Significance of Gifting the Thirukkural to Putin: दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न हो चुका है और समिट में आए शीर्ष नेता अपने-अपने मुल्क वापस लौट चुके हैं. इस सम्मेलन में कई ऐसे बातें भी हुईं, जो देखने में तो बेहद साधारण थी लेकिन उसके पीछे गहरा संदेश छिपा था. ऐसी ही घटना थी पीएम मोदी का पुतिन को तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ भेंट किया जाना. यह ग्रंथ रूसी भाषा में अनुवादित करके रूसी राष्ट्रपति को दिया गया. सवाल है कि क्या यह भेंट महज डिप्लोमसी थी या इसके कोई गहरा राजनीतिक अर्थ भी छिपा था. जिसे बेहद खूबसूरती के साथ मोदी सरकार ने अंजाम दिया.
बताते चलें कि तमिलनाडु की पारंपरिक रूप से द्रविड़ पार्टियां DMK और AIADMK क्षेत्रीय भावना को उभारकर अपनी राजनीति करती आई हैं. वे खुद को तमिल भाषा और संस्कृति का अगुवा बताकर लोगों से वोट मांगती रही हैं. वहीं भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट रणनीति रही है कि वे क्षेत्रीय अस्मिता को राष्ट्रीय संस्कृति की मुख्यधारा से जोड़कर देखें, जिससे अलगाववादी या क्षेत्रीय राजनीति के नैरेटिव की काट खोजी जा सके.
यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक पुतिन को तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ भेंट करने की घटना को केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति न मानकर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और 'क्षेत्रीय गौरव' के सफल समन्वय के रूप में देख रहे हैं. उनका आकलन गलत भी नहीं है. पहली नजर में यह घटना भले ही कूटनीतिक शिष्टाचार का अनूठा रूप लगे, लेकिन इसके गहरे तार भारत की घरेलू राजनीति, विशेषकर तमिलनाडु के सियासी समीकरणों से जुड़े हैं.
तमिलनाडु की राजनीति में अपनी पैठ मजबूत करने और द्रविड़ अस्मिता के सांस्कृतिक केंद्र पर अपनी दावेदारी पेश करने के लिए केंद्र सरकार लंबे समय से विशेष रणनीतिक कदम उठा रही है. इसी रणनीति के तहत संसद में 'सेंगोल' की स्थापना करवाई गई. 'काशी तमिल संगमम' की शुरुआत की गई. साथ ही, चोल वंश से जुड़े प्रतीकों को विदेश से वापस लाया गया.
अब पुतिन को 'तिरुक्कुरल' भेंट करके अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिस तरह तमिल संस्कृति का प्रसार किया गया. उसे तमिल जनता बड़ी दिलचस्पी और गर्व की भावना से देख रही है. देश के प्रधानमंत्री की ओर से किसी वैश्विक महाशक्ति के राष्ट्राध्यक्ष को तमिल ग्रंथ भेंट करने की तमिलनाडु की स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर गूंज सुनाई दे रही है.
इस ग्रंथ को विश्व मंच पर रूस जैसे देश के सर्वोच्च नेता को सौंपकर तमिलनाडु के आम जनमानस को यह संदेश दिया गया है कि मोदी सरकार दक्षिण भारत की संस्कृति का कितना सम्मान करती है.
संत कवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित ‘तिरुक्कुरल’ को तमिल संस्कृति में वही स्थान प्राप्त है जो गीता को सनातन संस्कृति या वेदों को भारतीय दर्शन में प्राप्त है. यह तमिलनाडु के गौरव का प्रतीक है. अपनी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर सम्मानित होते देख हर तमिल गर्व महसूस कर रहा है. इस कदम के जरिए केंद्र सरकार आलोचकों के उन आरोपों का भी जवाब दिया, जिनमें अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदी या उत्तर भारतीय संस्कृति को दक्षिण भारत पर थोपा जा रहा है.
तमिलनाडु के चुनावी मैदान में भाजपा लंबे समय से पैर जमाने के लिए ऐसे चेहरों और प्रतीकों की तलाश में रही है जो सर्वमान्य हों. तिरुवल्लुवर और उनका तिरुक्कुरल एक ऐसा नाम है जिस पर किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा को कोई आपत्ति नहीं हो सकती. इसकी वजह ये है कि यह नैतिकता, शासन और प्रेम का संदेश देता है.
आप तिरुवल्लुवर को दक्षिण का चाणक्य भी कह सकते हैं. उनकी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाकर बीजेपी ने संदेश दिया है कि हरेक संत-महापुरुष उसके लिए आराध्य हैं और वह उनका सम्मान करने में पीछे नहीं हटेगी.
यह दक्षिण भारत के राजनीतिक मानचित्र पर खुद को स्थापित करने की एक लंबी और सधी हुई वैचारिक कवायद का हिस्सा है. जिसका असर राज्य में आने वाले चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ने के रूप में देखा जा सकता है.
यही नहीं, तिरुक्कुरल का रूसी कनेक्शन भी बताया जाता है. कहा जाता है कि रूस के महान दार्शनिक लियो टॉल्स्टॉय भी इस ग्रंथ के दर्शन से प्रभावित थे. इस ग्रंथ में शासन, मानवीय मूल्यों और आत्मीय संबंधों को जो सार बताया गया है, उसके बारे में रूस के लोग आज भी बात करते हैं. ऐसे में रूसी भाषा में अनुवादित तिरुक्कुरल भेंट करके पीएम मोदी ने पुतिन को जो भेंट दी है. उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साफ्ट पावर भी और मजबूत हुई है.
कुल मिलाकर, पीएम मोदी ने यह अनूठी भेंट देकर एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं. एक ओर तो रूस के साथ अपने सांस्कृतिक रिश्ते और गहरे किए हैं. साथ ही, तमिलनाडु की मिट्टी में अपनी वैचारिक जड़ें भी पहले से ज्यादा मजबूत बना ली हैं. जिसका लाभ उसे आने वाले समय में निश्चित रूप से मिलने जा रहा है.