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अफगानिस्तान से हजारों किमी दूर US की नाक के नीचे कैसे पैदा हुआ एक और 'तालिबान'? कौन हैं ये लोग, क्यों रखा ऐसा नाम?

अमेरिका के फ्लोरिडा में हुए प्लेन क्रैश और ट्रंप के प्राइवेट आवास पर मिसाइलों से लैस एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती के बीच पश्चिमी देशों की मीडिया में 'तालिबान' की चर्चा हो रही है. इन रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि तालिबान अब ट्रंप की नाक के नीचे तक पहुंच गया है. सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका से अफ्रीका महाद्वीप तक इस विचारधारा के विस्तार ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Nov 02, 2026, 07:22 AM IST | Updated: Nov 02, 2026, 11:19 AM IST
Image Credit: (AI)
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तालिबान की मौजूदगी उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका तक पहुंचने यानी ट्रंप की नाक के नीचे पहुंचने का दावा किया जा रहा है. ये सिर्फ अमेरिका नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की चिंता का विषय है. ऐसा इसलिए, क्योंकि 'सुपरपावर' अमेरिका को 9/11 का आतंकी हमला करके दहला चुके अलकायदा से लेकर तालिबान तक की लीडरशिप ये कह चुकी है कि उनका संगठन किसी बड़े नेता या कुछ लड़ाकों को मारने से खत्म नहीं होता, क्योंकि वो महज कुछ लोगों का समूह नहीं बल्कि विचारधारा है, जिसे खत्म करना लगभग नामुमकिन है.

9/11 से तालिबान का कनेक्शन        

15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के बाद तालिबान ने काबुल पर कब्जा करके देश की कमान संभालने का ऐलान किया था. उसी दौरान तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने 'टोलो न्यूज' को दिए इंटरव्यू में कहा था कि 20वीं सदी के तालिबान और 21वीं सदी के तालिबान में जरा सा भी अंतर नहीं है. हमारी विचारधाराएं और मान्यताएं वही हैं, क्योंकि हम मुस्लिम हैं. एक बदलाव जो आया है, वो ये है कि हम अब अधिक अनुभवी और पहले से बहुत ज्यादा ताकतवर हैं.

 'तालिबान' का पतन और वापसी'

अलकायदा ने 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका पर आतंकी हमला किया. 20 सितंबर को तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग का ऐलान करते हुए कहा था कि ये जंग अल-कायदा से शुरू होगी, लेकिन वहीं खत्म नहीं होगी. सात अक्टूबर 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान लॉन्च किया. जिसका मकसद अल-कायदा के ठिकानों को नष्ट करने के साथ उसे पनाह देने वाले 'तालिबान' की सैन्य ताकत खत्म करना था. 

'तालिबान नाम नहीं विचारधारा'

तालिबान को घुटनों पर लाने में मुश्किल से सवा महीने का वक्त लगा. वो सैन्य रूप से तो खत्म हो गया लेकिन उसकी पीढ़ियों पुरानी विचारधारा इतनी मजबूत थी कि तालिबान ने महज 20 सालों में अपनी लकीर और दायदा इतना बड़ा कर लिया कि वो बिना एक चवन्नी खर्च किये और बिना एक बंदूक किसी को दिए कई कट्टरपंथी गिरोहों का वैचारिक सरपरस्त और मेंटर बन गया.

आगे इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि तालिबान ने खुद को इतना मजबूत करके 15 अगस्त, 2021 को ऐसा दमदार कमबैक किया कि सुपरपावर अमेरिका को बकायदा एक समझौता करके अपने हथियारों का जखीरा और मिलिट्री हेलीकॉप्टर छोड़कर वहां से निकलना पड़ा.

हैती, केन्या और पेरू की कहानी चौंका देगी!

तालिबान की विचारधारा ट्रंप की नाक के नीचे यानी उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के देशों तक कैसे पहुंची, इसने पूर्वी अफ्रीका में अपनी जड़े कैसे जमाई, इसकी कहानी आइए हम आपको एकदम एक्सक्लूसिव रूप से बताते हैं.

तालिबान के समर्थकों का संख्याबल

बीबीसी में प्रकाशिक एक रिपोर्ट के मुताबिक हैती, पेरू से लेकर केन्या में तालिबान के चाहने वाले मौजूद हैं. इन देशों में मौजूद आधा दर्जन से अधिक हथियारबंद संगठनों के आका जो तालिबान को महान योद्धाओं का संगठन मानकर उसे विजेता के रूप में देखते हैं. उनकी भी सोशल मीडिया पर फैन फॉलोइंग लाखों में हैं. 

आपके दिमाग में भी एक सवाल आया होगा कि उत्तरी अमेरिका के पास स्थित देश हैती, दक्षिण अमेरिका के पास स्थिति पेरू में आखिर 'तालिबान' क्या कर रहे हैं? यहां कुछ हथियारबंद समूहों ने न सिर्फ अपना नाम तालिबान रखा है, बल्कि उनके ऐसे कपड़े और चप्पल/जूतियों को पहनकर उनकी स्टाइल में बंदूकों को हवा में लहराकर ताबड़तोड़ फायरिंग करने को स्टाइल स्टेटमेंट बना लिया है.

हैती, पेरू और केन्या तक न सिर्फ इनकी वैचारिक मौजूदगी है बल्कि अपने देश की सरकारों और सिस्टम को चुनौती देने वाले इन लोगों ने कई दीवारों को ब्रश उठाकर तालिबान के नाम और उसकी विचारधारा का गुणगान किया है.

हैती में तालिबान ग्रुप के एक मेंबर का कार्ड

इन लोगों ने सिर्फ तालिबान का नाम ही नहीं अपनाया है, बल्कि उनसे अपना नाता जोड़ने के लिए आईकार्ड तक छपवा लिए हैं. इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इंटरनेशनल एंड ट्रांसनेशनल क्राइम में हैती और कैरिबियन रीजन मॉनिटरिंग के हेड रोमन लो के मुताबिक, हैती में बागियों के गुटों की तादात 150 से 200 के बीच है. हर ग्रुप में बच्चों समेत 8,000 से 20,000 मेंबर होने का अंदाजा है. हमने एक जिम्मेदार मीडिया हाउस होने के नाते इस आईकार्ड का चेहरा छिपा दिया है. क्योंकि इसे नाबालिग होने का अनुमान लगाया गया था.

ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों लड़ाके हैं, जो अफगानिस्तान के तालिबान से खुद को जोड़ने के लिए बीते 20 सालों से कई तरह के जतन कर रहे हैं. जी हां सिर्फ इन्हीं 2 दशकों में तालिबान ने न सिर्फ अफगानिस्तान से अमेरिका को रुखसत किया बल्कि अपनी विचारधारा की जड़े अमेरिका महाद्वीप तक पहुंचा दीं. 

'काम करने का तरीका भी तालिबानी' 

इन लोगों के काम-काज का तरीका भी तालिबान से डिट्टो यानी हूबहू मेल खाता है. तालिबान ने अफगानिस्तान में लड़कियों और महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई और काम-काज बंद कराया. हैती, पेरू और केन्या में पैदा हुए और पनपे ये कथित 'नव'तालिबान भी महिलाओं को सदियों पुरानी व्यवस्था की तरह चारदीवारी यानी बंद कमरों के पीछे कैद करके रखना चाहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बीते कुछ महीनों में हैती के हथियारबंद बागियों और लड़ाकों की हिंसा में 5,700 से ज्यादा लोग मारे गए या घायल हुए हैं. इसी दौरान 2,30,000 से ज्यादा लोगों को किडनैप किया गया है. इसी अंदाजे से दावा किया जा रहा है कि हैती में इस तालिबान लवर्स से कम से कम 1,000 औरतों और लड़कियों के साथ बलात्कार और गैंगरेप जैसी घटनाओं को अंजाम दिया है.

गानों और एफएम रेडियो पर 'तालिबान'

ये लोग सिविलियंस की तरह सामान्य कपड़े पहनने के साथ हाथों में हथियार रखते हैं, इनका अपना एफएम चैनल है जिसके गानों में तालिबान शब्द का खूब इस्तेमाल होता है. इनके अपने रैपर्स और सिंगर्स हैं जिन्होंने कई पॉप गानों में तालिबान का इस्तेमाल किया है. दरअसल 3 साल पहले, तालिबान ग्रुप ने मिराबेल में एक रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लिया और उसका नाम बदलकर ‘तालिबान FM’ कर दिया. इस रेडियो के जरिए, उन्होंने अपना प्रोपेगैंडा और अपने लीडर जेफ गोव के भाषणों का प्रसारण किया.

हैती में 'तालिबान' की मौजूदगी की वजह

हैती की एक ऑनलाइन मीडिया आउटलेट के संपादक के मुताबिक हैती में मौजूद तालिबान को भले ही असली तालिबान से फंडिंग या आदेश न मिलते हों फिर भी इन्होंने अफगानिस्तान तालिबान को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के हर पहलू में ढ़ालने की कोशिश की है. उनका मानना है कि अफगान तालिबान बागी और बहादुर लोगों का संगठन है जो दुनिया में किसी से भी नहीं डरता. इसीलिए उन्होंने अपने लिए तालिबान नाम चुना. हैती के तालिबान ग्रुप के लीडर जेफ गोव के टिकटॉक अकाउंट पर लाखों फॉलोवर्स हैं. 

करीब सवा करोड़ आबादी वाला देश हैती आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है. बीते एक दशक  से वहां चुनाव नहीं हुए हैं. पांच साल पहले यहां के प्रेसिडेंट की हत्या कर दी गई थी. तब से ये हथियारबंद लोग अपनी अलग सरकार चला रहे हैं. 

इन बागी संगठनों में जिनमें से अधिकांश तालिबान लवर्स हैं, उन्होंने हैती सरकार का सिर दर्द बढ़ा दिया है. इन विद्रोहियों का हैती की राजधानी पोर्ट-ऑ-प्रिंस के 80 फीसदी हिस्से पर कब्जा है. इनमें से एक ग्रुप के लीडर ने तो हैती की सीनेट के लिए भी चुनाव लड़ा और जीत कर संसद में परचम लहरा दिया. 

पुलिस उनके इलाकों में जा नहीं सकती, इसलिए अपना अलग कानून चला रहे हैं. ‘इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स बंद पड़ा है. कोई देश वहां हवाई जहाज उतार कर इन पर फिलहाल काबू नहीं कर सकता. शायद इसलिए इन संगठनों के लड़ाके खुल्लमखुल्ला तालिबान को अपनी पहचान और आन-बान-शान बताते हैं.

पेरू का हाल भी जानिए

दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में ‘लॉस तालिबान’ एक हिंसक गैंग है, जो ट्रूजिलो शहर में एक्टिव है. ये संगठन बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनियों और कारोबारियों से रंगदारी वसूलता है. छोटे दुकानदारों और ड्राइवरों से हफ्तावसूली करता है. ये ग्रुप हथियारों की तस्करी में भी शामिल रहा है. पेरू पुलिस ने पिछले साल ग्रुप के सदस्यों की गिरफ्तारी करके इनके एक सब-नेटवर्क को खत्म करने की खबर दी थी.

केन्या में भी इस तरह के संगठन मौजूद हैं, जिनके लड़ाके तालिबान को अपना आदर्शन मानते हैं. केन्या और पेरू दोनों देशों में ऐसे हथियारबंद लड़ाकों की गतिविधियां हैती के ‘तालिबान’ जैसे विद्रोही ग्रुप के कामों से मिलती-जुलती हैं. 

ऐसे में भारत समेत पूरी दुनिया के देशों में रह रहे शांतिप्रिय लोगों के लिए ये एक गंभीर चिंता की बात है कि तालिबान की विचारधारा और पहचान अब उन लोगों ने अपना ली है जो बंदूकों के जोर पर किसी भी लोकतंत्र या कानून को नहीं मानते.

इनकी करतूतों से दुनिया अनजान नहीं है. समय-समय पर इनके पर भी कतरे जाते हैं मगर ये लोग मुख्यधारा में लौटने को राजी नहीं है.

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About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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