RBI का बड़ा फैसला: VRRR के जरिये ₹71,971 करोड़ मंगाकर बैंकों के कैश फ्लो पर कसा शिकंजा, आम आदमी को फायदा या नुकसान?
Banking System Liquidity: रिजर्व बैंक (RBI) ने ओवरनाइट VRRR ऑक्शन के जरिये बैंकिंग सिस्टम से 71,971 करोड़ रुपये की नकदी को अपने पास जमा कर लिया है. आरबीआई के इस कदम का मकसद बैंकों की लिक्विडिटी कंट्रोल करना और महंगाई पर काबू पाना है.
RBI VRRR Auction: रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के फाइनेंशियल सिस्टम को बैलेंस करने के लिए एक बार फिर से बड़ा कदम उठाया है. आरबीआई ने ओवरनाइट वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी के जरिये बैंकिंग सिस्टम से 71,971 करोड़ रुपये अपने पास मंगा लिये हैं. बाजार में जरूरत से ज्यादा पैसा आने से इकोनॉमी में महंगाई बढ़ने का खतरा बन जाता है. इसी सरप्लस नकदी (Surplus Liquidity) को कंट्रोल करने और मनी मार्केट की ब्याज दरों को पुराने लेवल पर ही बनाए रखने के लिए आरबीआई (RBI) की तरफ से इस तरह के कदम उठाए जाते हैं. इस पूरे मामले से आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
भारतीय बैंकिंग सिस्टम में इन दिनों पैसों की बाढ़ आई हुई है. आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार 21 सितंबर तक देश के बैंकिंग सिस्टम में 4.92 लाख करोड़ रुपये की एक्स्ट्रा नकदी मौजूद थी. इस भारी सरप्लस लिक्विडिटी के कारण बैंकों के पास लोन देने के लिए बहुत ज्यादा पैसा हो जाता है. इसका असर यह होता है कि शॉर्ट-टर्म ब्याज दर नीचे आने लगती हैं. इसे कंट्रोल करने के लिए आरबीआई ने ओवरनाइट वीआरआरआर (VRRR) नीलामी का सहारा लिया.
आरबीआई के पास रहेगा बैंकों का एक्स्ट्रा पैसा
ओवरनाइट वीआरआरआर के तहत 75,000 करोड़ रुपये की नोटिफाइड अमाउंट के मुकाबले बैंकों ने 71,971 करोड़ रुपये जमा कराने के लिए बोलियां लगाईं. इन बोलियों को आरबीआई की तरफ से स्वीकार कर लिया गया. यह नीलामी 5.24 प्रतिशत की कट-ऑफ और वेटेड एवरेज रेट पर पूरी हुई. इसके तहत बैंकों का अतिरिक्त पैसा कुछ समय के लिए आरबीआई के पास चला जाता है.
बैंकों के पास कहां से आया इतना पैसा
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ने के पीछे दो कारण हैं. पहला कारण FCNR (B) यानी फॉरेन करेंसी नॉन-सिडेंट डिपॉजिट का भारी मात्रा में जुटाया जाना है. बैंकों की तरफ से इन विदेशी मुद्रा जमाओं को जुटाने के बाद आरबीआई (RBI) के साथ किये गए स्वैप एग्रीमेंट के कारण बैंकिंग सिस्टम में भारी मात्रा में रुपये की लिक्विडिटी आ गई.
बैंकों के पास नकदी का अंबार
दूसरा बड़ा कारण महीने के अंत में होने वाले सरकारी खर्चे हैं. सरकारी विभागों की तरफ से कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन और दूसरे विकास कार्यों के भुगतान के तौर पर बाजार में बड़ी मात्रा में पैसा जारी किया जाता है. इन दोनों कारण से बैंकों के पास नकदी का अंबार लग गया. इसे कम करना केंद्रीय बैंक के लिए जरूरी हो गया था.
OMO बिक्री के जरिये भी निकाला पैसा
वीआरआरआर नीलामी ही नहीं, आरबीआई ने ओपन मार्केट में सरकारी सिक्योरिटीज (Open Market Operations - OMO) की बिक्री के जरिये भी बाजार से भारी मात्रा में खींची है. केंद्रीय बैंक ने 17 सितंबर को 50,000 करोड़ रुपये और 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचे. इस प्रोसेस में बैंक और निवेशक आरबीआई को पैसे देते हैं और बदले में सरकारी बॉन्ड खरीदते हैं. इससे सिस्टम से रुपया अपने आप कम हो जाता है. इस सीरीज का आखिरी चरण 28 सितंबर को तय किया गया है.
आम आदमी को फायदा या नुकसान?
आरबीआई की तरफ से उठाए गए कदम का सीधा असर आम आदमी की जेब और देश की इकोनॉमी पर पड़ता है. इसका आम आदमी को क्या फायदा होगा, आइए समझते हैं-
- महंगाई पर लगाम: जब बाजार में ज्यादा पैसा होता है तो लोग ज्यादा खरीदारी करते हैं जिससे चीजों की डिमांड बढ़ती है और महंगाई आसमान छूने लगती है. आरबीआई (RBI) के पैसा खींचने से बाजार में महंगाई कंट्रोल में रहती है और इससे आम जनता को रोजमर्रा की चीजें महंगे दाम पर खरीदने से राहत मिलती है.
- ब्याज दरों में स्थिरता: इस कदम से रेपो रेट और ओवरनाइट मनी मार्केट की दरें संतुलित रहती हैं. यदि लिक्विडिटी अनकंट्रोल्ड हो जाए तो फाइनेंशियल मार्केट में अस्थिरता आ सकती है. इससे लोन और डिपॉजिट के रेट पर बुरा असर पड़ सकता है.
- लोन महंगा होने का डर: इसका एक नुकसान यह होता है कि जब बैंक का एक्सट्रा पैसा आरबीआई के पास चला जाता है तो बैंकों के पास लिक्विडिटी कम हो जाती है. ऐसे में बैंक अपने लोन या होम लोन की ब्याज दरों को घटाने से बचते हैं. कई बार बैंक लोन महंगे बने रहते हैं. हालांकि, इससे बैंक जमा पर मिलने वाले ब्याज में स्थिरता बनी रहती है.