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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पाली, बालोतरा और जोधपुर की बांडी, लूणी और जोजरी नदियों में फैल रहे प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दायर की थी. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया था. कोर्ट ने नदी को प्रदूषित होने से रोकने के लिए कड़े निर्देश जारी किए, नियम विरुद्ध चल रही सभी औद्योगिक इकाइयों के संचालन पर रोक लगाई और निर्माण एवं अन्य गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया. साथ ही, हालत की निगरानी के लिए एक हाई लेवल कमेटी बनाई गयी. जिसके सुझावों के आधार पर कार्रवाई तय की गई.
बंद फैक्ट्रियों के दावे बनाम हकीकत
उद्योगपतियों और संघों का दावा है कि जोधपुर में प्रत्यक्ष तौर पर 302 और अप्रत्यक्ष रूप से 550 इकाइयां बंद पड़ी हैं, जिससे करीब 30,000 मजदूर सीधे तौर पर बेरोजगार हो गए हैं. वहीं, डायरेक्ट और इनडायरेक्ट रूप से लगभग डेढ़ लाख लोग इस बंदी से प्रभावित हुए हैं. जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि सभी अवैध और दूषित पानी छोड़ने वाली फैक्ट्रियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. लेकिन इन दावों की पोल जोजरी नदी का वो पानी खोल रहा है, जिसमें आज भी रंगीन और केमिकल युक्त पानी बहता दिख रहा है.
पुलिस की सख्ती
जोधपुर कमिश्नरेट के डीसीपी वेस्ट कमल शेखावत के नेतृत्व में नदी में अनट्रीटेड वाटर छोड़ने वाले 17-18 व्यापारियों को हिरासत में लिया गया था, जिन्हें बाद में जमानत पर रिहा किया गया. प्रशासन का साफ संदेश है कि पर्यावरण से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. हालात को देखते हुए राज्य सरकार ने इस पूरे मामले की जांच के लिए SIT का भी गठन किया, जो हर पहलू की गहराई से पड़ताल कर रही है.
दूसरे जिलों में प्रदूषण का खतरा
जोधपुर में सख्ती बढ़ने के बाद अब कुछ व्यापारियों ने आसपास के जिलों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है. वे जोधपुर में कपड़ा प्रोसेस करने के बजाय अन्य जिलों में जाकर कपड़े की धुलाई कर रहे हैं, जिससे प्रदूषण का दायरा अब अन्य इलाकों में भी फैलने लगा है. इस प्रवृत्ति पर लघु उद्योग भारती के प्रांत अध्यक्ष और स्थानीय प्रशासन ने कड़ी आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि जो व्यापारी चंद पैसों के लालच में जोधपुर के बाद अन्य जिलों की जमीन और पर्यावरण को भी प्रदूषित कर रहे हैं, उनकी जमाबंदियां तक निरस्त कर देनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि सभी इकाइयां जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) प्लांट स्थापित करें ताकि पानी का फिर उपयोग हो सके और नदी में एक बूंद भी गंदा पानी न जाए. विशेषज्ञों और उद्योग जगत के एक वर्ग का मानना है कि जिस तरह पर्यावरण का संरक्षण जरूरी है, उसी प्रकार आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले उद्योगों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है. उद्योग और रोजगार के बिना आर्थिक स्थिति चरमरा सकती है. इसलिए, राज्य सरकार की मदद से व्यापारियों को आगे आकर अपने-अपने क्षेत्रों में ZLD प्लांट लगवाने चाहिए.
जीरो लिक्विड डिस्चार्ज तकनीक क्या है ?
उद्योगों (जैसे टेक्सटाइल, केमिकल, पेपर मिल आदि) से निकलने वाले जहरीले और गंदे पानी का इस तरह उपचार (Treatment) करना होता है कि एक बूंद भी गंदा पानी बाहर या नदी में न जाए, और उस पानी को पूरी तरह शुद्ध करके दोबारा फैक्ट्री में उपयोग (Recycle) किया जा सके.
ZLD प्लांट में पानी कितना साफ होता है ?
ZLD प्रक्रिया में पानी को कई चरणों (जैसे- प्राइमरी ट्रीटमेंट, बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट, रिवर्स ऑस्मोसिस/RO, मल्टी-इफेक्ट इवेपोरेटर और क्रिस्टलाइज़र) से गुजारा जाता है. इसके बाद पानी में मौजूद 95% से 99% तक घुले हुए ठोस पदार्थ (TDS), हैवी मेटल्स, रंग और केमिकल्स पूरी तरह निकाल दिए जाते हैं.ये दिखने में बिल्कुल साफ और पारदर्शी होता है.चूंकि इस पानी में नमक या मिनरल्स बहुत कम बचते हैं, इसलिए कृषि वैज्ञानिक सीधे तौर पर केवल इस पर निर्भर रहने की सलाह नहीं देते. हालांकि, अगर इसे सामान्य या भूजल के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाए, तो ये सिंचाई के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है. औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे जोधपुर, पाली, बालोतरा) में इस पानी का उपयोग ज्यादातर फैक्ट्रियों के कूलिंग टॉवर, बॉयलर या कपड़ा धोने की प्रक्रियाओं में ही दोबारा कर लिया जाता है ताकि नए भूजल का दोहन नहीं करना पड़े.
सुप्रीम कोर्ट ने अब तक अलग-अलग सुनवाई के दौरान क्या कहा ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पिछले दो दशकों में जो हुआ वो एक सतत और संरचनात्मक विफलता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये पर्यावरणीय नुकसान कोई सामान्य प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर करारा प्रहार है.
सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि गहरा प्रदूषण उस संवैधानिक प्रतिज्ञा का गंभीर उल्लंघन है, जिसके तहत राज्य का दायित्व है कि वो नागरिकों को गरिमा, सुरक्षा और कल्याणयुक्त जीवन का वातावरण प्रदान करे. प्रदूषित नदियां और दूषित भूजल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) की मूल भावना को गहरी ठेस पहुंचा रहे हैं. कोर्ट ने ये भी पाया कि जोधपुर, पाली और बालोतरा में स्थापित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और कॉमन इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की क्षमता प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट की तुलना में बहुत कम है. वर्षों से बने इस अंतर के चलते बिना उपचारित या आंशिक उपचारित औद्योगिक कचरा सीधे नदियों में बह रहा है.
100 मीटर में निर्माण और 500 मीटर में औद्योगिक गतिविधियों पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने नदी के किनारे से 100 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के निर्माण या विकास गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया. खतरनाक उद्योगों पर रोक, मौजूदा फ्लड लाइन या नदी के वर्तमान प्रवाह मार्ग के दोनों ओर 500 मीटर के दायरे में खतरनाक या प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक गतिविधियों पर रोक लगायी. यह व्यवस्था वैज्ञानिक तरीके से हाई फ्लड लाइन और बफर जोन का सीमांकन होने तक लागू रहेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में ''इकोसिस्टम कोऑर्डिनेशन ग्रुप'' गठित करने का निर्देश दिया है, जिसे तीन हफ्ते के भीतर कोर्ट के सामने एक ''रिजॉल्यूशन प्लान'' देना होगा. इसके अलावा, नदियों के एकीकृत प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी बनाने को भी कहा गया है. आम जनता की भागीदारी के लिए क्यूआर कोड आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया जाएगा, जिसके जरिए लोग अवैध अपशिष्ट निस्तारण या अतिक्रमण की जियो-टैग फोटो और वीडियो के साथ गोपनीय शिकायत दर्ज करा सकेंगे. जोधपुर के कपड़ा, स्टील और टाइल कारखानों से निकलने वाले बिना उपचारित जहरीले और केमिकल युक्त पानी ने इस नदी को गंदे नाले में बदल दिया है. इससे करीब 15 से 20 लाख लोग और सैकड़ों गांव प्रभावित हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश के बाद राज्य सरकार द्वारा बनाई गई एसआईटी (SIT) की जांच को ''दिखावा'' बताया है और चेतावनी दी है कि अगर कार्यशैली नहीं सुधरी तो कमान सीआरपीएफ (CRPF) को सौंपी जा सकती है.
26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में कहा-जोजरी-लूनी-बांडी नदी प्रणाली में अवैध खनन को नियमित करने के मामले में CBI जांच हो सकती है. कोर्ट ने सवाल किया कि राज्य के अधिकारियों ने उन इलाकों में खनन पट्टे (लीज़) क्यों दिए ? जहां अवैध खनन पाया गया, और अवैध पट्टों को नियमित क्यों किया ? जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने चेतावनी दी कि अगर राज्य सरकार ने सुधारात्मक कदम नहीं उठाए तो कई अधिकारियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि बार-बार न्यायिक निर्देश मिलने के बावजूद अधिकारी नदियों को बचाने में विफल रहे हैं.
जस्टिस मेहता ने राजस्थान की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू से कहा,"आपने नदियों में खनन और अवैध खनन के आंकड़े देने के लिए क्या किया ? आपने क्या किया ? आपने उन्हें नियमित किया. मिस्टर राजू, आपको पता है कि जब अवैध खनन की ओर ध्यान दिलाया गया तो आपके अधिकारियों ने आगे बढ़कर उन पट्टों को नियमित किया. हमें लगता है कि अगर आप अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं करते हैं तो हमें CBI जांच का आदेश देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. इससे आपके कई अधिकारी बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं"
जस्टिस मेहता ने राज्य के अपने ही अनुपालन हलफनामे का हवाला देते हुए पूछा, जिसमें लीज के जरिए खनन क्षेत्रों के आवंटन का जिक्र था. कोर्ट ने सवाल किया कि अगर नदियों के किनारे लगातार हिस्सों को खनन के लिए आवंटित कर दिया जाए, तो नदियों का प्राकृतिक बहाव कैसे बना रह सकता है ?
कोर्ट ने कहा "आपने खनन क्षेत्रों को लीज पर आवंटित किया है. ये किस तरह का कदम है ? आप कहते हैं कि आपने FIR दर्ज की हैं. ये इलाके एक-दूसरे से सटे हुए हैं, एक के बाद एक हैं. अगर आप लगातार सटे हुए हिस्सों को लीज पर दे रहे हैं, तो फिर नदी का बहाव कैसे बना रहेगा ?"
जब ASG ने कहा कि ये आवंटन तय प्रक्रिया के अनुसार किए गए तो जस्टिस मेहता ने पूछा कि क्या राज्य "एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) के जरिए अवैध खनन को मंजूरी दे रहा है ?" उन्होंने बताया कि जिस इलाके की बात हो रही है, वहां पहले भी अवैध खनन हो चुका है और अब उसे लीज पर आवंटित कर दिया गया. जब ASG राजू ने बताया कि पहले जो खनन हुआ था वह अवैध था क्योंकि वो बिना अनुमति के किया गया तो जस्टिस मेहता ने पूछा कि ऐसी स्थिति में राज्य इसे कैसे वैध (Regularise) कर सकता है ? ASG ने कहा कि वो इस मामले को देखेंगे. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर राज्य इस मुद्दे को हल नहीं करता है, तो वह CBI जांच का आदेश देगी. इस मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी.
हाई-लेवल इकोसिस्टम ओवरसाइट कमेटी (इस कमेटी ने पहली रिपोर्ट 27 फरवरी 2026 को दी थी)
राजस्थान हाईकोर्ट के सेवानिवृत जस्टिस संगीत लोढ़ा की अध्यक्षता में हाई-लेवल इकोसिस्टम ओवरसाइट कमेटी ,कमेटी में जस्टिस संगीत लोढ़ा के साथ राजस्थान हाईकोर्ट के पंकज शर्मा को नियुक्त किया गया. इसके साथ ही कमेटी में ये सदस्य हैं-
* जल प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और/या पर्यावरण इंजीनियरिंग के क्षेत्र में प्रतिष्ठित तकनीकी विशेषज्ञ, जिन्हें अध्यक्ष द्वारा पहचाना और नियुक्त किया जाएगा;
* अतिरिक्त मुख्य सचिव, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, राजस्थान सरकार
* संयुक्त सचिव, नगरीय विकास एवं आवासन विभाग, राजस्थान सरकार
* संयुक्त सचिव, स्थानीय स्वशासन विभाग, राजस्थान सरकार
* सदस्य सचिव, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) या उनके नामित प्रतिनिधि;
* सदस्य सचिव, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) या उनके नामित प्रतिनिधि
* प्रबंध निदेशक, राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम लिमिटेड (RIICO)
* निदेशक, राजस्थान अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (RUIDP)
* जोधपुर, पाली और बालोतरा के जिला कलेक्टर शामिल किए गए हैं