने कहा, 'ABCD के बाद भी कुछ आता है. G से गन्ना और J, आप सब जानते हैं कि इसका क्या मतलब है. हम उन्हें G और J के बीच फंसा देंगे. S और P की तो कभी बारी ही नहीं आएगी.' शब्दों के इस खेल और तरीके का इस्तेमाल करते हुए, RLD प्रमुख ने जाति की पहचान को इस इलाके के खेती-किसानी के मजबूत प्रतीक 'गन्ने' के साथ जोड़कर एक हमला किया.
SP के मीडिया सेल ने X पर 'गन्ना' शब्द का इस्तेमाल करते हुए और भी तीखा जवाब दिया. UP में किसानों पर पुलिस की लाठीचार्ज का वीडियो शेयर करते हुए, SP के हैंडल ने कहा कि जब BJP ने राजनीतिक रूप से जयंत को 'गन्ने से पीटा' था और उन्हें 2024 में 'गन्ने के लायक' बना दिया था, तब उनकी पार्टी ने ही जयंत का बचाव किया था. RLD ने NDA के हिस्से के तौर पर सिर्फ दो सीटों पर चुनाव लड़ा था. SP ने जयंत पर BJP में शामिल होकर जाट समुदाय के साथ धोखा करने का आरोप लगाया. पोस्ट में यह भी पूछा गया कि वह अब 'गन्ना-गन्ना' क्यों चिल्ला रहे हैं, और उन्हें आईना देखने को कहा गया ताकि वह देख सकें कि 'गन्ना कहां लगा था'. लेकिन अखिलेश के हमले का जवाब जयंत देते, उससे पहले ही 'हरियाणवी' गायक अंकित बालियान की हत्या ने राजनीतिक ज़मीन पर कब्जा करने के लिए एक जबरदस्त लड़ाई छेड़ दी थी.
फिर, 26 अगस्त को अंकित बालियान की हत्या ने 'जाटलैंड' की लड़ाई में कानून-व्यवस्था का मुद्दा भी जोड़ दिया. पुलिस के मुताबिक, चार हमलावरों ने शामली में एक जिम के बाहर गायक पर घात लगाकर हमला किया. बाद में दो संदिग्ध शूटर, मोहित और सुमित, पुलिस मुठभेड़ में मारे गए, जबकि बाकी आरोपियों की तलाश जारी रही. हमलावरों में से कुछ हरियाणा के रहने वाले थे और उनका आपराधिक रिकॉर्ड था; हमले के समय उनमें से एक जमानत पर जेल से बाहर था.
अखिलेश ने तुरंत बालियान को न्याय दिलाने के मुद्दे को बड़े समुदाय से जोड़ते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश का पूरा जाट समुदाय इस हत्या को अपने ऊपर हमला मानता है. उन्होंने कैराना की सांसद इकरा हसन को परिवार से मिलने भेजा और फोन पर बालियान के पिता से बात की.
एक दिन बाद, जयंत ने UP के CM योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की, जिसकी तस्वीरें भी बाहर आईं. इसके बाद जयंत बालियान के परिवार से मिले. एनकाउंटर के बाद, परिवार ने पुलिस की कार्रवाई को 'आधा न्याय' बताया और कहा कि बाकी हमलावरों को भी पकड़ा जाना चाहिए.
हालांकि, अखिलेश ने सवाल उठाया कि क्या सही लोग मारे गए हैं और पूछा कि अगर सरकार को अपराधियों के बारे में पहले से पता था, तो वह हत्या को रोकने में नाकाम क्यों रही. यह घटना एक और ऐसा मौका बन गई, जहां SP और RLD के बीच जाटों के गुस्से और उनकी भावनाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील दिखने की होड़ मच गई.
NDA के लिए, गन्ने के आंकड़ों ने उन्हें फख्र करने का मौका दिया है. UP सरकार ने कहा कि मौजूदा सीजन के 94% से ज्यादा बकाया का भुगतान कर दिया गया है और 99 मिलों ने किसानों को पूरा भुगतान किया है.
लेकिन कुल आंकड़े स्थानीय स्तर पर पनप रही शिकायतों को छिपा सकते हैं. अलग-अलग मिलों की ओर से भुगतान में देरी, खेती और मजदूरी की बढ़ती लागत, और गन्ने की कीमतों को लेकर विवाद राजनीतिक रूप से अहम मुद्दे हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी किसानों के बकाया भुगतान में देरी को लेकर अधिकारियों से सवाल किए हैं.
लखनऊ के एग्रीकल्चर प्रोफेसर सुधीर पंवार ने X पर आरोप लगाया कि BJP के राज में न तो गन्ने का और न ही जाटों का सही हक मिला. उन्होंने BJP की अगुआई वाली सरकारों में जाटों के प्रतिनिधित्व के स्तर पर भी सवाल उठाए. पंवार की बात से पता चलता है कि SP के लिए एक मौका हो सकता है. जहां जयंत गन्ने का मुद्दा उठा सकते हैं, वहीं विपक्ष यह पूछ सकता है कि किसानों को असल में इसके बदले क्या मिला.
RLD ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में SP के साथ गठबंधन में 33 सीटों पर चुनाव लड़ा और आठ सीटें जीतीं, जबकि SP ने जिन 347 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से 111 जीतीं. अब जब जयंत चौधरी NDA में हैं, तो अखिलेश यादव को या तो सीधे जाट वोटरों को अपनी ओर खींचना होगा या फिर पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों के अपने PDA गठबंधन को मजबूत करना होगा, जिसे वे पंडितों को लुभाकर और बड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं.
SP ने पहले ही सांसद डिंपल यादव को आगे कर दिया है. जयंत की पत्नी चारू चौधरी भी चुनाव प्रचार में उतर गई हैं और रैलियों को संबोधित कर रही हैं, जिससे उनके औपचारिक रूप से राजनीति में आने की अटकलें तेज हो गई हैं.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BJP-RLD का गठबंधन मजबूत स्थिति में दिखता है, लेकिन इसमें भी कुछ मतभेद हैं. UP के चीनी उद्योग मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने हाल ही में तर्क दिया कि BJP उम्मीदवार तब भी जीते थे, जब RLD नेता दूसरी पार्टियों के साथ थे. जयंत को तीन कृषि कानूनों को लेकर बचे-खुचे गुस्से का भी सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें बाद में मोदी सरकार ने वापस ले लिया था.
भले ही कानून वापस ले लिए गए, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग, खेती की बढ़ती लागत और खेती-किसानी की अनदेखी की भावना के कारण यूपी में समुदाय के कुछ वर्गों के बीच अविश्वास बना हुआ है. जानकारों का कहना है कि इसी नाराजगी की वजह से 2023 में जाट-बहुल लोकसभा सीटों - मुजफ्फरनगर और कैराना - पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा.
एक और पेचीदगी है. कुछ गुर्जर लोग इस बात से नाराज थे कि जयंत के 'G' का मतलब सिर्फ 'गन्ना' था, 'गुर्जर' नहीं. ऐसी प्रतिक्रियाएं किसी बड़े ट्रेंड को दिखाने के लिए बहुत छोटी हैं, लेकिन इनसे जोखिम का पता चलता है. 2014 से पहले, पश्चिमी यूपी में बड़े OBC-किसान-कल्याण गठबंधनों के हिस्से के तौर पर गुर्जर मुख्य रूप से RLD, SP और BSP के बीच आते-जाते रहते थे. 2014 के बाद से, वे BJP का समर्थन करते दिखे हैं. लेकिन अब SP, राजकुमार भाटी जैसे नेताओं और मुस्लिम-गुर्जर आउटरीच के जरिए उन्हें तेजी से अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है.
वहीं, अगर जयंत जाटों के बीच पुरानी नाराजगी को कम कर सकें और गुर्जरों के बीच अपनी पैठ गहरी कर सकें, तो RLD का सियासी प्रभाव उसकी सीटों की संख्या से कहीं ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे SP का संभावित सामाजिक गठबंधन कमजोर हो सकता है. जयंत के नारे ने शायद अभी के लिए अखिलेश को बचाव की मुद्रा में ला दिया है, जबकि RLD इसे जाट गौरव से जोड़कर पेश कर रही है. लेकिन क्या यह अखिलेश के लिए राजनीतिक जाल बनेगा, यह शब्दों के खेल से कम और जमीनी हकीकत पर ज्यादा निर्भर करेगा. गन्ना भुगतान, उम्मीदवार का चयन, गठबंधन में एकजुटता और सामाजिक समीकरण जैसे कारक ही आखिरकार यह तय करेंगे कि पश्चिमी यूपी और वहां के 'गन्ना' किसानों की बात कौन करता है.