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दुनिया के तीन मुल्क इस वक्त छात्र आंदोलन की आग में झुलस रहे हैं. फ्रांस, इटली और ग्रीस तो इस लिस्ट में शामिल थे ही. फेहरिस्त में नया नाम अल्बानिया का है. मंगलवार को तिराना में अल्बानिया के शिक्षा मंत्रालय पर प्रदर्शनकारी छात्रों ने ईंटें और कंक्रीट के ब्लॉक फेंके. इसके जवाब में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया. शिक्षा और सामाजिक मुद्दों को लेकर देशभर में हो रहा यह प्रदर्शन अब हिंसक हो चुका है.
पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया. छात्र आयोजकों ने कहा कि यह प्रदर्शन यूनिवर्सिटीज के हालात, हायर एजुकेशन की लागत, आर्थिक मदद और ग्रेजुएशन के बाद नौकरी के मौकों को लेकर था. कुछ प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे असमानता और सरकार को लेकर अपनी निराशा जाहिर करना चाहते थे. प्रदर्शनकारी लुल्जेता कोला ने कहा, 'अल्बानिया को एक क्रांति, एक बदलाव और सिस्टम को पूरी तरह बदलने की जरूरत है क्योंकि यह ऐसे नहीं चल सकता.' उन्होंने कहा कि देश में गहरा सामाजिक अन्याय है और अमीर-गरीब के बीच बड़ी खाई है.
अल्बानिया की डिप्टी प्राइम मिनिस्टर अल्बाना कोचिउ ने फेसबुक पर लिखा, 'हिंसा कभी समाधान नहीं रही है, न है और न ही कभी होगी. पत्थर फेंकना, संस्थानों और राज्य की पुलिस पर हमला करना, और साथ ही सार्वजनिक संपत्ति को बेमतलब बर्बाद करना, युवाओं के लिए अपनी बात कहने का सही तरीका नहीं है.'
यह प्रदर्शन ऐसे वक्त पर हो रहा है, जब यूरोप के अन्य देशों में भी छात्रों का विरोध जारी है. आंदोलनों की शुरुआत फ्रांस से हुई, जहां आंदोलन सितंबर के मिड में पेरिस इलाके में शुरू हुआ. हाई स्कूल के छात्रों और टीचर्स ने संसाधनों और स्टाफ की कमी के खिलाफ विरोध किया. तेजी से आंदोलन की आग पूरे फ्रांस में फैल गई. छात्रों ने स्कूल के गेट्स ब्लॉक कर दिए और बाद में यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स, पेरेंट्स और ट्रेड यूनियन भी इसमें शामिल हो गए.
उनकी शिकायतों में क्लासरूम में बहुत ज्यादा भीड़, टीचर्स की कमी, स्कूल के लंबे घंटे, जर्जर इमारतें और अमीर-गरीब इलाकों के स्कूलों के बीच असमानता शामिल हैं. छात्रों ने यूनिवर्सिटी में दाखिले के प्रोसेस और एजुकेशन सिस्टम पर दबाव को लेकर भी चिंता जताई है. विरोध प्रदर्शनों का दायरा अब काफी बढ़ गया है. आंदोलन शुरू होने के बाद से 6,500 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें से अधिकतर नाबालिग हैं. वहीं, सैकड़ों स्कूलों में कामकाज बाधित हुआ है. विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के साथ झड़पें भी हुई हैं और लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं.
अब आंदोलन की चिंगारी यूरोप के अन्य देशों तक भी फैल चुकी है. बेल्जियम में, बुधवार को सैकड़ों छात्र लीज की सड़कों पर उतरे. उन्होंने महंगी होती एजुकेशन, क्लासरूम में बहुत ज्यादा भीड़ और पढ़ाई की सामग्री तक सीमित पहुंच का हवाला दिया. इन प्रदर्शनों के कारण गिरफ्तारियां हुई हैं और पुलिस के साथ झड़पें भी हुई हैं.
इस आंदोलन की झलक इस साल की शुरुआत में ब्रुसेल्स में हुए विरोध प्रदर्शनों में भी दिखी थी, जो एजुकेशन में प्रस्तावित सुधारों (बेल्जियम के फ्रेंच-भाषी समुदाय के छात्रों के लिए ट्यूशन फीस में बढ़ोतरी) के खिलाफ थे. बेल्जियम के छात्रों ने अपने विरोध प्रदर्शनों को फ्रांस में हो रही घटनाओं से खुलकर जोड़ा है. इससे पता चलता है कि फ्रांस का आंदोलन कितनी तेजी से दूसरी जगहों पर युवा प्रदर्शनकारियों के लिए एक मिसाल बन गया है.

इटली में, हाई-स्कूल के छात्रों ने ट्यूरिन और रोम में 'चलो फ्रांस जैसा करते हैं' के नारे के साथ स्कूलों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है. उनकी शिकायतों में नाकाफी फंडिंग, स्कूल की जर्जर इमारतें और बढ़ती महंगाई शामिल हैं. इटली के छात्र फ्रांस के आंदोलन के समर्थन में पेरिस भी गए हैं.
ग्रीस में भी लामबंदी देखी जा रही है. छात्रों ने देश भर में स्कूलों में विरोध की कार्रवाई का ऐलान किया है, जिसमें सभाएं, वॉकआउट, प्रदर्शन और स्कूलों पर कब्जा करना शामिल है. तात्कालिक मुद्दे अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन व्यापक मांग एक ही है. छात्र एजुकेशन में सरकार से ज्यादा निवेश की मांग कर रहे हैं.
विरोध प्रदर्शन सिर्फ स्कूलों तक ही सीमित नहीं है. आयरलैंड में, हजारों यूनिवर्सिटी छात्रों ने डबलिन में ट्यूशन फीस, हायर एजुकेशन के लिए फंडिंग और रहने-सहने के खर्च को लेकर प्रदर्शन किया है. जर्मनी में, छात्रों, शिक्षकों, माता-पिता और यूनियनों ने ज्यादा इन्वेस्टमेंट, शिक्षकों और एक निष्पक्ष एजुकेशन सिस्टम की मांग की है.
ऑस्ट्रिया भी इसी तरह की समस्या का सामना कर रहा है. देश के यूनिवर्सिटी एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि अगले तीन साल के यूनिवर्सिटी बजट में लगभग 1 अरब यूरो की कटौती हो सकती है, जिसके बाद छात्र संगठन विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं.