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करोड़ों की तैयारी, हजारों हिंदी किताबें और फिर भी अंग्रेजी का दबदबा, आखिर कहां फंस गया हिंदी MBBS का मिशन?

मध्य प्रदेश में हिंदी में MBBS की पहल के बाद मेडिकल शिक्षा में भाषा को लेकर बहस तेज है. हजारों हिंदी किताबों के बावजूद छात्र परीक्षा में हिंदी का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे? जानिए हिंदी मेडिकल शिक्षा की चुनौतियां और आगे का रास्ता.

Written By Shivam Tiwari
Published: Sep 20, 2026, 08:01 AM IST | Updated: Sep 20, 2026, 08:06 AM IST
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हिंदी दिवस के कुछ दिन बाद मध्य प्रदेश में हिंदी में MBBS की पढ़ाई को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मेडिकल शिक्षा हिंदी में होनी चाहिए या अंग्रेजी में. बड़ा सवाल यह है कि अगर हिंदी में मेडिकल किताबें उपलब्ध करा दी जाएं, तो क्या छात्र वास्तव में उनका इस्तेमाल करने लगेंगे? मध्य प्रदेश में 2022 में हिंदी में MBBS की पढ़ाई को लेकर पहल शुरू हुई थी. इसके तहत मेडिकल की किताबों को हिंदी में उपलब्ध कराने की कोशिश की गई. अब इस पहल के इस्तेमाल और उसके असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से मेडिकल शिक्षा को बढ़ावा देने की पहल 2022 में शुरू की गई थी. इस पहल का उद्देश्य हिंदी माध्यम से पढ़कर मेडिकल कॉलेज पहुंचने वाले विद्यार्थियों के लिए विषयों को समझना आसान बनाना था. इसके लिए मेडिकल की महत्वपूर्ण किताबों का हिंदी में अनुवाद कराया गया. रिपोर्टों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस काम में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की टीम को भी शामिल किया गया था. योजना के तहत हजारों हिंदी किताबें तैयार कर छात्रों तक पहुंचाने की कोशिश हुई.

इतनी किताबें क्यों छापी गईं?

हिंदी में मेडिकल किताबें उपलब्ध कराने के पीछे एक महत्वपूर्ण तर्क यह था कि ग्रामीण और हिंदी माध्यम से आने वाले छात्रों को MBBS की पढ़ाई समझने में मदद मिल सकती है. NEET के जरिए अलग-अलग सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि से विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज पहुंचते हैं. इनमें ऐसे छात्र भी होते हैं जिन्होंने स्कूल की पढ़ाई हिंदी माध्यम से की होती है. उनके लिए मेडिकल विषयों को अपनी परिचित भाषा में समझने की सुविधा उपयोगी हो सकती है. हालांकि, किताब उपलब्ध होना और उसका नियमित इस्तेमाल होना दो अलग-अलग बातें हैं.

फिर छात्र हिंदी में परीक्षा क्यों नहीं लिख रहे?

यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल है. मेडिकल शिक्षा में अंग्रेजी की भूमिका लंबे समय से बनी हुई है. MBBS के दौरान Anatomy, Physiology, Biochemistry, Pharmacology और Pathology जैसे विषयों में बड़ी संख्या में अंग्रेजी मेडिकल टर्म इस्तेमाल होते हैं. छात्र स्कूल से हिंदी माध्यम में आए हों, फिर भी मेडिकल कॉलेज में उन्हें अंग्रेजी शब्दावली से लगातार सामना करना पड़ता है. ऐसे में केवल किताबों का हिंदी अनुवाद कर देना उनके पढ़ने और परीक्षा देने की पूरी आदत को तुरंत नहीं बदल सकता.

क्या कठिन हिंदी भी एक समस्या है?

हिंदी में मेडिकल शिक्षा की बात करते समय भाषा की सरलता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है. अगर अंग्रेजी के मेडिकल शब्दों का ऐसा हिंदी अनुवाद किया जाए जो छात्रों के लिए खुद नया और कठिन हो, तो समस्या कम होने के बजाय बढ़ सकती है. मेडिकल छात्रों को पहले ही बहुत सारे नए शब्द और अवधारणाएं सीखनी होती हैं. ऐसे में अगर उन्हें विषय समझने के साथ-साथ अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ शब्दावली भी याद करनी पड़े, तो पढ़ाई का बोझ बढ़ सकता है.

क्या मेडिकल टर्म अंग्रेजी में ही रहने चाहिए?

इस पर एक व्यावहारिक मॉडल की चर्चा की जा सकती है. उदाहरण के लिए, शिक्षक किसी जटिल मेडिकल अवधारणा को हिंदी या स्थानीय भाषा में समझाएं, लेकिन जरूरी मेडिकल टर्म अंग्रेजी में ही रखें. इससे छात्र विषय को अपनी परिचित भाषा में समझ सकता है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने वाली मेडिकल शब्दावली से भी परिचित रहता है. इस तरह हिंदी और अंग्रेजी को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

क्या हिंदी माध्यम के छात्रों को इससे फायदा हो सकता है?

हिंदी माध्यम से आने वाले छात्रों के लिए अपनी परिचित भाषा में किसी कठिन विषय की व्याख्या समझना निश्चित रूप से उपयोगी हो सकता है. लेकिन छात्रों की जरूरत एक जैसी नहीं होती. किसी छात्र को पूरी किताब हिंदी में पढ़ना पसंद हो सकता है, जबकि दूसरा छात्र अंग्रेजी की मूल किताब और हिंदी सामग्री दोनों का इस्तेमाल कर सकता है. इसलिए मेडिकल शिक्षा में एक ही भाषा को सभी छात्रों के लिए अनिवार्य करने के बजाय विकल्प और संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराना अधिक उपयोगी हो सकता है.

MBBS के बाद अंग्रेजी क्यों जरूरी हो जाती है?

मेडिकल शिक्षा केवल MBBS तक सीमित नहीं रहती. आगे MD, MS और दूसरी विशेषज्ञता वाली पढ़ाई के लिए छात्रों को अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं और अकादमिक सामग्री का सामना करना पड़ता है. मेडिकल रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक साहित्य में भी अंग्रेजी का व्यापक इस्तेमाल होता है. विदेश में मेडिकल करियर की योजना बनाने वाले छात्रों के लिए भी अंग्रेजी महत्वपूर्ण हो सकती है. इसलिए हिंदी में MBBS उपलब्ध कराने की कोशिश करते समय छात्रों को अंग्रेजी मेडिकल शब्दावली से अलग करना व्यावहारिक नहीं होगा.

क्या हिंदी में मेडिकल पढ़ाई का विचार गलत है?

नहीं. मातृभाषा या परिचित भाषा में किसी विषय को समझने का विचार अपने आप में गलत नहीं है. असली सवाल उसके मॉडल और क्रियान्वयन का है. अगर हिंदी को अंग्रेजी का पूरी तरह विकल्प बनाने के बजाय कठिन विषयों को समझने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो इसका फायदा हो सकता है. छात्रों को हिंदी में समझाने के साथ-साथ अंग्रेजी मेडिकल टर्म भी बताए जा सकते हैं. इससे वे दोनों भाषाओं के बीच आसानी से काम कर पाएंगे.

रतलाम मॉडल की चर्चा क्यों हो रही है?

मूल कॉपी में मध्य प्रदेश के रतलाम मेडिकल कॉलेज का उदाहरण दिया गया है, जहां हिंदी किताबों के इस्तेमाल को लेकर सकारात्मक अनुभव का दावा किया गया है. यहां बताया गया है कि बड़ी संख्या में छात्रों तक हिंदी किताबें पहुंचीं और उनका इस्तेमाल भी हुआ. इस मॉडल की खास बात यह बताई गई है कि हिंदी सामग्री को अंग्रेजी का विकल्प मानने के बजाय रेफरेंस मटेरियल के तौर पर इस्तेमाल किया गया. छात्रों को अपनी सुविधा के अनुसार इसका इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता मिली.

क्या शिक्षक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है?

बिल्कुल. भाषा बदलने का मतलब सिर्फ किताब बदलना नहीं है. अगर शिक्षक कठिन विषय को सरल भाषा में समझाता है, उदाहरण देता है और अंग्रेजी मेडिकल टर्म का अर्थ भी स्पष्ट करता है, तो छात्र को विषय समझने में आसानी हो सकती है. इसके विपरीत केवल अनुवादित किताब उपलब्ध करा देने से बदलाव सीमित रह सकता है. इसलिए मेडिकल शिक्षा में भाषा सुधार के साथ शिक्षक प्रशिक्षण और बेहतर शिक्षण पद्धति भी जरूरी हो सकती है.

चीन और जापान से भारत क्या सीख सकता है?

अक्सर चीन और जापान जैसे देशों का उदाहरण दिया जाता है कि वहां उच्च शिक्षा और मेडिकल शिक्षा में स्थानीय भाषाओं का व्यापक इस्तेमाल होता है. लेकिन किसी देश की भाषा व्यवस्था को दूसरे देश में सीधे लागू नहीं किया जा सकता. वहां दशकों में शिक्षा, शोध, मेडिकल शब्दावली और पाठ्य सामग्री का एक पूरा ढांचा विकसित हुआ है. भारत में भी अगर हिंदी को मेडिकल शिक्षा में मजबूत करना है, तो केवल अनुवाद के बजाय लंबे समय की योजना की जरूरत होगी.

क्या हिंग्लिश मॉडल ज्यादा आसान हो सकता है?

भारत में रोजमर्रा की भाषा पहले से ही कई जगह हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण है. मेडिकल कॉलेजों में भी शिक्षक और छात्र कई बार दोनों भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए एक ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जिसमें शिक्षक हिंदी या स्थानीय भाषा में अवधारणा समझाएं, जबकि मेडिकल टर्म अंग्रेजी में रखें. किताबों में भी सरल हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्द दिए जा सकते हैं. इससे छात्रों को विषय समझने और भविष्य की मेडिकल पढ़ाई के लिए जरूरी शब्दावली सीखने में मदद मिल सकती है.

क्या सिर्फ बजट और किताबों से नीति सफल होगी?

किसी भी शिक्षा नीति की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितनी किताबें छपीं या कितना पैसा खर्च हुआ. यह देखना भी जरूरी है कि छात्रों ने उन किताबों का कितना इस्तेमाल किया और क्या इससे उनकी पढ़ाई बेहतर हुई. अगर छात्र किताबों को उपयोगी मानते हैं, तो उनके इस्तेमाल का आंकड़ा बढ़ सकता है. अगर वे उन्हें कठिन या कम उपयोगी पाते हैं, तो नीति में बदलाव की जरूरत होगी. इसलिए नियमित फीडबैक और डेटा इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हैं.

आगे सरकारों को क्या करना चाहिए?

हिंदी में मेडिकल शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए अचानक पूरी व्यवस्था बदलने के बजाय चरणबद्ध तरीके से काम किया जा सकता है. पहले छात्रों और शिक्षकों से फीडबैक लिया जाए. कठिन शब्दों को सरल बनाया जाए. जरूरी अंग्रेजी मेडिकल टर्म को साथ रखा जाए. हिंदी सामग्री को रेफरेंस के रूप में उपलब्ध कराया जाए और यह देखा जाए कि किन विषयों में छात्रों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिल रहा है.

क्या हिंदी और अंग्रेजी के बीच चुनाव जरूरी है?

मेडिकल शिक्षा में शायद सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या छात्रों को केवल हिंदी या केवल अंग्रेजी में से किसी एक को चुनना ही होगा? जरूरी नहीं. शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्र को विषय समझाना और उसे एक सक्षम डॉक्टर बनने के लिए तैयार करना है. अगर हिंदी में समझाने से अवधारणा स्पष्ट होती है और अंग्रेजी मेडिकल टर्म से छात्र को आगे की पढ़ाई में मदद मिलती है, तो दोनों का इस्तेमाल एक साथ किया जा सकता है.

क्या हिंदी MBBS का भविष्य इसी मॉडल पर निर्भर है?

मध्य प्रदेश की पहल ने मेडिकल शिक्षा में भाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस जरूर शुरू की है. लेकिन इसका अंतिम मूल्यांकन केवल किताबों की संख्या या हिंदी में परीक्षा लिखने वाले छात्रों की संख्या से नहीं होना चाहिए. छात्रों की समझ, परीक्षा प्रदर्शन, शिक्षकों का अनुभव और आगे की पढ़ाई में उनकी तैयारी इन सभी पहलुओं को देखना होगा.

आखिरकार हिंदी में MBBS का उद्देश्य सिर्फ मेडिकल किताबों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करना नहीं होना चाहिए. लक्ष्य यह होना चाहिए कि हिंदी माध्यम से आने वाला छात्र मेडिकल विज्ञान को आसानी से समझ सके, साथ ही उसे आगे की पढ़ाई और पेशेवर दुनिया के लिए जरूरी अंग्रेजी मेडिकल शब्दावली की भी अच्छी समझ हो. अगर भाषा छात्र की पढ़ाई आसान बनाती है, तो वह उपयोगी है; अगर भाषा खुद एक नई बाधा बन जाए, तो मॉडल पर दोबारा विचार करना जरूरी है.

जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट

फिजियोलॉजिस्ट डॉ. मनोहर लाल भंडारी मध्य प्रदेश में हिंदी में MBBS की पढ़ाई के लंबे समय से समर्थक रहे हैं और हिंदी अनुवाद के लिए बनी उच्चस्तरीय कमेटी का हिस्सा रहे हैं. उन्होंने कहा था कि हिंदी में मेडिकल शिक्षा की जरूरत है, क्योंकि अंग्रेजी के तकनीकी शब्द हिंदी माध्यम से आने वाले छात्रों के लिए शुरुआती दौर में परेशानी पैदा कर सकते हैं. उनके मुताबिक, अगर छात्र मेडिकल टर्म को समझकर हिंदी में लिखें, तो वे विषय को बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकते हैं.

वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ और पूर्व कुलपति, DAVV डॉ. भारत छापरवाल ने हिंदी में मेडिकल शिक्षा के विचार का विरोध नहीं किया, लेकिन इसकी तैयारी और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने कहा था कि मेडिकल शिक्षा के लिए हिंदी में अपडेटेड और गुणवत्तापूर्ण किताबों की उपलब्धता जरूरी है. उनके अनुसार, मेडिकल रिसर्च तेजी से बदलती है, इसलिए नई वैज्ञानिक जानकारी को पाठ्यपुस्तकों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए.

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शिवम तिवारी, जी न्यूज में डिजिटल कंटेंट राइटर हैं और पत्रकारिता में करीब 2 साल से अधिक का अनुभव रखते हैं. यूपी के प्रयागराज के रहने वाले शिवम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है. खबरों की नब्ज पकड़कर उन्हें आसान और साफ भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. शिवम शिक्षा और रोजगार से जुड़े विषयों पर खास फोकस रखते हैं. इनमें स्कूल-कॉलेज एडमिशन, बोर्ड परीक्षाएं, प्रवेश परीक्षाएं, सरकारी नौकरियां, रिजल्ट, कॉम्पिटिटिव एग्जाम, करियर टिप्स, करेंट अफेयर्स और जनरल नॉलेज जैसे टॉपिक्स शामिल हैं.इसके अलावा शिवम, टीचर्स, प्रोफेसर्स, एक्सपर्ट्स और करियर काउंसलर्स की सलाह के आधार पर कंटेंट तैयार करते हैं. ये IIT-JEE, NEET, GATE, CLAT और CUET जैसे नेशनल लेवल एंट्रेंस एग्जाम से जुड़े विषयों पर गहराई से काम करते हैं और छात्रों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. शिवम तिवारीर से संपर्क करने के लिए आप उन्हें shivam.tiwari@india.com पर ईमेल कर सकते हैं.
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